राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद पवार ने 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले जब यह घोषणा की कि वे अब चुनाव नहीं लड़ेंगे तो बहुत लोगों को लगा कि अब उनकी राजनीतिक सक्रियता कम होती जाएगी. लेकिन महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों में 78 साल के शरद पवार जिस तरह से सक्रिय रहे, उसके बारे में न सिर्फ उनकी पार्टी और उनकी सहयोगी पार्टी कांग्रेस में चर्चा हो रही है बल्कि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और शिव सेना के अंदर भी उनकी तारीफ हो रही है.

अभी पिछले दिनों शरद पवार को महाराष्ट्र के सतारा में एक चुनावी सभा को संबोधित करना था. जब वे वहां पहुंचे तो भारी बारिश हो रही थी. लेकिन बड़ी संख्या में लोग उन्हें सुनने के लिए मौजूद थे. इसके बाद पवार ने बारिश में भीगते हुए इस चुनावी सभा को संबोधित किया. इसके बाद से मीडिया में उनकी इस सभा की तस्वीर और वीडियो लगातार वायरल हो रहे हैं.

इस बार के महाराष्ट्र चुनाव में अधिकांश लोग यह मान रहे हैं कि भाजपा और शिव सेना गठबंधन को दोबारा सत्ता में वापसी में कोई खास दिक्कत नहीं होगी. इसके लिए प्रदेश में विपक्ष की कमजोर स्थिति को भी जिम्मेदार ठहराया जा रहा है. माना जा रहा है कि जिस तरह से लोकसभा चुनावों में विपक्ष की लचर हालत की वजह से भाजपा को प्रदेश में बड़ी कामयाबी हासिल हुई, उसी तरह के परिणाम विधानसभा चुनावों में भी देखने को मिल सकते हैं.

ऐसी संभावनाओं के बीच विपक्ष की ओर से चुनाव प्रचार में शरद पवार ने एक अलग लकीर खींचने की कोशिश की. पिछले तकरीबन डेढ़-दो महीने से महाराष्ट्र में जो प्रचार अभियान चल रहा था उसमें सतारा पहला उदाहरण नहीं है जहां शरद पवार ने अपनी जीवटता का प्रदर्शन किया हो. और भी कई मौके ऐसे रहे जब उन्होंने ‘निश्चत हार’ की आशंकाओं के बावजूद बहुत मजबूती से विपक्ष का प्रचार अभियान को थामे रखा.

लेकिन ऐसा उदाहरण कांग्रेस की ओर से महाराष्ट्र में कोई नेता पेश करता हुआ नहीं दिखा. न तो पार्टी के राष्ट्रीय नेताओं ने इस चुनाव में कोई खास सक्रियता दिखाई और न ही प्रदेश स्तर के कांग्रेसी नेताओं ने ही ऐसा कुछ करने की कोशिश की कि वे लोगों की नजर में विकल्प के तौर पर उभर सकें.

शरद पवार ने महाराष्ट्र चुनावों के विमर्श को कई तरह से प्रभावित करने की कोशिश की. इसमें जहां जरूरत पड़ी उन्होंने जनता से सीधे तौर पर माफी भी मांगी. जिस सतारा की सभा का जिक्र पहले किया गया है, उसमें पवार का कहना था कि लोकसभा चुनाव में उनसे यहां का उम्मीदवार देने में गलती हो गई थी लेकिन अब इस गलती को सुधारने का वक्त आ गया है. चुनाव प्रचार के दौरान पवार ने अपनी इस तरह की राजनीतिक सूझबूझ से कई बार सत्ता पक्ष के वारों को बेअसर करने का प्रयास किया और इस वजह से वे महाराष्ट्र चुनावों में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन का सबसे प्रमुख चेहरा बन गए.

खुद को प्रवर्तन निदेशालय का नोटिस मिलने के बाद शरद पवार ने जिस तरह से उसका सामना किया वह भी उनकी राजनीतिक सूझ-बूझ का ही एक उदाहरण है. विपक्षी नेताओं पर जिस तरह से केंद्र सरकार की एजेंसियां कार्रवाई कर रही हैं उसे विपक्ष की ओर से बदले की कार्रवाई कहा जा रहा है. इसी कड़ी में शरद पवार पर भी प्रवर्तन निदेशालय ने कार्रवाई करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने इसका इस्तेमाल कुछ इस तरह से किया कि लोगों में उनके प्रति सहानुभूति पैदा हो गई.

शरद पवार को मिले नोटिस के खिलाफ महाराष्ट्र के अलग-अलग शहरों में उनके समर्थकों ने बंद आयोजित किये. इससे एनसीपी के कार्यकर्ताओं में एक नए ढंग का उत्साह पैदा हुआ. शरद पवार ने घोषणा की कि वे खुद ही जांच के लिए प्रवर्तन निदेशालय के मुंबई कार्यालय में जाएंगे. उनके जाने की तारीख आते-आते ऐसा माहौल बना कि मुंबई पुलिस को खुद शरद पवार से अनुरोध करना पड़ा कि वे वहां नहीं जाएं क्योंकि इससे कानून व्यवस्था की समस्या पैदा हो सकती है. इसके बाद शरद पवार वहां नहीं गए.

एनसीपी के एक नेता इस बारे में कहते हैं, ‘भाजपा ने सोचा भी नहीं था कि शरद पवार इस मामले को इस तरह से मोड़ देंगे. जब उनके पक्ष में जनता आने लगी तब भाजपा को अपनी गलती का अहसास हुआ और फिर न सिर्फ मुंबई पुलिस की ओर से उनसे प्रवर्तन निदेशालय नहीं जाने का अनुरोध किया गया बल्कि भाजपा के कुछ नेताओं ने भी उन्हें फोन करके वहां नहीं जाने को कहा. लेकिन तब तक शरद पवार इसका राजनीतिक इस्तेमाल कर चुके थे. इससे दो फायदे हुए. एक तो हमारे कार्यकर्ताओं में इस बात को लेकर उत्साह आया कि हमारा नेता संघर्ष के लिए पूरी तरह तैयार है और दूसरे विपक्षी नेताओं की तरह भाजपा के सामने आत्मसमर्पण नहीं कर रहा है. वहीं दूसरी बात यह हुई कि कांग्रेस की ओर से किसी के नेतृत्व की स्थिति में नहीं रहने की वजह से शरद पवार विपक्षी गठबंधन का चेहरा बन गए.’

शिव सेना के राज्यसभा सांसद सजय राउत ने भी इस बात को सार्वजनिक तौर पर माना. उनका कहना था कि शरद पवार को बेवजह निशाना बनाने से सत्ताधारी गठबंधन को नुकसान होगा क्योंकि इससे एनसीपी कार्यकर्ताओं में नया उत्साह आया और पार्टी चुनाव लड़ने के मूड में आ गई. उन्होंने ये भी कहा कि राजनीतिक तौर पर अलग होने के बावजूद यह सच है कि शरद पवार सिर्फ महाराष्ट्र के ही नहीं बल्कि पूरे भारत के बड़े नेता हैं.

महाराष्ट्र भाजपा के एक नेता इस बारे में कहते हैं, ‘शरद पवार को चुनाव के समय प्रवर्तन निदेशालय का नोटिस दिलाना बड़ी गलती थी. पिछले पांच सालों से हमारी सरकार भले हो लेकिन अगर सिर्फ अपने दम पर जनाधार की बात हो तो महाराष्ट्र में सभी पार्टियों के नेताओं में शरद पवार सबसे आगे हैं. राजनीतिक तौर पर उनका दिमाग जितना तेज चलता है और उनके पास जो जनाधार है, उसमें वे ऐसी किसी भी गलती का राजनीतिक लाभ लेने का अवसर नहीं छोड़ेंगे.’

इसके अलावा शरद पवार ने महाराष्ट्र चुनावों में भाजपा के बड़े मुद्दों के मुकाबले बुनियादी मुद्दों को बार-बार उठाने का काम किया. वे महाराष्ट्र के कृषि संकट, पानी की समस्या और बेरोजगारी का मसला अपनी चुनावी सभाओं में लगातार उठाते रहे. इसमें भी वे हर मुद्दे को महाराष्ट्र की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के साथ उठा रहे थे. वे अपने भाषणों में शिवाजी के शासन का जिक्र कर रहे थे और बता रहे थे कि कैसे भाजपा ने महाराष्ट्र के गौरवशाली इतिहास और उस दौर के शासकों के सिद्धांतों को तार-तार करने का काम किया है.

उदाहरण के तौर पर एक सभा में उन्होंने एनसीपी और कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने वाले नेताओं का जिक्र किया. उन्होंने इसे शिवाजी महाराज के शासन काल से जोड़ा और कहा कि पाला बदलने वालों को शिवाजी महाराज कभी माफ नहीं करते थे और यही महाराष्ट्र की परंपरा है. इसी तरह पानी की उपलब्धता के मसले को भी मराठा शासन काल से जोड़ने की कोशिश वे बार-बार करते रहे.

शरद पवार की इन कोशिशों का चुनावी लाभ कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को कितना मिलता है, यह तो 24 अक्टूबर को ही पता चलेगा लेकिन इतना तय है कि उन्होंने जिस जीवटता से इन चुनावों में विपक्ष का नेतृत्व किया है, वह विपक्षी नेताओं के लिए एक उदाहरण है.