1- कार्ल मार्क्स ने कहा था कि लोग अपना इतिहास खुद बनाते हैं, लेकिन इतिहास कभी उनकी पसंद से नहीं बनता. रोमानिया के तानाशाह निकोलस चाचेस्कू की कहानी कुछ ऐसी ही है. चाचेस्कू के शासन के 25 सालों तक वही हुआ जो उन्होंने चाहा. लेकिन उनकी कहानी का अंत ऐसा था जैसा उन्होंने कभी नहीं चाहा होगा. बीबीसी पर रेहान फ़ज़ल का लेख.

निकोलस चाचेस्कू, वो निरंकुश तानाशाह जो अल्कोहल से धोता था हाथ

2- इस साल अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार पाने वाले अभिजीत बनर्जी को लेकर भारत में राजनीतिक बहस गर्म है. भाजपा नेता पीयूष गोयल ने उन्हें वाम विचारधारा वाला अर्थशास्त्री बताया है तो वहीं विपक्षी नेताओं का कहना है कि अभिजीत बनर्जी के काम को राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए. उधर, द प्रिंट हिंदी पर योगेंद्र यादव का मानना है कि अभिजीत बनर्जी और उनके दोस्तों ने अर्थशास्त्र को लोगों से असल जिंदगी में जोड़ने का काम किया है.

बाज़ार आधारित अर्थव्यवस्था में लोक- कल्याणकारी योजनाएं कैसे बनेंगी, इसका जवाब है अभिजीत बनर्जी के पास

3- कल हरियाणा में विधानसभा चुनाव के लिए वोट डाले जाने हैं. न्यूजलॉन्ड्री हिंदी पर मनदीप पुनिया की यह रिपोर्ट बताती है कि कैसे वोटों से अपनी झोली भरवाने के लिए डेरों के संत-महंतों के दरबार में जाकर बिछ जाने की ‘कुख्यात’ परम्परा का हरियाणा के नेता हर चुनाव में क्रांतिकारी इस्तेमाल करते हैं.

डेरे और मठों की परिक्रमा करने वाली हरियाणा की सियासत

4- भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान सौरव गांगुली अब भारत में क्रिकेट को चलाने वाली संस्था यानी बीसीसीआई के मुखिया हैं. वरिष्ठ पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी का मानना है कि अब भारत में क्रिकेट को तो सौरव गांगुली चलाएंगे ही, यह एक राजनैतिक दांव भी है जिसकी रूपरेखा भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने तैयार की है.

अमित शाह का मास्टरस्ट्रोक है सौरव गांगुली का बीसीसीआई चीफ बन जाना

5- एशिया के शहर इस कदर विकास की अंधी दौड़ में शामिल हैं कि वे अपनी सांस्कृतिक विरासतों को भी नहीं बचा पा रहे हैं. डॉयचे वेले हिंदी पर छपा यह लेख बताता है कि इस दौड़ में लोग अपने उस पारंपरिक ज्ञान को भी भूलते जा रहे हैं जिस पर कभी उनका शहर टिका था.

विकास की अंधी दौड़ में विरासत को कुचल रहे हैं शहर