कश्मीर घाटी में संचार सेवाएं पिछले दो महीने से ज़्यादा समय से बंद हैं, जो यहां अभी तक का सबसे लंबा संचार प्रतिबंध है. बीती पांच अगस्त को अनुच्छेद-370, जो भारत के संविधान में जम्मू कश्मीर को एक विशेष स्थिति देता था, हटा देने से एक दिन पहले सरकार ने सारी संचार सेवाएं बंद कर दी थीं.

इन दो महीनों में सरकार ने सिर्फ लैंड्लाइन फोन वापिस चालू किए हैं, जबकि इंटरनेट सेवाएं और मोबाइल फोन अभी भी बंद हैं. सड़कों पर लगे प्रतिबंध हटा दिये गए हैं लेकिन कारोबार ठप्प है -दुकानें, स्कूल, कॉलेज, निजी दफ्तर, यातायात सब कुछ बंद पड़ा हुआ है.

ऐसे में कश्मीर में इस समय स्थानीय लोगों के पास करने के लिए ज़्यादा कुछ नहीं है, तो टीवी के सामने बिताया जाने वाला समय थोड़ा सा बढ़ गया है.

मैंने सालों से टीवी नहीं देखा था. पहले तो इसके लिए ज़्यादा वक़्त नहीं मिलता था और मिलता भी था तो ऑनलाइन कॉन्टेंट देखने में बीत जाता था. अब कई दिन लगातार किताबों के पन्ने टटोलने के बाद में भी इस ईडियट बॉक्स के सामने बैठ गया.

टीवी खोलते ही सामने फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार दिखे थे, किसी अस्पताल के कमरे में बेहोश पड़े मरीज के सामने लोगों को यह बता रहे थे कि इस मरीज ने अपना सारा पैसा हस्पताल के बिल भरने में गंवा दिया.

जब अक्षय यह कह रहे थे कि ‘सिर्फ 5 रुपया प्रतिदिन में आप अपना स्वास्थ बीमा करा सकते हैं’ तो मुझे अपने पड़ोस में रहने वाले इजाज अहमद की याद आ गयी. उनसे कुछ दिन पहले ही मेरी मुलाक़ात मोहल्ले के नुक्कड़ पर हुई थी.

इजाज परेशान थे, उनकी माता जी का ऑपरेशन होना था और उनके पास पैसे नहीं थे. पता नहीं अक्षय कुमार की बात सुनकर या खुद की ही अक्ल से इजाज ने अपने परिवार के लिए स्वास्थ बीमा ले तो लिया था लेकिन इंटरनेट बंद होने के चलते उसका इस्तेमाल नहीं कर पा रहे थे. ‘अस्पताल वाले भी बेचारे क्या करें. वो लोग भी लाचार हैं,’ इजाज ने मुझे बताया था.

इजाज की ही तरह घाटी में हजारों लोग इस समय अपने परिजनों का इलाज कराने के लिए दूसरों के मोहताज हो गए हैं. इन लोगों में ख़ासी तादाद ऐसे लोगों की है जिनके पास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्वास्थ योजना का ‘गोल्ड कार्ड’ है. लेकिन बावजूद इसके इन्हें औरों से इलाज के लिए पैसे मांगने पड़ रहे हैं. जिनके पास पैसे हैं उनको भी बैंक या एटीएम से निकालने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है.

बैंक भी छुप-छुपा के काम कर रहे हैं. हाल ही में जम्मू-कश्मीर बैंक की एक शाखा का जेनरेटर किसी ने जला दिया था और उसके बाद मिलीटेंट्स ने बैंक वालों को धमकी दे दी कि वे काम न करें. ‘ऐसे में पिछले 5 दिनों से बैंक से अपने ही पैसे लेने के लिए, एक शाखा से दूसरी और एक एटीएम से दूसरी तक भटक रहा हूं लेकिन अभी पैसे नहीं मिले’ अनंतनाग जिले के ज़मीर अहमद, जिनको अपने बेटे के इलाज के लिए श्रीनगर के एक हस्पताल जाना था, सत्याग्रह से कहते हैं.

दिल में यह सवाल था कि क्या अक्षय कुमार को पता होगा भारत में हजारों लोग अभी ऐसे हैं जो बीमा होते हुए भी उसका इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं.

खैर, अक्षय कुमार कहां मेरे सवाल का जवाब देने के लिए रुकने वाले थे. ध्यान फिर से टीवी की तरफ गया तो अक्षय कुमार वहां से जा चुके थे और स्क्रीन पर अब गूगल सर्च का विज्ञापन आ रहा था. इसमें एक जोड़ा अपनी शादी के लिए ‘वैडिंग फॉटोग्राफर’ की तलाश कर रहा था.

उन्हें फॉटोग्राफर मिल जाता है और धूमधाम से उनकी शादी भी हो जाती है. विज्ञापन देखकर ध्यान मरियम बानो की तरफ गया, जिनकी बेटी की शादी अभी कुछ समय पहले ही हुई है.

मरियम, जो एक विधवा हैं, ने शादी के लिए 40 हजार रुपये देकर एक मैरिज हाल बुक किया था. लेकिन जब शादी का वक्त आया तो मैरिज हाल वालों से संपर्क करना संभव नहीं था. वैसे इसकी जरूरत भी नहीं पड़ी क्यूंकि 300 मेहमानों में से सिर्फ 30 या 40 ही आ पाये थे.

तो कुल मिलाकर सिर्फ विदाई हुई और वह भी इस तरह से कि उसके होते-होते मरियम का कलेजा हलक में आ गया था. दूल्हे को चार बजे आने को कहा गया था लेकिन वह 9 बजे पहुंचा. ‘पता चला कि उसको सुरक्षाकर्मियों ने कम से कम सात जगहों पर रोका था और आगे जाने की अनुमति नहीं दे रहे थे’ मरियम सत्याग्रह को बताती हैं.

जैसे-तैसे दूल्हा पहुंचा और शादी हुई. अब हालात थोड़े सामान्य हो गए हैं तो रिश्तेदार आकर फोटो दिखाने को कहते हैं. मरियम मोबाइल से खींची कुछ तस्वीरें उन्हें मोबाइल पर ही दिखा देती हैं.

इन ख़यालों से ध्यान भटकाने के लिए मैंने सोचा कोई फिल्म ही देख लूं. खोजा तो देखा अजय देवगन की सिंघम किसी चैनल पर चल रही है. दस पंद्रह मिनट तो रोहित शेट्टी की अद्भुत मार-धाड़ में निपट गए. फिर देखा कि अजय देवगन फिल्म में अपने होने वाले ससुर को उनका ड्राइविंग लाइसेंस एक्सपायर होने के लिए फटकार लगा रहे थे. ‘कल सुबह आरटीओ ऑफिस आ जाइएगा दो फोटो लेकर, स्माइल के साथ’ सिंघम अपने ससुर से कहते हैं.

‘काश इतना आसान होता’ मैं सोचने लगा, क्यूंकि फिर मुझे मुझे गुलजार अहमद डार याद आ गए थे, जो अपना परिवार चलाने के लिए ड्राइवर का काम करते हैं. उनका भी सिंघम के ससुर की तरह ड्राइविंग लाइसेंस एक्सपायर हो गया है. पिछले एक महीने से गुलजार श्रीनगर के आरटीओ ऑफिस के चक्कर काट रहे हैं लेकिन इस लेख को लिखे जाने तक उनका लाइसेंस रिन्यू नहीं हुआ है.

‘मैं अपनी जान जोखिम में डालकर गाड़ी लेकर निकल पड़ता, लेकिन पुलिस वाले चालान काट देते हैं और वह भी इतना कि आदमी भर ही नहीं पाये. आरटीओ ऑफिस वाले कह रहे हैं कि इंटरनेट बेन हटने से पहले वे कुछ नहीं कर सकते’ गुलजार सत्याग्रह को बताते हैं.

‘न नए लाइसेन्स, न रिन्यूवल और न लर्नर्स लाइसेन्स, कोई भी सुविधा नहीं दे पा रहे हैं हम. और ऐसा तब तक चलता रहेगा जब तक इंटरनेट नहीं चल जाता है यहां’ अपनी मजबूरी बताते हुए श्रीनगर के आरटीओ ऑफिस के एक अधिकारी सत्याग्रह से कहते हैं.

में अभी भी सिंघम देख ही देख रहा था कि बीच में विज्ञापन फिर आ गए. इस बार एक ऑनलाइन शॉपिंग की वैबसाइट का विज्ञापन था, ‘क्रोमा’. शायद नयी वैबसाइट है, मैंने कभी पहले नाम नहीं सुना था. विज्ञापन में पूरा क्या था यह तो मैंने ध्यान से नहीं देखा लेकिन उसका संदेश यह था कि क्रोमा वाले आप तक सिर्फ तीन घंटे में चीजें पहुंचा देते हैं. मैं हंस पड़ा.

कुछ समय पहले मेरे पिताजी को जोड़ों के दर्द के लिए डॉक्टर ने एक अच्छा स्पोर्ट्स शू पहनने की सलाह दी थी. मैंने ऑनलाइन एक अच्छा सा जूता देखा और ऑर्डर कर दिया. क्रोमा की तरह तीन घंटे में तो नहीं, एक हफ्ते में वह एमज़ोन से आने वाला था.

अब किसी वेयरहाउस में पड़ा वह धूल खा रहा होगा. देश के अन्य भागों की तरह कश्मीर में भी जगह-जगह लोगों ने ऑनलाइन शॉपिंग की डिलीवेरी सेवाएं अपने ज़िम्मे लेकर वेयरहाउस बना लिए हैं. ‘मेरे वेयरहाउस में लाखों का माल धूल में सड़ रहा है. और पिछले दो महीनों से कोई नया माल नहीं आया है. हमारे खाने के लाले पड़ गए हैं’ दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले में एक ऐसा ही डिलीवरी सेंटर चला रहे, मुश्ताक़ अहमद मीर, सत्याग्रह को बताते हैं.

मुश्ताक के बारे में मैं सोचा ही रहा था कि मेरे बेटे की बात से मेरा ध्यान टूटा. ‘मैंने अपनी साइकिल के लिए लाइट मंगाई थी. कब आएगी’ उसने पूछा तो मैं जवाब में बस ‘जल्दी’ बोल पाया.

टीवी की तरफ फिर ध्यान गया तो देखा गूगल सर्च का एक और विज्ञापन चल रहा था. इस बार एक गंजा व्यक्ति अपने लिए हज्जाम ढूंढ रहा था, ‘सलोन्स नियर मी’

‘मुझे भी बाल कटवाने हैं’ मैंने सोचा. नहीं, गंजे को देखकर नहीं, विज्ञापन देखकर. लेकिन कश्मीर में इस समय बाल कटवाना भी और कामों की तरह ही असंभव सा हो गया है.

पांच अगस्त से पहले ही सरकार के आदेश के अनुसार कश्मीर घाटी से बाहर के राज्यों से यहां आए सारे लोग चले गए थे और उसमें उत्तर प्रदेश के बिजनौर से आए सैंकड़ों नाई भी शामिल हैं. पिछले कुछ साल में इन नाइयों ने पूरी तरह से कश्मीर के स्थानीय नाइयों की जगह ले ली थी.

अब ये लोग यहां नहीं हैं तो लोगों को काफी दिक्कत हो रही है. कश्मीर के स्थानीय नाई फिर मैदान में कूद तो पड़े हैं, लेकिन वे बहुत थोड़े से हैं और कारीगर भी बिजनौर वालों के मुक़ाबले के नहीं हैं.

तभी टीवी पर देखा कि क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली किसी को फिलिप्स का शेवर इस्तेमाल करने की सलाह दे रहे हैं. मैं मुस्कुरा दिया और सोचा कि चलो दाढ़ी तो बना ही सकता हूं.

उकताकर मैंने चैनल बदला और सोचा थोड़ी देर न्यूज़ देख लूं. देखा एनडीटीवी पर एक महिला कह रही थीं कि उनके माता-पिता बीमार हैं और उनका सारा पैसा उस बैंक में पड़ा हुआ है जो वे निकाल नहीं पा रही हैं. साथ में वित्त मंत्री, निर्मला सितारमण के दफ्तर के बाहर ऐसे ही कुछ अकाउंट होल्डर्स के किए गए प्रदर्शन की भी खबर भी थी.

ध्यान फिर कश्मीर के बीमारों की तरफ गया. ‘कम से कम यह लोग प्रदर्शन तो कर पाते हैं’ मैंने सोचा. फिर निराश होकर रिमोट उठाया और टीवी बंद करने लगा तो एनडीटीवी पर भी विज्ञापन चलने लगा था, ‘एयरटेल एक्स-स्ट्रीम’ का, जिसमें नेट्फ़्लिक्स और एमज़ोन प्राइम देखने को मिलता है.

यह सोचकर कि इंटरनेट चलेगा तो नेट्फ़्लिक्स और एमज़ोन प्राइम देखूंगा, मैंने अपना टीवी बंद कर दिया.