सौरव गांगुली ने आज बीसीसीआई अध्यक्ष का पदभार संभाल लिया है. इस कुर्सी पर बैठने वाले वे 39वें शख्स हैं. 47 साल के सौरव गांगुली इस पद के लिए निर्विरोध चुने गए हैं. वे जुलाई 2020 तक इस पद पर रहेंगे.

ड्रेसिंग रूम से बोर्ड रूम तक पहुंचे सौरव गांगुली का क्रिकेट प्रशासन के शीर्ष तक का सहज सफर उनके खेलने के दिनों की याद दिलाता है जब ऑफ साइड पर उनके कलात्मक खेल का कोई सानी नहीं होता था. खिलाड़ी के रूप में अपने शीर्ष के दौरान सौरव गांगुली सात खिलाड़ियों की मौजूदगी के बावजूद ऑफ साइड में आसानी से रन बनाकर विरोधी टीमों को हैरान कर देते थे. इसी तरह वे विश्व क्रिकेट के शीर्ष पदों में से एक बीसीसीआई अध्यक्ष पद के लिए सभी को पछाड़ते हुए सर्वसम्मत उम्मीदवार बनकर उभरे.

इसके साथ ही दुनिया के सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड के शीर्ष तक सौरव गांगुली के सफर ने एक बार फिर इस कहावत को सही साबित कर दिया कि ‘एक नेतृत्वकर्ता हमेशा नेतृत्वकर्ता’ रहता है. उनके अंदर नेतृत्व क्षमता नैसर्गिक रूप से थी. साल 2000 में उन्हें उस समय भारतीय टीम का कप्तान बनाया गया था जब टीम इंडिया मैच फिक्सिंग के रूप में अपने सबसे बुरे दौर का सामना कर रही थी. सौरव गांगुली जिम्मेदारी से पीछे नहीं हटे और उन्होंने इसे चुनौती के रूप में लेते हुए प्रतिभावान लेकिन दिशाहीन युवा खिलाड़ियों के समूह को एक विश्व स्तरीय टीम में बदला.

इसके साथ ही सौरव गांगुली ने उस पीढ़ी के दिग्गजों के साथ अच्छे रिश्ते भी बनाए. चाहे एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में महान बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर के साथ उस समय की सबसे घातक सलामी जोड़ी बनाना हो या युवराज सिंह और वीरेंद्र सहवाग जैसे उभरते हुए खिलाड़ियों का समर्थन, सौरव गांगुली ने हमेशा अपने फैसलों पर भरोसा किया और इन्हें सहजता से लिया.

हालांकि सौरव गांगुली को बड़े खिलाड़ी से शीर्ष प्रशासक तक के सफर को सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए उन कई चुनौतियों से पार पाना होगा जिसका सामना फिलहाल भारतीय क्रिकेट को करना पड़ रहा है. खिलाड़ी के रूप में वे ऐसा करने में सफल रहे और कई मानते हैं कि अब प्रशासक के रूप में भी वे ऐसा करने में सक्षम हैं. भारत को अपनी कप्तानी में 21 टेस्ट जिताने वाले और 2003 विश्व कप के फाइनल में पहुंचाने वाले सौरव गांगुली को बंगाल क्रिकेट संघ के साथ प्रशासक के रूप में काफी अनुभव है. वह पहले इस संघ के सचिव और फिर अध्यक्ष रहे. अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 18 हजार से अधिक रन बनाने वाले गांगुली निश्चित तौर पर ईडन गार्डन्स के कार्यालय में बैठकर मिले अनुभव का इस्तेमाल बीसीसीआई के संचालन में करेंगे.

सौरव गांगुली को बीसीसीआई की कार्यप्रणाली की भी जानकारी है क्योंकि वे बोर्ड की तकनीकी समिति और सचिन तेंदुलकर तथा वीवीएस लक्ष्मण के साथ क्रिकेट सलाहकार समिति के सदस्य रह चुके हैं. प्रशासकों की समिति के 33 महीने के कार्यकाल के बाद बीसीसीआई की बागडोर संभालने वाले सौरव गांगुली के पास भारतीय क्रिकेट की छवि सुधारने के लिए केवल नौ महीने का समय है जिसे 2013 के आईपीएल स्पाट फिक्सिंग प्रकरण से नुकसान पहुंचा था. छवि में इस सुधार को उन्होंने अपनी प्राथमिकता भी बताया है.

सौरव गांगुली की कप्तानी में स्वाभाविकता और आक्रामकता दिखती थी. उनकी नेतृत्व क्षमता की एक बार फिर परीक्षा होगी जब वे अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद में भारत को दोबारा उसकी मजबूत स्थिति दिलाने का प्रयास करेंगे. संभावना है कि सौरव गांगुली की अगुआई वाले बीसीसीआई और इस खेल को चलाने वाली संस्था आईसीसी के बीच रस्साकशी देखने को मिल सकती है क्योंकि आईसीसी के प्रस्तावित भविष्य दौरा कार्यक्रम (एफटीपी) का बीसीसीआई के राजस्व पर गहरा असर पड़ सकता है. क्रिकेट का नया संचालन ढांचा तैयार करने के लिए नवगठित कार्य समूह में आईसीसी के भारत को जगह न देने से स्थिति और जटिल हो गई है.

इसके अलावा घरेलू मोर्चे पर भी चुनौतियां कम नहीं हैं. कप्तान के रूप में भारतीय टीम को आगे बढ़ाने के लिए सौरव गांगुली को लगातार पांच साल मिले थे लेकिन इस बार उनके पास कुछ महीनों का ही समय होगा क्योंकि उन्हें अगले साल अनिवार्य ब्रेक लेना होगा. सौरव गांगुली ने खुद स्वीकार किया है कि बोर्ड में ‘आपातकाल जैसी स्थिति’ है, लेकिन कई मानते हैं कि इस दिग्गज को पता है कि इस स्थिति से कैसे निपटना है क्योंकि खिलाड़ी के रूप में अपने सफर के दौरान भी सौरव गांगुली ऐसी स्थिति का सामना कर चुके हैं.