लोकसभा चुनाव - 2019 में हरियाणा में एक नारा जमकर उछला था. वह था ‘ऊपर मोदी, नीचे दुष्यंत’. इस नारे का मतलब था - दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सत्ता और हरियाणा में दुष्यंत चौटाला की. अब यह नारा काफी हद तक सही साबित होता दिख रहा है. हरियाणा विधानसभा चुनाव के ताजा रुझानों के मुताबिक दुष्यंत चौटाला की जननायक जनता पार्टी (जजपा) प्रदेश में किंगमेकर की भूमिका निभा सकती है. रुझानों के मुताबिक प्रदेश की 90 विधानसभा सीटों में से भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस 35-35 सीटों के साथ एक-दूसरे को कांटे की टक्कर दे रही हैं.

अधिकतर एग्ज़िट पोल्स ने हरियाणा में भाजपा को स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बनाते हुए दिखाया था. लेकिन ताजा रुझानों में जजपा 10 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है. ऐसे में इस बात की प्रबल संभावना है कि दुष्यंत जिस पार्टी के साथ जाएंगे, राज्य में सरकार उसी की बनेगी.

जननायक जनता पार्टी को दुष्यंत चौटाला ने करीब ग्यारह महीने पहले अपने दादा ओमप्रकाश चौटाला और चाचा अभय चौटाला से अनबन के बाद खड़ा किया था. तभी से वह सूबे में अपनी उपस्थिति दर्ज कर पाने में सफल रही है. जजपा ने सबसे पहले राजनैतिक विश्लेषकों का ध्यान इसी साल मार्च में तब खींचा था जब जींद में विधानसभा का उपचुनाव हुआ था. तब भाजपा की तरफ़ से कृष्णा मिड्ढा, कांग्रेस की तरफ़ से पार्टी के राष्ट्रीय संचार प्रमुख रणदीप सुरजेवाला और जजपा की तरफ़ से दुष्यंत चौटाला के छोटे भाई दिग्विजय चौटाला मैदान में थे.

उस चुनाव में जीत का सेहरा भले ही कृष्णा मिड्ढा के सिर बंधा, लेकिन सुर्ख़ियां सुरजेवाला जैसे कद्दावर नेता को पीछे छोड़कर दिग्विजय चौटाला ने बटोरी थीं. तभी से दुष्यंत और दिग्विजय चौटाला को हरियाणा की राजनीति में लंबी रेस का घोड़ा माना जाने लगा था. इस दौरान जजपा पर ‘बच्चों की पार्टी’ जैसे तंज भी जमकर कसे गए. लेकिन इस विधानसभा चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन ने आलोचकों का मुंह बंद कर दिया है.

एक साल से भी कम समय में जजपा को प्रदेश राजनीति के शिखर पर पहुंचाने का श्रेय जिन कारणों को दिया जा रहा है उनमें दुष्यंत चौटाला सबसे प्रमुख हैं. अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत से ही दुष्यंत, दादा ओमप्रकाश चौटाला के दायरे से बाहर जाकर अपनी अलग पहचान बनाने में जुट गए थे. यहीं से वे अपने चाचा और दादा की आंखों में खटकने लगे थे. लेकिन क्षेत्र में अपनी जबरदस्त पकड़ के चलते दुष्यंत 2014 के लोकसभा चुनाव में सांसद बन पाने में सफल रहे. तब उनकी उम्र महज 25 साल ही थी और उस लोकसभा चुनाव में एक से एक दिग्गज नेता भी मोदी लहर में धराशाई हो गए थे.

अपने सहज स्वभाव, मुद्दों पर पकड़ और गंभीर छवि के चलते दुष्यंत हरियाणा के जाट युवाओं के बीच खासे लोकप्रिय हैं. इसके अलावा दुष्यंत जजपा के अस्तित्व में आने के बाद से ही अपने परदादा चौधरी देवीलाल के नाम पर लोगों से समर्थन जुटाते रहे हैं. अपनी चुनावी सभाओं में खेती-किसानी के मुद्दों को प्रमुखता से उठाकर उनकी पार्टी ने ताऊ देवीलाल से जुड़ाव महसूस करने वाले किसानों को अपने पक्ष में लाने की हरसंभव कोशिश की है, जो अब काफी हद तक सफल होती दिख रही है.

जजपा के अब तक के सफ़र में दुष्यंत चौटाला के छोटे भाई दिग्विजय चौटाला की भूमिका भी सकारात्मक मानी जाती है. लेकिन पार्टी को राजनीति के अर्श पर पहुंचाने के पीछे अभय चौटाला के अप्रत्यक्ष योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. आरक्षण के मुद्दे पर सूबे के जाट मतदाताओं में भाजपा के लिए जबरदस्त नाराजगी है. लेकिन इसे दरकिनार करते हुए अभय का भाजपा के प्रति झुकाव किसी से नहीं छिपा है. इस वजह से कहा जा रहा था कि प्रदेश के जाट इस बार ओमप्रकाश चौटाला की इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) को समर्थन देने से झिझकेंगे. और हुआ भी यही.

हरियाणा के राजनैतिक विश्लेषक एकमत से मानते हैं कि इस चुनाव में प्रदेश के जो जाट मतदाता कांग्रेस के साथ नहीं गए, वे सभी और बंटने के बजाय पूरी तरह से जजपा की तरफ शिफ्ट हो गए. हरियाणा का राजनीतिक इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि प्रदेश के मतदाता अक्सर नई पार्टियों पर अपना भरोसा जताते रहे हैं. इनेलो और पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल की हरियाणा जनहित कांग्रेस (हजका) इसकी बानगी के तौर पर देखी जा सकती हैं.

बहरहाल, अब सवाल यह है कि दुष्यंत चौटाला, कांग्रेस या भारतीय जनता पार्टी में से किसके साथ जाना पसंद करेंगे? इस बारे में दुष्यंत ने मीडिया को यह बयान दिया है कि ऐसा कोई भी निर्णय विधायक दल की बैठक में सर्वसम्मति से लिया जाएगा. लेकिन जानकारों का कहना है कि दुष्यंत अपने चाचा अभय चौटाला जैसी ग़लती हरगिज नहीं करेंगे. यहां उनका इशारा भाजपा को समर्थन देने से है. विश्लेषकों के मुताबिक पैंतीस बनाम एक यानी ‘सभी ग़ैरजाट बनाम जाट’ बिरादरी के दुर्भाग्यपूर्ण द्वंद में फंसे हरियाणा में दुष्यंत हाल-फिलहाल अपने समुदाय या कहें कि अपने प्रबल समर्थक जाट मतदाताओं को नाराज़ करने का ख़तरा मोल लेने से बचना चाहेंगे.

कुछ अन्य का यह भी कहना है कि दुष्यंत अपने लिए जिस तरह का स्वतंत्र राजनीतिक वज़ूद चाहते हैं, नरेंद्र मोदी और अमित शाह के वर्चस्व वाली भाजपा में उसे हासिल कर पाना मुश्किल है. ऐसा कहने वाले मानते हैं कि भाजपा को समर्थन देकर दुष्यंत फिर से उसी दुविधा में फंस जाएंगे जिससे वे इनेलो में जूझ रहे थे. वहीं प्रदेश के एक वरिष्ठ पत्रकार की मानें तो विधानसभा चुनाव में यदि इनेलो को अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा का समर्थन हासिल था तो जजपा को कांग्रेस से मदद मिल रही थी. इसलिए भी दुष्यंत कांग्रेस का हाथ थामना ज्यादा मुनासिब समझेंगे.

कांग्रेस के कद्दावर नेताओं के बयानों से भी इसी बात का इशारा मिल रहा है कि पार्टी दुष्यंत को साथ लाने में कोई भी कसर नहीं छोड़ेगी. लेकिन इसमें भी कोई दो राय नहीं कि कांग्रेस हाईकमान के लिए अशोक तंवर को हटवाकर प्रदेश संगठन की कमान संभालने वाले भूपेंद्र सिंह हुड्डा और महत्वाकांक्षी दुष्यंत चौटाला के बीच गठबंधन करवा पाना बहुत आसान नहीं होगा.

लेकिन इसके इतर एक पहलू ऐसा भी है जिस पर ज्यादातर लोगों का अभी ध्यान नहीं जा रहा है. बीते कुछ वर्षों में जिस तरह से विधायकों के खरीद-फरोख्त का माहौल देश में बना है उसके बीच दुष्यंत के सामने अपने विधायकों को अपने साथ बांधे रखना एक बड़ी चुनौती साबित हो सकती है. और जब सामने हर हाल में सरकार बनाने में माहिर माने जाने वाले भाजपा अध्यक्ष अमित शाह हों तो यह चुनौती कहीं ज्यादा बड़ी हो जाती है. उस पर हरियाणा पहले से ही विधायकों के दलबदल के लिए बदनाम रहा है.

2009 के विधानसभा चुनाव में आज की जजपा की तरह हरियाणा जनहित कांग्रेस के छह विधायक जीते थे. उस समय हजपा प्रमुख कुलदीप बिश्नोई का भी क़द दुष्यंत चौटाला की तरह ही रातों-रात बढ़ गया था. लेकिन ऐन मौके पर हजका के पांच विधायक कांग्रेस में शामिल हो गए. किसी पार्टी के दो-तिहाई विधायकों के दूसरी पार्टी में चले जाने पर दल-बदल कानून का उल्लंघन नहीं होता. इसलिए कुलदीप बिश्नोई के सामने उस समय कोई और विकल्प नहीं बचा था, सिवाय हाथ मलते रह जाने के.

दुष्यंत चौटाला हरियाणा के इस इतिहास और अपनी क्षमताओं को जानते ही होंगे. इसलिए उनके समर्थक यह आशा ही कर सकते हैं कि वे ऐसी हर परिस्थिति के लिए पहले से ही तैयार होंगे.