महाराष्ट्र में हुए विधानसभा चुनाव में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और शिव सेना का गठबंधन बहुमत के आंकड़े तक पहुंच गया है. भाजपा और शिवसेना की यहां फिर से सरकार भले बन रही हो लेकिन दोनों की सीटें पिछले चुनाव के मुकाबले काफी कम हुई हैं.

पिछले पांच साल से महाराष्ट्र सरकार का नेतृत्व कर रही भाजपा ने 2014 के चुनावों में 122 सीटों पर जीत हासिल की थी. इस बार उसकी सीटें 105 पर ही सिमट गई हैं. उसकी सहयोगी शिव सेना ने पिछले चुनावों में 63 सीटें जीती थी. इस बार उसकी सीटें भी 56 ही रह गई है. शिवसेना का नुकसान भाजपा के मुकाबले कम तो है लेकिन एक समय यह माना जा रहा था कि उसकी सीटें बढ़ेंगी. कांग्रेस महाराष्ट्र में पिछली बार 42 सीटें जीतकर भी तीसरी सबसे बड़ी पार्टी थी. वह इस बार 44 सीटों के साथ चौथे नंबर पर पहुंच गई है.

महाराष्ट्र में सबसे अधिक फायदा शरद पवार की पार्टी एनसीपी को हुआ है जिसे इस बार पिछली बार की 42 सीटों के मुकाबले 54 सीटें मिली हैं. वह भी तब जब उसका शीर्ष नेतृत्व कई विवादों में फंसा रहा है और उसके सबसे बड़े नेता शरद पवार ने चुनाव राजनीति छोड़ दी है. आखिर ऐसा क्या हुआ कि एनसीपी ने लोकसभा चुनावों में मिली हार के बाद भी अपने प्रदर्शन को बेहतर कर लिया और शिवसेना लोकसभा में मिली बड़ी जीत को विधानसभा में नहीं दुहरा पाई. महाराष्ट्र में कांग्रेस की हालत आज यह हो गई है कि इस प्रदेश में अब तक वह एनसीपी के साथ गठबंधन को नेतृत्व देने की भूमिका में थी. लेकिन एनसीपी से कम सीटें जीतकर अब वह उसके सहयोगी की भूमिका में आ गई है.

सबसे पहले यह समझते हैं कि महाराष्ट्र में शिव सेना और कांग्रेस लगातार कमजोर क्यों पड़ते जा रहे हैं? महाराष्ट्र के चुनावों को जिन लोगों ने करीब से देखा है, वे मानते हैं कि शिवसेना जिस तरह की राजनीति किया करती थी, उस शैली को उसने छोड़ दिया है. बाल ठाकरे द्वारा शुरू की गई पार्टी उनके समय में आक्रामक राजनीति के लिए जानी जाती थी. लेकिन जब से शिवसेना की कमान उद्धव ठाकरे के हाथों में आई है, तब से धीरे-धीरे उसका व्यवहार बदलता गया है.

उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे के राजनीति में सक्रिय होने के बाद से तो शिवसेना की आक्रामक राजनीति और भी पीछे छूटती हुई दिख रही है. इसके अलावा राज ठाकरे के शिवसेना से अलग होने की वजह से भी पार्टी को काफी नुकसान हुआ है. बल्कि कुछ लोगों का यह मानना है कि कि अगर राज छाकरे अभी भी शिवसेना में होते तो शायद पार्टी का चरित्र अब भी लगभग वैसा ही होता जैसा बाल ठाकरे के समय हुआ करता था. लंबे समय से शिवसेना की राजनीति को देखने-समझने वाले लोग कहते हैं कि इन वजहों से कभी महाराष्ट्र में भाजपा की सीनियर पार्टनर रही शिवसेना ने खुद को भाजपा का जूनियर पार्टनर बना लिया है.

इसी तरह महाराष्ट्र में कांग्रेस के लगातार नाकाम होने के पीछे भी कई वजहों को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है. सबसे पहली बात तो यही कही जा रही है कि प्रदेश स्तर के नेताओं के बीच कांग्रेस में इतनी आं​तरिक खींचतान है कि इसका नुकसान उसे लगातार चुनावों में उठाना पड़ रहा है. इसकी एक वजह यह भी है कि प्रदेश स्तर पर पार्टी के पास कोई ऐसा नेता नहीं है जिसके बारे में यह कहा जा सके कि पूरी कांग्रेस उसके नेतृत्व में एकजुट है और उसका अपना मजबूत जनाधार है. इस पूरे चुनाव में कोई भी नेता ऐसा नहीं दिखा जिसके बारे में कहा जा सके कि वह प्रदेश में कांग्रेस का चेहरा है. पार्टी के राष्ट्रीय नेता भी महाराष्ट्र में बहुत दिलचस्पी नहीं ले रहे थे. महाराष्ट्र चुनावों के दौरान ऐसा लग रहा था कि कांग्रेस सुनियोजित ढंग से कोई प्रचार अभियान ही नहीं चला रही है. यही वजह है कि कांग्रेस की जूनियर पार्टनर रही एनसीपी आज महाराष्ट्र में उससे अधिक सीटें लेकर आई है.

महाराष्ट्र चुनाव के सबसे बड़े नायक बनकर उभरे हैं शरद पवार. भले ही वे अपनी पार्टी और गठबंधन को सरकार बनाने लायक सीटें नहीं दिला पाए हों लेकिन जिस ढंग से उन्होंने एनसीपी को इन चुनावों में सफल बनाया है, उसकी चर्चा चारों तरफ हो रही है. कहा जा रहा है कि 79 साल के होने जा रहे शरद पवार ने यह दिखा दिया है कि अगर भाजपा के विस्तार के इस दौर में भी अगर ढंग से कोशिश की जाए तो मजबूती से उसका मुकाबला किया जा सकता है.

शरद पवार पिछला लोकसभा चुनाव नहीं लड़े थे और उन्होंने एक तरह से चुनावी राजनीति से संन्यास ले लिया है. लेकिन जिस तरह से उन्होंने महाराष्ट्र चुनाव में एनसीपी का नेतृत्व किया, उससे उन्होंने पार्टी में जान फूंक दी. चुनाव प्रचार के दौरान सतारा में उन्होंने बारिश में भीगते हुए जिस तरह से सभा को संबोधित किया, उसकी काफी चर्चा हुई. लेकिन सतारा पहला उदाहरण नहीं है जहां शरद पवार ने अपनी जीवटता का प्रदर्शन किया हो. और भी कई मौके ऐसे रहे जब उन्होंने ‘निश्चत हार’ की आशंकाओं के बावजूद बहुत मजबूती से विपक्ष के प्रचार अभियान को थामे रखा.

शरद पवार ने महाराष्ट्र चुनावों के विमर्श को कई तरह से प्रभावित करने की कोशिश की. इसमें जहां जरूरत पड़ी उन्होंने जनता से सीधे तौर पर माफी भी मांगी. जिस सतारा की सभा का जिक्र पहले किया गया है, उसमें पवार का कहना था कि लोकसभा चुनाव में उनसे यहां का उम्मीदवार देने में गलती हो गई थी लेकिन अब इस गलती को सुधारने का वक्त आ गया है. चुनाव प्रचार के दौरान पवार ने अपनी इस तरह की राजनीतिक सूझबूझ से कई बार सत्ता पक्ष के वारों को बेअसर करने का प्रयास किया और इस वजह से वे महाराष्ट्र चुनावों में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन का सबसे प्रमुख चेहरा बन गए.

खुद को प्रवर्तन निदेशालय का नोटिस मिलने के बाद शरद पवार ने जिस तरह से उसका सामना किया वह भी उनकी राजनीतिक सूझ-बूझ का ही एक उदाहरण है. विपक्षी नेताओं पर जिस तरह से केंद्र सरकार की एजेंसियां कार्रवाई कर रही हैं उसे विपक्ष की ओर से बदले की कार्रवाई कहा जा रहा है. इसी कड़ी में शरद पवार पर भी प्रवर्तन निदेशालय ने कार्रवाई करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने इसका इस्तेमाल कुछ इस तरह से किया कि लोगों में उनके प्रति सहानुभूति पैदा हो गई.

शरद पवार को मिले नोटिस के खिलाफ महाराष्ट्र के अलग-अलग शहरों में उनके समर्थकों ने बंद आयोजित किये. इससे एनसीपी के कार्यकर्ताओं में एक नए ढंग का उत्साह पैदा हुआ. शरद पवार ने घोषणा की कि वे खुद ही जांच के लिए प्रवर्तन निदेशालय के मुंबई कार्यालय में जाएंगे. उनके जाने की तारीख आते-आते ऐसा माहौल बना कि मुंबई पुलिस को खुद शरद पवार से अनुरोध करना पड़ा कि वे वहां नहीं जाएं क्योंकि इससे कानून व्यवस्था की समस्या पैदा हो सकती है. इसके बाद शरद पवार वहां नहीं गए.

एनसीपी के एक नेता इस बारे में कहते हैं, ‘भाजपा ने सोचा भी नहीं था कि शरद पवार इस मामले को इस तरह से मोड़ देंगे. जब उनके पक्ष में जनता आने लगी तब भाजपा को अपनी गलती का अहसास हुआ और फिर न सिर्फ मुंबई पुलिस की ओर से उनसे प्रवर्तन निदेशालय नहीं जाने का अनुरोध किया गया बल्कि भाजपा के कुछ नेताओं ने भी उन्हें फोन करके वहां नहीं जाने को कहा. लेकिन तब तक शरद पवार इसका राजनीतिक इस्तेमाल कर चुके थे. इससे दो फायदे हुए. एक तो हमारे कार्यकर्ताओं में इस बात को लेकर उत्साह आया कि हमारा नेता संघर्ष के लिए पूरी तरह तैयार है और दूसरे विपक्षी नेताओं की तरह भाजपा के सामने आत्मसमर्पण नहीं कर रहा है. वहीं दूसरी बात यह हुई कि कांग्रेस की ओर से किसी के नेतृत्व की स्थिति में नहीं रहने की वजह से शरद पवार विपक्षी गठबंधन का चेहरा बन गए.’

महाराष्ट्र भाजपा के एक नेता इस बारे में कहते हैं, ‘शरद पवार को चुनाव के समय प्रवर्तन निदेशालय का नोटिस दिलाना बड़ी गलती थी. पिछले पांच सालों से हमारी सरकार भले हो लेकिन अगर सिर्फ अपने दम पर जनाधार की बात हो तो महाराष्ट्र में सभी पार्टियों के नेताओं में शरद पवार सबसे आगे हैं. राजनीतिक तौर पर उनका दिमाग जितना तेज चलता है और उनके पास जो जनाधार है, उसमें वे ऐसी किसी भी गलती का राजनीतिक लाभ लेने का अवसर नहीं छोड़ेंगे.’

इसके अलावा शरद पवार ने महाराष्ट्र चुनावों में भाजपा के बड़े मुद्दों के मुकाबले बुनियादी मुद्दों को बार-बार उठाने का काम किया. वे महाराष्ट्र के कृषि संकट, पानी की समस्या और बेरोजगारी का मसला अपनी चुनावी सभाओं में लगातार उठाते रहे. इसमें भी वे हर मुद्दे को महाराष्ट्र की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के साथ उठा रहे थे. वे अपने भाषणों में शिवाजी के शासन का जिक्र कर रहे थे और बता रहे थे कि कैसे भाजपा ने महाराष्ट्र के गौरवशाली इतिहास और उस दौर के शासकों के सिद्धांतों को तार-तार करने का काम किया है.

उदाहरण के तौर पर एक सभा में उन्होंने एनसीपी और कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने वाले नेताओं का जिक्र किया. उन्होंने इसे शिवाजी महाराज के शासन काल से जोड़ा और कहा कि पाला बदलने वालों को शिवाजी महाराज कभी माफ नहीं करते थे और यही महाराष्ट्र की परंपरा है. चुनाव परिणाम आने के बाद भी शरद पवार ने यह बात दोहराई कि दल-बदल करने वालों को जनता ने खारिज कर दिया. चुनाव के दौरान पानी की उपलब्धता के मसले को भी मराठा शासन से जोड़ने की कोशिश वे बार-बार करते रहे.

उनकी इन कोशिशों का फायदा एनसीपी को मिला. भले ही एनसीपी महाराष्ट्र में सरकार बनाने की स्थिति में नहीं पहुंची, लेकिन इन्हीं वजहों आज 78 साल के शरद पवार को दूसरी विपक्षी पार्टियों के लिए उदाहरण पेश करने वाले नायक की तरह पेश किया जा रहा है.