निर्देशक: तुषार हीरानंदानी
लेखक: बलविंदर जनुजा
कलाकार: भूमि पेडनेकर, तापसी पन्नू, विनीत सिंह, प्रकाश झा
रेटिंग: 3/5

अगर एक दौर में आप भी आमिर खान के लोकप्रिय टीवी शो ‘सत्यमेव जयते’ के नियमित दर्शक रहे हैं तो बहुत संभावना है कि तोमर दादियों से आपकी पहली मुलाकात इसी शो के जरिए हुई हो. सालों पहले इस शो पर प्रकाशी तोमर और चंद्रो तोमर ने बताया था कि उनकी उपलब्धियां जब अखबार की सुर्खियों के जरिए तमाम लोगों तक पहुंच गईं, तब भी उन्हें, घर वालों से यह बात छुपाए रखने के लिए, उस दिन का अखबार गायब कर देना पड़ा था. यह एक बढ़िया सी बात है कि वे लोग जिन तक ये अखबार नहीं पहुंचे, उन तक ‘सत्यमेव जयते’ पहुंचा और जिन तक वह कार्यक्रम नहीं पहुंच पाया, उन तक तोमर दादियों की कहानी पहुंचाने के लिए ‘सांड की आंख’ सिनेमाई परदे पर पहुंच गई है.

‘सांड की आंख’ के बारे में पहली बात जो बहुत मजबूती से कही जा सकती है, वह यह है कि दो उम्रदराज़ महिलाओं की यह गैरपरंरागत कहानी अगर काल्पनिक होती तो शायद ही कोई इसके संभव हो सकने पर यकीन करता. और तब शायद कोई इस पर फिल्म बनाने के लिए भी तैयार नहीं होता. लेकिन हम जानते हैं कि उम्र के छह दशक पार करने के बाद शूटिंग सीखने वाली चंद्रो तोमर और प्रकाशी तोमर ने कल्पना में भी ना सोची जा सकने वाली इस बात को सालों पहले सच कर दिखाया था. उनकी यह कहानी न सिर्फ सच्चाई के कल्पना से ज्यादा नाटकीय होने की बात कहती है बल्कि इसके बेहद दुस्साहसी और मनोरंजक होने का जिक्र भी करती है. ‘सांड की आंख’ आपको कुछ ज्यादा प्रभावित इसलिए भी करती है क्योंकि यह फिल्म महिलाओं की कहानी कहने के लिए पुरुषों का सहारा नहीं लेती है और ना ही ‘मिशन मंगल’ सरीखी फिल्मों की तरह उनकी उपलब्धियों का क्रेडिट किसी महान-निस्वार्थी नायक के हवाले कर देती है.

‘फिरंगी’ और ‘मुबारकां’ जैसी फिल्में लिखने वाले बलविंदर जनुजा ने ‘सांड की आंख’ के रूप में एक प्रेरक और भरोसेमंद लगने वाली पटकथा लिखी है. यहां पर उनके लेखन का उद्देश्य केवल अपने अनोखे किरदारों के जरिए कुछ सिखाना भर नहीं है बल्कि इसके साथ वे पितृसत्तात्मक व्यवस्था और उससे उपजी बाकी बुराइयों को भी भरपूर निशाना बनाते हैं. हालांकि इन सब बातों को एक साथ न साध पाने के चलते कई बार, खास कर इंटरवल से पहले और फ्लैशबैक वाले हिस्सों में, फिल्म थोड़ी खिंचती हुई भी लगती है. लेकिन फिर भी वह अपने दर्शकों को जरूरत भर भावुकता, प्रेरणा और मनोरंजन देने में असफल नहीं होती है. लगे हाथ, जगदीप सिंधु के लिखे संवादों की भी बात करें तो ज्यादातर मौकों पर ये मारक और मनोरंजक दोनों हैं. जैसे मदर इंडिया के रेफरेंस वाले कुछेक संवाद बेहतर लिखाई के चलते आपको याद रह जाते हैं. हालांकि ये ऐसे भी नहीं है कि आपको तालियां बजाने को मजबूर हो सकें.

अभिनय पर आएं तो सबसे पहले फिल्म की कास्टिंग से जुड़ा विवाद याद आता है. फिल्म का ट्रेलर आने के बाद सत्याग्रह समेत कइयों की राय थी कि कम से कम 60 पार की महिलाओं के किरदार के लिए इसी उम्र की अभिनेत्रियों को लिया जाना था. फिल्म देखने के बाद भी हम अपने इस सुझाव पर कायम हैं कि नीना गुप्ता, दीप्ति नवल या शबाना आज़मी इनके लिए बेहतर विकल्प हो सकती थीं. और, ग्लैमर का तड़का भी लग जाता अगर उनकी युवावस्था वाला हिस्सा तापसी पन्नू और भूमि पेडनेकर से करवाया जाता. हालांकि ‘सांड की आंख’ के बारे में ऐसा सोचने की वजह तापसी और भूमि का अभिनय नहीं बल्कि उनका प्रोस्थेटिक मेकअप है. अनईवन स्किनटोन, सीन दर सीन बदलती झुर्रियां और कभी भी चेहरे से झड़ पड़ने को आतुर लगता मेकअप आपको पूरे वक्त खटकता रहता है.

भूमि पेडनेकर तो फिर भी इसे अपेक्षाकृत आसानी से संभाल लेती हैं लेकिन तापसी का युवापन कई बार न सिर्फ उनके चेहरे से बल्कि उनके एक्स्प्रेशन्स से भी बाहर आता दिखाई देता है. इसके बावजूद यह कहा जा सकता है कि ये दोनों ही ‘सांड की आंख’ की जान है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश वाली सटीक टोन में इनकी संवाद अदायगी, उसके मुताबिक देहबोली, आपसी केमिस्ट्री और कई मौकों पर कमाल की एफर्टलेस एक्टिंग इन पर नज़र बनाए रखने को मजबूर करती है. कुल मिलाकर, भूमि पूरी तरह से और तापसी उनसे थोड़ा कम, अपने किरदारों को ऐसा बनाने में कामयाब होती हैं जिन्हें आप बिना शर्त प्यार और इज्जत दे सकें.

फिल्म के अन्य किरदारों की बात करें तो पितृसत्ता के प्रतिनिधि और घर के मुखिया की भूमिका निभाने वाले प्रकाश झा भी खासा प्रभावित करते हैं. हर बार जब वे अपना तकिया कलाम ‘ये तो होणा ही था’ दोहराते हैं तो उनके लिए आपकी चिढ़न एक डिग्री और बढ़ जाती है. इसके साथ ही दादियों के कोच की भूमिका में विनीत कुमार भी बढ़िया काम तो करते हैं लेकिन एक तो उनके किरदार को जरूरी बारीकियां और तवज्जो नहीं दी गई है, दूसरा प्रौढ़ दिखाने के लिए किया गया उनका मेकअप भी खूब खटकने वाला है.

फिल्म के बाकी पक्षों पर गौर करें तो इसका फिल्मांकन ड्रामा को वजन देने वाला है. संगीत के बारे में भी यह बात दोहराई जा सकती है. सही टाइमिंग के साथ आने वाले, मूड मुताबिक गाने फिल्म की खूबसूरती बढ़ाते हैं और देर तक मन में बजते रहते हैं. खासकर, आशा भोसले के गाए ‘आसमां’ को कुछ इस तरह इस्तेमाल किया गया है कि इस दौरान आंखों को भर पाने से बचाना मुश्किल लगता है. यहां पर एक लंबे समय बाद आशा जी को सुनना भी एक अलग तरह का आनंद है.

‘मस्ती’ और ‘हाउसफुल’ सीरीज की फिल्में लिखने वाले स्थापित पटकथा लेखक तुषार हीरानंदानी ने इस फिल्म से बतौर निर्देशक डेब्यू किया है. ‘सांड की आंख’ के जरिए वे एक प्रेरक, मनोरंजक और भावुक कर देने वाला ऐसा सिनेमा रचने में सफल कहे जा सकते हैं जो आपकी दीवाली की छुट्टियां सार्थक बनाने में आपकी मदद कर सकता है.