लेखक-निर्देशक: मिखिल मुसले
कलाकार: राजकुमार राव, मौनी रॉय, बोमन ईरानी, परेश रावल, गजराज राव, सुमित व्यास
रेटिंग: 2/5

मेड इन चाइना यानी चीन से बनकर आए सामान के बारे में अक्सर कहा जाता है कि ‘चले तो चांद तक, नहीं तो रात तक.’ बुरा यह है कि ‘मेड इन चाइना’ फिल्म पर भी यह बात जस की तस लागू होती है. इसके शुरूआती कुछ दृश्य देखकर ही आप समझ जाते हैं कि यह एक बुरी तरह ‘कन्फ्यूज्ड’ फिल्म है जिसे खुद भी नहीं मालूम कि यह किस प्रतीक के सहारे कौन सी बात कहना चाहती है. पहले दृश्य में एक चाइनीज डिप्लोमैट की मौत से शुरू हुई पटकथा एक आंत्रप्रेन्योर की महत्वाकांक्षाओं से होकर गुजरती है और सेक्स पॉवर बढ़ाने वाली दवाइयों पर आकर ठहरती है. इस तरतीब में कुछ गलत नहीं है, लेकिन यह सब करते हुए फिल्म यह नहीं तय कर पाती कि इसे थ्रिलर दिखना है, कॉमेडी तक ही सीमित रह जाना है या फिर सेक्स एजुकेशन की जरूरत पर बात करनी है.

दूसरे शब्दों में कहें तो लिखाई इस फिल्म का सबसे कमजोर हिस्सा है. फिल्म में कई सीक्वेंस और किरदार ऐसे हैं जो आधे-अधूरे परिचय के साथ सामने आते हैं और बिना किसी ठिए पर पहुंचे गायब हो जाते हैं. इनमें से कई तो मनोरंजक होने के बाद भी गलत तरीके ठूंसे गए लगते हैं. इस दौरान फिल्म इतनी धीमी रफ्तार से चलती है कि आप आंखें मूंद झपकी लेने का मन बनाने लगते हैं. हालांकि यहां पर संवाद, खूब घिसे हुए होने के बाद भी आपको बीच-बीच में हंसाकर जगाए रखने में थोड़ी मदद करते हैं. लेकिन सेक्स पर ज्ञान देने वाली एक फिल्म में लगातार दोमानी संवाद सुनना भी आप आखिर कब तक बरदाश्त कर सकते हैं!

फिल्म में अगर कुछ कमाल का है और जिसके लिए फिल्म देखी जा सकती है तो वह राजकुमार राव की शानदार परफॉर्मेंस है. एक मिडिल क्लास फैमिली मैन के सपनों और उसकी इच्छाओं को चेहरा देते हुए राव ने कमाल का संतुलन साधा है. जहां पर उन्हें अभिनय करते हुए लाउड होना है, वे हुए हैं और जहां जरूरत नहीं है, वहां थोड़े में काम चलाने का कमाल भी उन्होंने दिखाया है. अपने रंगरूप, बॉडी लैंग्वेज से वे भोले आम आदमी और चतुर व्यवसायी का बढ़िया कॉम्बिनेशन तैयार करते हैं जिसमें चार चांद उनके गुजराती लहजे में बोले गए संवाद लगाते हैं. इस बार उन्होंने अपने उन आलोचकों के मुंह बंद कर दिए हैं जो हर किरदार के लिए उनकी संवाद अदायगी को एक जैसा बताकर उनके अभिनय को कमतर ठहराया करते थे.

राजकुमार राव की पत्नी की भूमिका में टीवी की दुनिया से आईं मौनी रॉय हैं. अक्षय कुमार की ‘गोल्ड’ के बाद यह उनकी दूसरी फिल्म है. लेकिन गोल्ड की तरह यहां पर भी वे अभिनय जैसा कुछ नहीं करतीं. ज्यादा बुरा यह है कि उनके और राजकुमार राव के बीच केमिस्ट्री नाम की चीज भी नज़र नहीं आती. इसके अलावा, एक तो फिल्म के हिसाब से जरूरत से ज्यादा ग्लैमरस लग रही मौनी का किरदार लापरवाही के साथ लिखा गया है, उसके ऊपर से उनकी बनावटी डायलॉग डिलीवरी और लिमिटेड एक्सप्रेशन्स इसे और पकाऊ बना डालते हैं. इन दोनों के अलावा बोमन ईरानी फिल्म का तीसरा मुख्य किरदार हैं. वे फ्लैटफेस के साथ दो मायने वाले संवाद बोलते हुए, ऐसा कमाल का काम करते हैं कि फिल्म देखने की दूसरी बड़ी वजह बन जाते हैं. बाकी किरदारों की बात करें तो गजराज राव, परेश रावल, अमायरा दस्तूर और सुमित व्यास भी बढ़िया काम करते दिखते हैं लेकिन इनके हिस्से में ज्यादा स्क्रीनस्पेस नहीं आ पाया है.

अगर फिल्म की कुछ और खूबियों पर आएं तो यह कहा जा सकता है कि निर्देशक मिखिल मुसले ने अपने किरदारों के गुजरातीपन को उनके व्यवसायी और उद्यमी होने से जोड़कर बखूबी पेश किया है. इसके अलावा वे फिल्म में भी गुजराती माहौल रचने में पूरी तरह से कामयाब हुए हैं, वह चाहे नायक द्वारा की गई थेपला खाने की पेशकश हो या किसी एक्स्ट्रा आर्टिस्ट को दिया गया ‘चाइना की फाल्गुनी पाठक’ वाला संबोधन. इनके अलावा फिल्म का संगीत, खासकर ‘सनेड़ो’ और ‘ओढ़नी’ गाने भी, खूब माहौल जमाते हैं जिसका पूरा का पूरा क्रेडिट संगीतकार जोड़ी सचिन-जिगर को दिया जा सकता है.

थोड़े में कहें तो अगर आप जानते हैं कि सेक्स पर बात करना अश्लील नहीं है और आपने हाल ही में ‘खानदानी शफ़ाखाना’ देखी (या झेली) है. इसके साथ ही, आप न तो राजकुमार राव के और न ही बोमन ईरानी के बहुत बड़े फैन हैं तो इन सबका मतलब है कि यह फिल्म देखने के लिए आपके पास कोई वजह नहीं है. ऐसे में अच्छा होगा अगर आप ‘मेड इन चाइना’ फिल्म देखने की बजाय मेड इन चाइना झालरें लगाने में ही घरवालों की मदद करें.