हरियाणा में विधानसभा चुनावों के जो परिणाम आए, उसमें किसी एक दल को बहुमत नहीं मिला. पिछले पांच सालों से हरियाणा में सरकार चला रही भारतीय जनता पार्टी को सबसे अधिक 40 सीटें मिलीं लेकिन प्रदेश की 90 सदस्यों वाली विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 46 का है. कांग्रेस को 31 सीटें मिलीं. वहीं प्रदेश के विधानसभा चुनावों में पहली बार उतरी जननायक जनता पार्टी को 10 सीटें मिलीं.

कांग्रेस जेजेपी और निर्दलीय विधायकों के साथ हरियाणा में अपनी सरकार बनाने और भाजपा को रोकने के लिए कुछ करती, इसके पहले ही भाजपा ने सभी निर्दलीय विधायकों को अपने साथ कर लिया और बाद में जेजेपी भी उसके साथ आ गई. हरियाणा में सात निर्दलीय विधायकों को जीत हासिल हुई है. गुरुवार की शाम तक जब सभी सीटों के नतीजे आ गए तो भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने ट्वीट करके साफ कर दिया कि भाजपा सरकार बनाने का दावा पेश करेगी.

अमित शाह के इस ट्वीट के थोड़ी ही देर बाद यह जानकारी आई कि भाजपा का समर्थन करने के लिए दो निर्दलीय विधायक चार्टर्ड हवाई जहाज से दिल्ली लाए जा रहे हैं. धीरे-धीरे यह संख्या बढ़ती गई और शुक्रवार को भाजपा ने दावा किया कि उसे सभी सात निर्दलीय विधायकों ने बगैर किसी शर्त के समर्थन देने का फैसला किया है. इन निर्दलीय विधायकों के अलावा भाजपा को हरियाणा लोकहित पार्टी के इकलौते विधायक गोपाल कांडा का भी समर्थन मिल गया.

अब सवाल उठता है कि कांग्रेस जब तक कुछ सोच पाती, उसके पहले ही भाजपा ने ऐसा क्या किया कि उसे सात निर्दलीय विधायकों समेत कुल आठ बाहरी विधायकों का समर्थन मिल गया और वह बहुमत के आंकड़े के पार पहुंच गई? इस बारे में पार्टी के राष्ट्रीय स्तर के नेताओं और इनमें से भी हरियाणा में पार्टी का काम देख रहे नेताओं से बातचीत करने पर कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां मिलती हैं.

इनमें से सबसे महत्वपूर्ण यह है कि निर्दलीय विधायकों को भाजपा के पक्ष में लाने में गोपाल कांडा ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. इस बारे में जानकारी देते हुए भाजपा के एक राष्ट्रीय पदाधिकारी कहते हैं, ‘गोपाल कांडा पहले भाजपा से ही टिकट चाह रहे थे. वे भाजपा में शामिल होना चाहते थे. पार्टी की ओर से जो लोग हरियाणा में काम कर रहे थे, उन लोगों ने इस बारे में राष्ट्रीय नेताओं से बातचीत भी की थी. राष्ट्रीय नेताओं का मानना था कि गोपाल कांडा पर कई तरह के संगीन आरोप हैं इसलिए उन्हें भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़वाने से पार्टी को पूरे प्रदेश में नुकसान हो सकता है.’

इस वजह से भाजपा ने गोपाल कांडा को टिकट नहीं दिया लेकिन वे जिस सिरसा सीट से चुनाव लड़ते हैं, वहां से पार्टी ने पिछले चुनाव में जीते हुए अपने विधायक का टिकट काट दिया. इस बारे में भाजपा के एक नेता बताते हैं, ‘भाजपा के जो नेता कांडा को पार्टी में लाना चाहते थे, वे जब कामयाब नहीं हुए तो इन लोगों ने गोपाल कांडा को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कुछ बड़े नेताओं से बातचीत करने को कहा. गोपाल कांडा ने संघ के एक वरिष्ठ नेता को इस बात के लिए मना लिया कि वे भाजपा पर सिरसा सीट से उम्मीदवार बदलने का दबाव बनाएं. इसका परिणाम यह हुआ कि गोपाल कांडा को 2014 में चुनाव हराने वाले मखन लाल सिंगला का टिकट भाजपा ने काट दिया और यहां से अपेक्षाकृत कमजोर और कांडा के अनुकूल कहे जाने वाले प्रदीप रतुसारिया को टिकट दे दिया.’

पार्टी के दो अलग-अलग नेताओं द्वारा दी जा रही इन जानकारियों पर इसलिए भी यकीन होता है कि गोपाल कांडा की सीट पर भाजपा का उम्मीदवार तीसरे नंबर पर रहा. यहां गोपाल कांडा को कड़ी टक्कर देने का काम निर्दलीय उम्मीदवार गोकुल सेतिया ने किया. धनबल और बाहुबल का जमकर इस्तेमाल करने के बावजूद कांडा यह सीट सिर्फ 602 वोटों से ही निकाल पाए. भाजपा को समर्थन देने की घोषणा करते वक्त गोपाल कांडा ने यह भी दोहराया कि वे जन्म से ही संघ की विचारधारा के साथ रहे हैं और उनके पिता संघ के सक्रिय कार्यकर्ता थे. इससे भी इन बातों को बल मिलता है कि सिरसा से उनके अनुकूल उम्मीदवार देने में संघ के किसी प्रमुख नेता की भूमिका रही है.

हरियाणा में भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के बाद गोपाल कांडा ने वहां किंगमेकर की भूमिका अदा की. बताया जाता है कि उन्होंने ही दूसरे निर्दलीय विधायकों से प्रमुख तौर पर बातचीत की. कुछ लोग तो यह भी दावा कर रहे हैं कि इनमें से कुछ विधायकों को चुनावों के दौरान गोपाल कांडा ने आर्थिक तौर पर मदद भी की थी. यह भी जानकारी मिल रही है कि भाजपा और संघ के जो नेता गोपाल कांडा को भाजपा में लाना चाहते थे और जिन लोगों ने उनके अनुकूल भाजपा उम्मीदवार दिया, उन लोगों ने भी कांडा से संपर्क किया और कहा कि चाहे जैसे भी हो, आप निर्दलीय विधायकों को भाजपा के पाले में लाइए.

एक तरफ गोपाल कांडा इस अभियान में लगे तो और दूसरी तरफ भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और हरियाणा के प्रभारी अनिल जैन. प्रदेश में जीते सात निर्दलीय विधायकों में से अधिकांश ऐसे हैं जो भाजपा में ही थे और भाजपा का ही टिकट चाहे रहे थे लेकिन ऐसा न होने पर वे निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में उतार गए. इनमें से अधिकांश विधायक यह मान रहे थे कि उनका टिकट कटने में प्रभारी होने के नाते अनिल जैन की भी भूमिका थी. लेकिन भाजपा ने इन विधायकों को यह स्पष्ट संकेत दिया कि उनके टिकट को लेकर गड़बड़ी प्रदेश स्तर पर हुई है और उसे दुरुस्त करने का काम राष्ट्रीय नेतृत्व करेगा.

अपने चुनावों में पानी की तरह पैसा बहाने के लिए गोपाल कांडा को जाना जाता है. बताया जाता है कि विधायकों को लुभाने के लिए एक तरफ कांडा लगे रहे तो दूसरी तरफ संगठन के स्तर पर इनसे वादा करने का काम अनिल जैन ने सिरसा से लोकसभा सांसद सुनीता दुग्गल की मदद से किया. गुरूवार की शाम कांडा समेत कुछ और निर्दलीय विधायकों को दिल्ली लाने का काम दुग्गल ने ही किया था. इस प्रक्रिया को दिल्ली के हरियाणा भवन में मनोहर लाल खट्टर ने आगे बढ़ाया तो वहीं कुछ निर्दलीय विधायकों से अंतिम बातचीत भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के घर पर गुरूवार देर रात तक चली. बताया जा रहा है कि इन विधायकों को मंत्री पद से लेकर निगमों का अध्यक्ष बनाने और अन्य कई तरीके से मदद करने का वादा भाजपा की ओर से किया गया है. इसका परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस और जेजेपी कुछ सोच पाती, उसके पहले ही सारे निर्दलीय विधायक भाजपा के पाले में आ गए और हरियाणा में एक बार फिर से मनोहर लाल खट्टर की सरकार बनने का रास्ता साफ हो गया.

कांडा से सरकार बनाने के लिए समर्थन लेने पर न भाजपा में अंदर ही अंदर कुछ प्रमुख नेता नाराज थे. वरिष्ठ नेता उमा भारती ने तो सार्वजनिक तौर पर अपनी पार्टी के इस निर्णय की आलोचना करते हुए कहा कि चुनावी जीत कांडा को अपराधों से बरी नहीं करती. भाजपा को यह भी मालूम था कि अलग-अलग निर्दलीय विधायकों को जोड़कर सरकार बहुत स्थिर ढंग से चलाने में मुश्किल होगी. इसलिए अब दुष्यंत चौटाला की जेजेपी को अपने पाले में लाने का काम करना था.

दुष्यंत चौटाला से बातचीत का काम भाजपा ने गुरुवार को ही शुरू कर दिया था. इस बारे में भाजपा के एक नेता कहते हैं, ‘भाजपा की ओर से बातचीत के लिए पार्टी ने पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल से अनुरोध किया गया. चौटाला परिवार से बादल के रिश्ते अच्छे हैं. इस परिवार के सभी लोग उनका सम्मान करते हैं. जब परिवार में पहले भी विवाद हुआ था तो बादल ने मध्यस्थता की कोशिश की थी. बादल से हुई शुरुआती बातचीत में जेजेपी की ओर से सकारात्मक संकेत मिले थे. लेकिन भाजपा यह चाहती थी कि पहले निर्दलीय विधायकों के जरिए बहुमत का आंकड़ा मिल जाए ताकि दुष्यंत अधिक मोलभाव करने की स्थिति में नहीं हों.’

उन्होंने आगे बताया, ‘शुक्रवार को भाजपा के कुछ और युवा नेताओं ने दुष्यंत से बातचीत की. इन लोगों की बातचीत दुष्यंत के कुछ करीबी सहयोगियों से भी हुई. इसमें इन लोगों ने जेजेपी के नेताओं को यह समझाने की कोशिश की कि विपक्ष में रहने की जगह उन्हें उपमुख्यमंत्री का पद लेकर सरकार में शामिल होना चाहिए. ये भी कहा गया कि अगर वे नहीं भी शामिल होंगे तो भी प्रदेश में भाजपा की ही सरकार बनेगी.’

इस परिस्थिति में जेजेपी के अंदर यह बात भी चलने लगी कि अगर सरकार से बाहर रहे तो आने वाले दिनों में भाजपा जेजेपी के विधायकों को तोड़ने की कोशिश कर सकती है और अगर सरकार में चले गए तो न सिर्फ पार्टी के विधायक सुरक्षित रहेंगे बल्कि सत्ता में होने का लाभ उठाकर पार्टी का सांगठनिक विस्तार भी हो सकता है. कहा गया कि दुष्यंत चौटाला के उपमुख्यमंत्री होने से पार्टी को संगठन और संसाधन दोनों स्तर पर मजबूती मिलेगी. पार्टी में यह बात भी चली कि भाजपा के साथ का लाभ उठाकर तिहाड़ जेल में बंद दुष्यंत चौटाला के पिता अजय चौटाला की रिहाई के लिए भी अनुकूल परिस्थितियां तैयार की जा सकती हैं.

इसके बाद जब दुष्यंत चौटाला अमित शाह से मिलने पहुंचे तो उनके सामने भाजपा का साथ देने के अलावा कोई और विकल्प नहीं था. और फिर भाजपा ने औपचारिक तौर पर गोपाल कांडा से समर्थन लेने से इनकार कर दिया.