देश में गहराती मंदी की खबरों में ऑटोमोबाइल सेक्टर के बाद जिस क्षेत्र की सबसे अधिक चर्चा है वह है रियल एस्टेट. भारत में उदारीकरण के बाद दशकों तक दिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ने वाले इस सेक्टर की कहानी में बहुत से मोड़ हैं. सबसे पहले उस कहानी से शुरु करते हैं जो हमें लखनऊ के प्रॉपर्टी कारोबार से जुड़े एक सज्जन ने सुनाई.

‘2004-05 का साल था. लखनऊ के आसपास प्रॉपर्टी के दाम चढ़ रहे थे. प्लॉट दिखाना, किसानों को जमीनों के एग्रीमेंट के लिए राजी करना और इन सबके बदले तय कमीशन पाना शहरों के नौजवानों का नया रोजगार बन गया था’ वे आगे बताते हैं, ‘उस समय मेरा एक दोस्त हार्डवेयर की एक दुकान करता था. फिर उसने प्रॉपर्टी के कारोबार की रूख किया. हार्डवेयर की दुकान एक तरह से उसके प्रॉपर्टी दफ्तर के तौर पर तब्दील हो गई. लखनऊ के पास चिनहट कस्बे में प्लॉटिंग की शुरुआत के बाद धंधा ऐसा चमका कि कुछ छोटे बिल्डर्स के साथ हिस्सेदारी कर उसने कई रियल एस्टेट प्रोजेक्ट शुरु किए.’ कहानी आगे बढ़ती है और महज दो-तीन सालों में एक न चलने वाली हार्डवेयर की दुकान के मालिक के साथ बड़ी गाड़ियों का काफिला चलने लगता है. नेताओं से लेकर अफसर तक उसके संपर्क में होते हैं और दबी जबान से लोग यह भी कहते हैं कि उसकी तमाम संपत्तियों और प्रोजेक्ट्स में नेताओं और नौकरशाहों का हिस्सा है. लेकिन, 2017 में सफलता की इस कथा में विराम आता है और धोखाधड़ी के आरोप में यह शख्स गिरफ्तार हो जाता है. जिस शख्स की सफलता की मिसालें दी जाती थी, अब उसकी चर्चा बैंकों के नोटिस, लगातार दर्ज होते मुकदमों और पुलिस की दबिश के लिए की जाती थी.

यह रियल एस्टेट और प्रॉपर्टी के कारोबार के किसी एक किरदार या हिस्से की कहानी नहीं है. किरदारों और घटनाओं में थोड़े हेर-फेर के साथ यह भारत की पूरी रियल एस्टेट इंडस्ट्री का भी किस्सा कह सकती है. नीति आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, पूरे देश में रियल एस्टेट का कारोबार करीब 8.3 लाख करोड़ का है और यह लोगों को रोजगार देने वाले सबसे बड़े सेक्टर्स में से एक है. लेकिन, फिलहाल यह कारोबार गहरी सुस्ती की चपेट में है. अगर दिल्ली-एनसीआर की ही बात करें तो यहां ज्यादातर नए प्रोजेक्ट बंद हैं. दिल्ली, नोएडा और गुड़गांव में दसियों हजार ऐसे मकान हैं, जिनका फिलहाल कोई खरीदार नहीं है. रियल एस्टेट कंसल्टेंट नाइट फ्रैंक इंडिया के मुताबिक भारत के आठ बड़े शहरों में ही साढ़े चार लाख से ज्यादा अनबिके मकान हैं.

मौजूदा मंदी के चलते ऑटोमोबाइल और उपभोक्ता वस्तुओं में गिरावट का सिलसिला करीब डेढ़-दो साल पहले शुरु हुआ था. मंदी के सुर्खियों में आने के बाद रियल एस्टेट की मंदी की भी चर्चा बढ़ी. लेकिन अगर गौर किया जाए तो मकानों और अचल संपत्ति की खरीद-बिक्री में गिरावट का सिलसिला इन सबसे पहले से ही चल रहा है. सवाल यह है कि एक समय रियल एस्टेट और प्रॉपर्टी के जिस काम ने चंद दिनों में ही लोगों को लाखों-करोड़ों का फायदा दिया, उसमें इतने लंबे समय से इतना सन्नाटा क्यों है?

रियल एस्टेट की इस मंदी को समझने के लिए पहले इस कारोबार के सुनहरे दौर के बारे में समझना जरूरी है. 1991 में उदारीकरण के बाद जब अर्थव्यवस्था खुली तो रोजगार और आय के मौके भी बढ़े. उदारीकरण के बाद के दस-पंद्रह साल भारत में हर स्तर पर शहरीकरण का दौर काफी तेज रहा. दिल्ली, मुंबई, बंगलौर, हैदराबाद जैसे शहर सर्विस सेक्टर में काम करने वालों के गढ़ बन गए. खुली अर्थव्यवस्था के बाद पनपे उपभोक्तावाद ने भी लोगों को गांव से शहरों और वहां के लोगों को उनसे बड़े शहरों में रहने और वहां के लाइफस्टाइल के प्रति सचेत किया. गांवों और छोटे शहरों में शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं आदि की समुचित व्यवस्था न होने की वजह से भी लोगों ने बड़े शहरों की ओर रुख किया.

इन सारे आर्थिक-सामाजिक बदलावों और जरूरतों ने शहरों में घरों की ऐसी मांग बनाई कि भारतीय शहरों में मकानों की कीमतें आसमान छूने लगीं. अर्थशास्त्र के शोधार्थी आशीष चौरसिया इस बूम पर कहते हैं, ‘इस दौरान भारत की अर्थव्यवस्था औसतन सात से आठ फीसद की रफ्तार से बढ़ रही थी, लेकिन बड़े शहरों में मकानों की कीमत हर साल 25 से 30 फीसद तक बढ़ जाती थी. अर्थव्यवस्था की रफ्तार और मकानों की कीमतों की बढ़ती रफ्तार की तुलना करें तो यह स्वाभाविक नहीं था. बल्कि साफ दिखता है कि रियल एस्टेट के फूल रहे गुब्बारे के पीछे कुछ और भी वजहें थीं.’

नोएडा में जेपी समूह के खिलाफ प्रदर्शन करते घर खरीदार (फाइल फोटो)

ये वजहें क्या थीं? इस सवाल के जवाब में बिल्डर्स, बाजार विश्लेषकों, उपभोक्ताओं सबके अपने-अपने पक्ष हैं. निवेश सलाहकार पंकज गोयल इस बात को एक उदाहरण से समझाते हैं, ‘मान लीजिए साल 2000 में किसी लड़के ने एक नौकरी शुरु की और उसकी शुरुआती सैलरी बीस हजार रूपये थी. उस समय 10 से 12 लाख रुपये में बड़े शहरों के बाहरी इलाकों में फ्लैट मिल जाते थे. ऐसे में वह परिवार से थोड़े पैसे की मदद लेकर और बाकी ईएमआई के सहारे घर खरीद सकता था. ऐसा बड़े पैमाने पर हुआ और बड़े शहरों को घरों के थोक में खरीदार मिले’ गोयल आगे कहते हैं कि इससे हुआ यह कि मकानों की कीमतें कई गुना तेजी से बढ़ने लगीं, और यह रिटर्न के मामले में सबसे चोखा धंधा हो गया.

रियल एस्टेट सेक्टर में इसी अंधाधुंध फायदे के चलते इसमें काले धन की आमद भी बढ़ी. फायदे से आकर्षित होकर नेताओं और अफसरशाहों ने इस काम के लिए मोटा धन उपलब्ध कराना शुरु कर दिया और पूरे देश में कुछेक स्थापित डेवलपर्स के साथ हजारों नए बिल्डर्स खड़े हो गए. मेरठ शहर के एक बिल्डर नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि एनसीआर की कम से कम 40 फीसद आवासीय योजनाओं में किसी न किसी नेता का हिस्सा है. वे अपनी भाषा में कहते हैं कि हर प्रोजेक्ट में नेता या किसी बड़े अफसर की 10 से 20 परसेंट की पत्ती ( हिस्सेदारी) है.

नेता-बिल्डर-अफसरशाही के इस गठजोड़ ने रियल एस्टेट के बिजनेस को सेटिंग-गेटिंग का खेल बना दिया. इसके चलते जमीनों पर कब्जे, दबाव, धमकी और लैंड यूज बदले जाने जैसे खेल पूरे देश में धड़ल्ले से खेले गए. इस दौर में धड़ाधड़ नए प्रोजेक्ट शुरु हो रहे थे, लोगों को काम मिल रहा था और आवासीय क्षेत्र सबसे तेजी से बढ़ने वाले सेक्टर में शुमार हो गया था.

इस क्षेत्र में काले धन की आमद एक तो किसी रियल एस्टेट प्रोजेक्ट में हिस्सेदारी के तौर पर थी. दूसरे, मकानों की कीमतों में हो रही गुणात्मक वृद्धि ने इसे निवेश का पसंदीदा क्षेत्र बना दिया था. बेनामी संपत्ति के तौर पर हर शहर में खूब फ्लैट खरीदे गए. वास्तविक खरीदार के बजाय फ्लैट काले धन की पार्किंग और निवेश से बेहतर रिटर्न कमाने का जरिया बन गए. इस रफ्तार को बैंक कर्जों ने और तेजी दी. बैंकों और एनबीएफसीजी ने मकान की कीमत के 90 फीसद तक लोन किए. लंबे समय तक बैंक कर्जों का सबसे बड़ा हिस्सा हाउसिंग सेक्टर को बांटा गया. ये लोन लेने वालों में बिल्डर्स भी थे और मकान के ग्राहक भी. इन सबके चलते रियल एस्टेट सेक्टर चमकदार होता चला गया.

रियल एस्टेट कंसल्टेंट सतेंद्र चौधरी कहते हैं कि कई सालों तक लगातार मुनाफे ने बिल्डरों को इतना आशावादी बना दिया कि वे व्यापार की मूल चीज मांग-आपूर्ति और कीमत में संबंध भूल गए, ज्यादा मुनाफे के चक्कर में एक साथ दसियों प्रोजेक्ट लांच होने लगे. उपभोक्ताओं से लिये गये बुकिंग के पैसे और कर्ज का इस्तेमाल कर बिल्डर्स ने अपने कारोबार को असीमित विस्तार देना शुरु कर दिया. इसके बाद मकान बिकने, बिके हुए मकानों के मिलने में सालों की देरी होने लगी और बिल्डर्स के सामने नकदी का संकट पैदा होने लगा. सतेंद्र कहते हैं कि रियल एस्टेट सेक्टर को एक झटका 2008 में लगा था क्योंकि अमेरिका में आवासीय कर्जों के चलते बैंकों के डूबने के बाद हमारे सार्वजनिक बैंकों ने कुछ हद तक इशारा समझ लिया था. इसके बाद बैंकों द्वारा बिल्डर्स को दिए जाने वाले कर्जों में तेजी से कटौती की गई. ऐसे में रियल एस्टेट सेक्टर के सामने नगदी का संकट और गहरा गया. प्रोजेक्ट ठप पड़ने शुरु हो गए.

लेकिन, पैसे के अवैध रास्ते, बाजार के कर्ज और एनबीएफसी के हाउसिंग फाइनेंस ने रियल एस्टेट सेक्टर में नगदी का प्रवाह पूरी तरह से नहीं सूखने दिया. हालांकि मकानों की मांग में लगातार कमी आ रही थी. लेकिन, बिल्डर्स फिर भी इनकी कीमत घटाने को तैयार नहीं थे. वे यह मानकर चल रहे थे कि लोग घर तो खरीदेंगे ही.

मुनाफे पर आधारित इस आशावाद को सबसे तगड़ा झटका नोटबंदी ने दिया. काफी हद तक नकदी से चलने वाले इस कारोबार को नोटबंदी ने सुन्न सा कर दिया. इसके बाद बाजार से मिलने वाला नकद पैसा जो कर्ज या अन्य रूपों में आता था उसकी सप्लाई एकदम ठप हो गई. इसके अलावा बिल्डर्स-नेता-अफसर गठजोड़ के तहत इस क्षेत्र में अनएकाउंटेड पैसे का जो एक सतत प्रवाह बना हुआ था, वह भी बंद हो गया. जमीन और मकानों की लिखाई में सख्ती ने खरीद-बिक्री में नकद लेन-देन के चलन को और कम कर दिया. पहले से नगदी का दबाव झेल रहा उद्योग इन सब वजहों से और दबाव में आ गया. अब ठेकेदारों और मजदूरों तक के पेमेंट में दिक्कत आने लगी. इन बातों के कुछ अच्छे पक्ष भी थे, लेकिन इन सबके चलते सबसे ज्यादा लोगों को रोजगार देने वाले निर्माण क्षेत्र से धड़ाधड़ रोजगार जाने लगे. इसके बाद आए जीएसटी ने बिल्डर्स की मुश्किलों में और इजाफा कर दिया. पहले से ही कम बिक रहे मकानों की बिक्री में अब चिंताजनक गिरावट आ चुकी थी.

लेकिन, अब भी बैकों, एनबीएफसी और हाउसिंग फाइनेंस कंपनीज के कर्ज देने का सिलसिला रुका नहीं था. पर, 2016 में आये दिवालिया कानून की जद में जेपी और आम्रपाली जैसे बड़े बिल्डर आ गये जिसकी वजह से इस क्षेत्र में लोगों का पहले से ही कम हो रहा विश्वास और भी कम हो गया. फिर 2018 में आइएलएंडएफएस संकट ने एनबीएफसीज की भी पोल खोल दी. इस वजह से रियल एस्टेट कंपनियों को मिलने वाले कर्ज भी बंद हो गए और मकान खरीदारों के भी कर्ज में कमी आ गई. बिल्डर्स बुरी तरह कर्ज में घिरे थे, बने मकान बिक नहीं रहे थे और नए प्रोजेक्ट ठप पड़े थे. सालों से पैसा चुकाकर भी मकान न पाने वाले खरीदारों ने भी रेरा जैसे कानून की मदद से अब अदालतों का रूख करना शुरु कर दिया था.

इस सिलसिले के लंबे चलने के कारण रियल एस्टेट कंपनियों से म्यूचूयल फंड हाउसों ने भी अपने पैसे तेजी से निकालने शुरु कर दिए. रियल्टी सेक्टर में पैसे का प्रवाह इस कदर गड़बड़ा गया कि बिल्डर्स से लेकर हाउसिंग फाइनेंस कंपनियां तक डिफाल्टर हो गईं और देश भर में बिल्डर्स के खिलाफ सैंकड़ों एफआईआर दर्ज होने लगीं. इनसे जुड़े विवाद भी एक के बाद एक दिवालिया प्रक्रिया के लिए एनसीएलटी में जा रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट ने रियल एस्टेट कंपनियों के खिलाफ सख्त रूख अपना रखा है. इन सबके चलते रियल एस्टेट सेक्टर पूरी तरह लड़खड़ा गया.

रियल एस्टेट की इस खस्ता हालत का सबसे ज्यादा असर उसमें काम करने वाले मजदूरों पर पड़ा है. मजदूरों के काम छूटने की वजह से ग्रामीण क्षेत्रों में पैसों की आमद और कम हो गई है. इससे ग्रामीण संकट और गहरा रहा है. पिछले कुछ समय से मध्यम दर्जे की नौकरियों में बढ़ी अनिश्चितता ने भी मकानों की बिक्री पर असर डाला है और इस क्षेत्र की मंदी ने ग्रामीण सहित देश की एक बड़ी आबादी की क्रय शक्ति को घटाकर देश में चल रहे मंदी के हालात को और गहरा कर दिया है.

लेकिन रियल ऐस्टेट में छाई मंदी की सबसे बड़ी वजह खुद बिल्डर्स ही नजर आते हैं. किसी व्यवसाय में अगर मुनाफा वास्तविक लागत से बहुत ज्यादा हो रहा है तो उसकी वजह स्वाभाविक व्यापार चक्र नहीं माना जा सकता है. लेकिन, रियल एस्टेट क्षेत्र ने इस बात से आंखे मूंदी रखीं. जमीनों के मनचाहे अधिग्रहण और राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते कुछ दिनों तक तो बात बनी रही, लेकिन बढ़ती लागत के बीच ऊंचे मुनाफे की चाहत ने रियल ऐस्टेट कारोबारियों को कर्ज के जाल में और उनसे मकान खरीदने वालों को उनके जाल में फंसा दिया.

इस क्षेत्र में जो हो रहा है उसके लिए सरकारें भी अपनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकती हैं. उदाहरण के तौर पर इसमें रेरा जैसे रेग्युलेटर की स्थापना पहले क्यों नहीं की गई? कम से कम उदारीकरण के दस सालों बाद वर्ष 2000 तक तो नीति-निर्माताओं को इसकी जरूरत समझ में आ ही जानी चाहिए थी. रेरा दीर्घकालिक अवधि के लिए एक बड़ा सुधार है, लेकिन हर सुधार को लागू करने का एक वक्त होता है. इसे ऐसे समय में लागू किया गया जब रियल एस्टेट पहले से ही मंदी और कर्ज से घिरा हुआ था. रेरा ने इसकी परेशानी और बढ़ा दी.

रेरा से बिल्डर्स के पेंच जरूर कसते लग रहे हैं, लेकिन उपभोक्ता की दिक्कतें अभी भी अपनी जगह हैं. दिवालिया हो रहे बिल्डर्स खरीदारों को तय समय पर मकान नहीं उपलब्ध करा पा रहे हैं और मामले कोर्ट में जा रहे हैं. आर्थिक जानकार कहते हैं कि जब इतने दिनों तक रेरा नहीं आया था तो कम से तब तक इसे और टाला जा सकता था जब तक कि रियल एस्टेट थोड़ा पटरी पर नहीं आ जाता.

इसके अलावा बैंकों की कर्ज नीति पर भी सवाल उठाये जा सकते हैं. हाउसिंग सेक्टर में बिल्डर्स और खरीदारों को उस समय अनुपात से ज्यादा लोन बांटे गए जब यह धंधा निवेशकों के लिए मुनाफे का जरिया बन गया था. इसने वास्तविक खरीदार के लिए घर की कीमतें उसकी पहुंच से बाहर कर दीं. और अब जब पिछले कुछ सालों से मकानों की कीमतें स्थिर हैं तो कर्ज मिलना मुश्किल है और खराब सेंटीमेंट्स के कारण लोग सस्ते कर्ज लेकर भी मकान खरीदने की हिम्मत नहीं जुटा रहे हैं.

रियल एस्टेट में कालेधन का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल था, इससे किसी को इन्कार नहीं हो सकता. लेकिन, क्या इसका इलाज नोटबंदी था? एनसीआर के एक प्रॉपर्टी ब्रोकर तनुज गोयल कहते हैं, ‘रियल एस्टेट क्षेत्र को एक समय जरूरत से ज्यादा ढील दी गई और फिर एक समय उसमें जरूरत से ज्यादा सख्ती कर दी गई, सारी दिक्कत की वजह यही है.’

तो रियल एस्टेट इससे कैसे उबरेगा? आर्थिक जानकार कहते हैं कि रियल एस्टेट में लगातार मंदी के बाद भी मकानों की कीमतें अभी भी ऊंची बनी हुई हैं. रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने भी हाल ही में कहा है कि बिना मकानों की कीमत गिराए रियल एस्टेट इस चक्र से नहीं निकल सकता है. इस क्षेत्र के जानकारों के मुताबिक, कीमतों में यह संशोधन दो तरीके से हो सकती है. वे उदाहरण देकर बताते हैं कि एनसीआर में पिछले तीन सालों में मकानों की कीमत या तो कुछ घटी हैं, नहीं तो कम से कम बढ़ी नहीं है. ऐसी स्थिति कुछ समय और रही तो मकानों की कीमत बाजार में मांग के वास्तविक स्तर पर आ जाएगी. दूसरे स्तर पर यह संशोधन ऐसे होगा कि अनबिके मकानों की कीमत कम की जाए.

इसके अलावा रियल्टी सेक्टर की समस्या नकदी का संकट है जो वृहद बैकिंग सुधारों का हिस्सा है. एनबीएफसी के कर्ज लेकर कर्ज देने का जो मॉडल है उसे ज्यादा पारदर्शी बनाना होगा ताकि दोबारा मौजूदा स्थिति का सामना न करना पड़ा. मुनाफे की उम्मीद में कर्ज पर कर्ज का यह खेल इस कदर खेला गया है कि उसने प्रोजेक्टस की लागतें बढ़ा दी है, जिसके चलते बिल्डरों के लिए मकानों की कीमत कम करना आसान नहीं है.

रियल एस्टेट की मंदी थोड़ी गहरी जरूर है, लेकिन है यह भी देश में छाई व्यापक मंदी का ही हिस्सा. ऐसे में रोजागर, आय में वृद्धि के साथ-साथ साथ अर्थव्यवस्था में छोटे कारोबार और अनौपचारिक सेक्टर के मजबूत होने से भी रियल एस्टेट के क्षेत्र में थोड़ा सुधार देखने को मिल सकता है.

आखिरी बात यह कि चौतरफा सुधारों की वजह से हो सकता है कि यह क्षेत्र कुछ और साल तक खराब हालात से बाहर नहीं निकल पाए लेकिन जब निकल आएगा तब हालात पहले से निश्चित ही बेहतर होंगे.