हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजों के बीच गुजरात से आई एक महत्वपूर्ण ख़बर दब सी गई. ख़बर अल्पेश ठाकोर के अपनी ही विधानसभा सीट राधनपुर से उपचुनाव हारने की. वही अल्पेश ठाकोर जिन्होंने 2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस का हाथ थामकर भारतीय जनता पार्टी को नाकों चने चबाने के लिए मजबूर कर दिया था. तब अल्पेश के साथ दलित नेता जिग्नेश मेवानी और पाटीदार नेता हार्दिक पटेल भी कांग्रेस के पक्ष में खड़े थे.

लेकिन कांग्रेस और अल्पेश का यह साथ ज्यादा नहीं चला. अल्पेश की तरफ़ से पार्टी को पहला झटका जुलाई 2018 में मिला. तब उन्होंने राज्यसभा की दो सीटों के लिए हुए चुनाव में भाजपा प्रत्याशी एस जयशंकर और जुगलजी ठाकोर के पक्ष में मतदान किया था. उनके करीबी कांग्रेसी विधायक धवल सिंह झाला भी ऐसा करने में उनके साथ थे. इस घटना के करीब दस महीने बाद इन दोनों नेताओं ने कांग्रेस छोड़ दी और बीती जुलाई में भाजपा का दामन थाम लिया. अल्पेश और धवल सिंह के दल बदलने की वजह से ही उनकी विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए थे. इनमें इन दोनों को ही हार का सामना करना पड़ा है.

स्थानीय जानकारों के मुताबिक इस चुनाव में अल्पेश ठाकोर के सबसे बड़े हथियार ही उन पर उल्टे पड़ गए. दरअसल अल्पेश ठाकोर का अब तक का राजनीतिक सफ़र ठेठ जातिवाद और क्षेत्रवाद के दो प्रमुख स्तंभों पर टिका हुआ है जिसकी शुरुआत 2011 में ‘गुजरात क्षत्रिय ठाकोर सेना’ की स्थापना के साथ हुई थी. ठाकोर सेना का गठन आर्थिक और सामाजिक विषमताओं को दूर करने के नाम पर किया गया था. लेकिन इतने भर से अल्पेश सुर्ख़ियां नहीं बटोर पाए. इस मोर्चे पर उन्हें पहली सफलता 2015-16 के दौरान मिली. तब गुजरात में पाटीदार समुदाय अपने लिए ओबीसी कोटे में आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलनरत था. इससे गुजरात में पाटीदारों व अन्य पिछड़ा वर्ग के बीच टकराव की स्थिति बन गई. मौके को भांपते हुए अल्पेश ठाकोर ने ओबीसी-एससी-एसटी मंच बनाकर पाटीदारों के विरोध में एक समानांतर आंदोलन खड़ा कर दिया.

किंतु इसके कुछ ही महीने बाद अल्पेश ठाकोर ने अपना रुख बदलते हुए गुजरात में अवैध शराब की बिक्री और बढ़ती बेरोजगारी को लेकर मुहीम छेड़ दी. इसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में वे कांग्रेस की टिकट पर राधनपुर क्षेत्र से विधायक बन गए. अब वे उन हार्दिक पटेल के साथ भी खड़े थे जो उन पाटीदारों के नेता थे जिनके खिलाफ वे अब तक लड़ रहे थे. 2018 में अल्पेश ने एक बार फ़िर राष्ट्रीय मीडिया का ध्यान अपनी तरफ़ खींचा जब ठाकोर सेना पर गुजरात में बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों के ख़िलाफ़ हिंसा भड़काने का आरोप लगा था. हिंदी भाषी राज्यों के लोगों पर ये हमले एक ग़ैरगुजराती मजदूर की गिरफ्तारी के बाद शुरु हुए थे जिस पर एक सवा साल की बच्ची से दुष्कर्म का आरोप था.

अब बात इस उपचुनाव की. राधनपुर विधानसभा क्षेत्र के कुल पौने तीन लाख मतदाताओं में से 70 से 80 हजार वोट अकेले ठाकोर समाज के हैं. ऊपर से अल्पेश को भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों के मत मिलना भी लगभग तय सा ही था. लिहाजा इस उपचुनाव में अल्पेश को बड़ी जीत मिलने की संभावनाएं जताई जा रही थीं. इस बात को लेकर अल्पेश ख़ुद भी इतने आश्वस्त थे कि उन्होंने चुनाव से पहले ही ख़ुद को गुजरात का नया उपमुख्यमंत्री घोषित कर दिया था.

स्थानीय पत्रकार जेके जोशी इस बारे में कहते हैं, ‘अल्पेश ने अपने आप को एक जाति के नेता के तौर पर सीमित कर लिया. इससे राधनपुर के दूसरे समुदायों में उनके प्रति संशय और नाराजगी का भाव धीरे-धीरे घर करने लगा था. यह उपचुनाव एक तरह से ठाकोर बनाम ग़ैरठाकोर के बीच लड़ा गया और अल्पेश भाई को इसका नुकसान उठाना पड़ा.’ दिलचस्प बात यह है कि ख़ुद जाति आधारित राजनीति करने वाले अल्पेश ठाकोर ने अपनी शिकस्त के लिए जातिवादी तत्वों के षडयंत्र को जिम्मेदार ठहराया है.

लेकिन ऐसा नहीं था कि क्षेत्र के दूसरे समुदायों के लोग ही अल्पेश से ख़फ़ा थे. जानकारों के अनुसार अल्पेश इस चुनौती से तो जैसे-तैसे पार पा लेते. मुसीबत यह हुई कि वे अपने ठाकोर समुदाय को भी अपने से जोड़े रखने में कामयाब नहीं हो पाए. राधनपुर क्षेत्र से ही ताल्लुक रखने वाले जीतू भाई ठाकोर का इस बारे में कहना है कि ‘अल्पेश ने अपनी राजनीति की शुरुआत समाज की भलाई के नाम पर की थी. लेकिन बाद में उनका लक्ष्य गुजरात में ख़ुद को बालासाहब ठाकरे और ठाकोर सेना को शिवसेना के तौर पर खड़ा करना रह गया. अल्पेश की शह पर ठाकोर सेना के युवा कार्यकर्ता चाहे जिस बात पर शहर-कस्बों की दुकानों में तोड़-फोड़ करते, उत्पात मचाते, दूसरे समुदायों के लोगों से झगड़ते, बाहर वालों को धमकाते... इस बात से ठाकोर समाज के बाकी सभ्रांत लोगों को आपत्ति होने लगी थी.’

ठाकोर सेना की तरफ़ से अपने गांव के प्रमुख रह चुके जीतू भाई आगे जोड़ते हैं, ‘कम समय में ज्यादा नाम होने की वजह से अल्पेश का अहंकार बहुत बढ़ गया है. वह सार्वजनिक तौर पर समाज के उन युवाओं की छोटी-छोटी बात पर बेइज्जती करने लगा, जिन्होंने उसे यहां तक पहुंचाने में जी-जान एक कर दिया था. बीते एक साल में अल्पेश के आस-पास रहने वाले उसके कई समर्थकों ने उसका साथ छोड़ दिया. उनमें से कइयों ने इस चुनाव में अल्पेश के विरोध में वोट डाले.’

एक अन्य स्थानीय पत्रकार की मानें तो क्षेत्रवाद फैलाने वाली छवि भी इस चुनाव में अल्पेश के लिए बैकफायर ही साबित हुई. इसके चलते उन्हें हिंदी पट्टी वाले लोगों के तो वोट नहीं ही मिले, बल्कि स्थानीय लोगों ने भी उनसे कन्नी काटना शुरु कर दिया. दरअसल, अल्पेश ठाकोर मूल रूप से राधनपुर (पाटण जिले) की बजाय अहमदाबाद से ताल्लुक रखते हैं. इसके चलते क्षेत्र में उपचुनाव से पहले यह चर्चा भी खूब थी कि ‘दूसरों को भगाने वाले ख़ुद भी तो राधनपुर के लिए बाहरी ही हैं.’ हालांकि अल्पेश को चार हजार वोट से हराने वाले कांग्रेस प्रत्याशी रघु देसाई भी राधनपुर से नहीं आते. लेकिन क्षेत्र में वे अल्पेश की तुलना में कहीं ज्यादा सक्रिय रहते हैं.

राजनैतिक विश्लेषक अल्पेश की शिकस्त को इसलिए भी बड़ी मान रहे हैं क्योंकि केंद्र और प्रदेश दोनों जगह भारतीय जनता पार्टी की सरकार है. ऐसे में माना जा रहा था कि सामान्य समझ वाला वोटर भी भाजपा प्रत्याशी के ही पक्ष में वोट डालेगा ताकि उसके क्षेत्र के विकास कार्यों में कोई अड़चन पैदा न हो. ऊपर से गुजरात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का गृहराज्य भी है और लोकसभा चुनाव में यहां की सभी 26 सीटें भाजपा की झोली में गई थीं. वैसे ये कयास गलत भी नहीं थे और शायद इसीलिए अल्पेश ठाकोर सम्मानजनक मत हासिल करने में सफल रहे. लेकिन फिर भी ये सभी वजहें उन्हें जीत दिलाने में नाकाम साबित हुईं.

राधनपुर जिले से ताल्लुक रखने वाले भाजपा के एक वरिष्ठ पदाधिकारी इस बारे में नाम न छापने की शर्त पर एक काम की बात बताते हैं, ‘अल्पेश को पार्टी का टिकट मिलने के बाद हमारे स्थानीय कार्यकर्ताओं को बड़ा धक्का लगा था. वे इस बात को नहीं भूले थे कि उनकी ही वजह से विधानसभा चुनाव के दौरान क्षेत्र में उनकी जमकर किरकरी हुई थी. नतीजतन हमारे लाख समझाने के बावजूद हमारे कई कार्यकर्ताओं ने इस चुनाव से दूरी बना ली.’

वे आगे जोड़ते हैं, ‘कार्यकर्ताओं को बिदकाने में अल्पेश ठाकोर के लटक-झटक वाले अंदाज ने भी बड़ी भूमिका निभाई है. वे किसी शहरी नेता की तरह आम समर्थकों से एक दायरा बनाकर चलते हैं. जबकि राधनपुर जैसी ग्रामीण पृष्ठभूमि वाली सीट पर लोगों से घुल-मिलकर ही राजनीति की जा सकती है.’ भाजपा से जुड़े इन सूत्र के शब्दों में, ‘क्षेत्र में भाजपा के कुछ कद्दावर नेताओं को यह डर भी था कि अल्पेश के इस सीट से जीत हासिल करने पर उनमें से कोई भी निकटतम भविष्य में पार्टी के टिकट पर दावेदारी नहीं कर पाएगा. ऐसे में हमें कुछ बूथों पर भितरघात की भी ख़बरें मिली हैं.’

जानकारों के मुताबिक अल्पेश के बार-बार अपने स्टैंड से पलट जाने की वजह से भी उनकी छवि को बड़ा नुकसान पहुंचा है. गौरतलब है कि ठाकोर सेना के गठन के बाद अल्पेश ने सार्वजनिक तौर पर कई बार राजनीति में कदम न रखने की प्रतिज्ञा ली थी. लेकिन उनकी इस प्रतिज्ञा का हश्र सभी के सामने है. इसके बाद उन्होंने अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों से पाटीदारों की मुखालफत करवाकर गुजरात को एक बार फ़िर कौमी हिंसा के मुहाने पर ला खड़ा किया (हिंदू-मुसलमान दंगों के अलावा गुजरात कई बार अलग-अलग हिंदू जातियों के बीच हुए दंगों का भी गवाह रह चुका है). लेकिन 2017 का विधानसभा चुनाव आते-आते अल्पेश ख़ुद हार्दिक पटेल के करीबी बन गए.

इससे पहले उन्होंने कांग्रेस और भाजपा दोनों में से किसी के साथ न जाने जैसी बातें भी कई बार दोहराई थीं. लेकिन वे पहले कांग्रेस जुड़े और भारतीय जनता पार्टी को जी भर के कोसने के बाद उसके पाले में आ गए. ऐसा करते समय वे शायद भूल गए थे कि उनसे पहले राधनपुर के मतदाता 2012 और 2017 के विधानसभा चुनाव में दल-बदलकर चुनाव लड़ने वाले विधायकों को घर का रास्ता दिखा चुके हैं.

उपचुनाव में अल्पेश ठाकोर और धवल सिंह झाला की हार के बाद कांग्रेस में एक स्वाभाविक खुशी का माहौल तो है ही लेकिन इससे पार्टी को बड़ा फायदा भी पहुंचा है. गुजरात में कांग्रेस के एक मौजूदा विधायक इस बारे में सत्याग्रह को बताते हैं कि ‘अल्पेश और झाला के बाद पार्टी के कुछ अन्य विधायकों में भी दल-बदलने को लेकर सुगबुगाहट होने लगी थी. आशंका थी कि राज्यसभा की चार सीटों के लिए होने वाले आगामी चुनावों में वे भी भाजपा प्रत्याशियों को अपना समर्थन दे सकते हैं. लेकिन इन नतीजों के बाद उनके हौंसले पस्त होते दिख रहे हैं.’