नेमि-शति के अंतर्गत कविता पर आयोजित परिसंवाद में कवि असद जै़दी ने चलते-चलते यह कहा कि आज युवा कविता का कोई आख्यान नहीं है. भाव यह था कि इस कविता की कोई वैचारिक दिशा या संभावना फिलवक़्त नज़र नहीं आती और वह, पिछले कई दशकों की कविता से जिनके कुछ-कुछ आख्यान रहे हैं, अलग हैं. वह आख्यानहीन कविता है. एक युवा कवयित्री ने इस धारणा पर प्रहार करते हुए कहा कि आज की युवा कविता का कोई ईश्वर नहीं है और इसलिए उसका कोई पारंपरिक आख्यान भी नहीं है. यह शायद विचारधारा से मुक्ति का उद्घोष था क्योंकि उनके द्वारा बनाये गये आख्यान अब अप्रासंगिक हो चुके हैं. इस तरह दो दृष्टियां प्रगट हुई. आख्यान को पहचान के लिए ज़रूरी माननेवाली एक और अपनी पहचान को आख्यान-मुक्त ढंग से परिभाषित करनेवाली दूसरी.

सामान्यीकरण कविता के लिए आवश्यक नहीं पर आलोचना, विचार और विश्लेषण के लिए वह लगभग अनिवार्य है. आख्यान अकसर एक सामान्यीकरण ही होता है. आज जब कविता में अपार बहुलता व्याप गयी है, उसका भूगोल बहुत फैल गया है. उसे या उसके बारे में कोई सामान्य बात कहना कई बार उस बहुलता से अस्वीकार जैसा हो जाता है. शायद यह भी सही है कि इस बहुलता के बावजूद आज युवा कवियों के बीच वैसा वैचारिक द्वन्द्व या बहस नहीं है जैसी कि पहले के कवियों में लगभग अनिवार्य रूप से होती रही है. आपसी मोह-मत्सर, ईर्ष्या, मतभेद आदि हैं पर उनकी वैचारिक अभिव्यक्ति बहुत कम है. एक पहलू यह भी है कि स्थिति, शायद थोड़े मोहक और अबोध ढंग से, अराजक है जिसमें केन्द्रीयता का अभाव है. ऐसा भी नहीं लगता कि अपने से पिछले को ठीक से अस्वीकृत या ध्वस्त भी किया गया हो. बावजूद उफनती आकांक्षा के ऐसे ध्वंस के लिए तोड़-फोड़ करनेवाला या उसका दावा करनेवाला अवांगर्द नहीं है. परिवर्तन हो रहे हैं, नये इलाके अनुभव और ज़मीन के, नये लोग अश्रुतपूर्व अंचलों के कविता में आ रहे हैं पर कुल मिलाकर भाषा और शिल्प का ढांचा वही बना हुआ है जो पिछले बीसेक वर्षों से बना हुआ है.

जो भी है, उसका एक कारण यह साफ़ नज़र आता है कि हमारे यहां प्रश्नवाचकता और आलोचना की वृत्तियां शिथिल पड़ रही हैं. हो सकता है कि वे स्वयं कविता की काया में अधिक सक्रिय हों हालांकि इसका बहुत साक्ष्य मिलता नहीं है. आख्यानों का समय गया तो लगता है कि घोषणापत्रों, अपनी आस्था बताने के रिवाज़ का भी समय चला गया है. इस अर्थ में आज युवा कवि अधिक निहत्था होकर मैदान में है. उसका रंगस्थल और रणस्थल कविता ही है.

कविता पर कुछ बातें

युवा कविता पर एकाग्र रज़ा फ़ाउण्डेशन और अर्धशिला द्वारा पटना में आयोजित ‘दो दिन कविता के’ के आरंभ में मैंने कुछ सूक्तियों का सहारा लेते हुए याद दिलाया-

कविता व्यक्ति लिखता है, समाज नहीं. समाज ने किसी को कविता लिखने का काम कभी नहीं सौंपा. चूंकि भाषा व्यक्तिगत संपत्ति नहीं, सामाजिक सम्पदा है, कविता व्यक्ति द्वारा लिखी जाकर भी सामाजिक कर्म होती है. कविता भाषा में लिखी जाती है. भाषा के प्रति सजगता, ज़िम्मेदारी उसके लिए ज़रूरी है. कविता भाषा का कच्चा नहीं शिल्पित रूप है. बिना शिल्प के कविता नहीं हो सकती. शिल्प कविता का अन्तःकरण होता है जो उसे अनुशासन में रखता है.

कविता समाज का ज़रूरी पर शब्द-स्पन्दित एकांत होती है. जितना कवि अपने समय को लिखता-गढ़ता है उतना ही समय कवि को गढ़ता है. पास्तरनाक ने कहा था- कवि अनंत की राजदूत है जिसे समय ने बंधक बना रखा है. कविता अधिकार भर नहीं है, वह उत्तराधिकार भी है.

कविता भाषा का, भाषा में स्वराज है. वह अन्यत्र सोचे-गढ़े प्रभावशाली विचारों, अभिप्रायों, दृष्टियों आदि का उपनिवेश बनने से इनकार करती है. कविता सरलीकरण, समग्रीकरण, सामान्यीकरण के विरुद्ध अथक सत्याग्रह होती है. कविता सच कहने की कोशिश, हिम्मत करती है पर वह अपने सच पर ईमानदार शक भी करती है. कविता का देवता उसके ब्योरों में बसता है. कविता परम सत्य और चरम असत्य के बीच गोधूलि में विचरती है. ख़बर या फ़िल्मी गीत की तरह कविता अपना सच शुरू में ही प्रगट नहीं कर देती है. उसका सच साझा सच होता है और वह पूरा और मुक़क्मल तभी होता है जब पाठक-रसिक उसमें थोड़ा सा अपना सच मिलाते हैं.

कविता आत्मरति से भी लिखी जा सकती है- अच्छी कविता आत्मविस्तार से लिखी जाती है. सत्यातीत समय में, झूठों के बढ़ते घटाटोप में, सच के अल्पसंख्यक होते जाने की अभागी स्थिति में कविता सच का साथ नहीं छोड़ती. कविता ‘आत्म’ और ‘पर’; अपने और दूसरे के बीच के द्वैत को ध्वस्त करती है. हर दिन नये दूसरे बनाये जाने के क्रूर अमानवीय उपक्रम में कविता सविनय अवज्ञा है. कविता का संघर्ष उससे बाहर किसी वफादारी की घोषणा से नहीं माना जा सकता. उसे अनिवार्य रूप से भाषा का, भाषा में संघर्ष होना पड़ता है. कविता का काम संसार के बिना नहीं चल सकता, भले संसार का काम कविता के बिना चल जाये! कविता संसार का सत्यापन, उसका गुणगान है. कविता अपार विशाल गद्य से हर समय घिरी है- वह अल्पसंख्यक है, पर उसके बिना साहित्य का लोकतंत्र संभव नहीं है.

प्रार्थना और प्रतिरोध, शोभा और विद्रूप, प्रश्नवाचक और विस्मयादि बोधक, विनय पत्रिका और युद्धघोष, चीत्कार-ललकार, मनुहार कविता सब हो सकती है पर वह आत्मधर्म कभी नहीं छोड़ती. स्मृति और कल्पना के बिना कविता संभव नहीं, वह यथार्थ का सिर्फ़ बिम्ब नहीं होती, उसमें कुछ जोड़ती-इज़ाफा करती है. कविता अंधेरे में उम्मीद लगाती है पर अंधेरे से उम्मीद कभी नहीं. कविता हमें बचा नहीं सकती पर वह हमेशा हमें यह जता-बता सकती है कि बचना कितना भी कठिन क्यों न हो, असंभव नहीं है. कविता में यह अहसास कभी कमज़ोर नहीं पड़ना चाहिये कि जीवन कविता से कहीं बड़ा है- कविता में वह पूरी तरह से अंट नहीं सकता. पर कविता कहीं-न-कहीं जीवन को समापन से बचाती है- उसे स्थगित करती है, उसके सर्वथा व्यतीत होते जाने को. कविता कवि को दुनिया के नज़दीक ले आती है: कितना भी झुठलाना चाहे दुनिया को कवि, कविता दुनिया को उसके लिए सच बनाती है. कई बार कवि नहीं जान पाता कि इस तरह दुनिया को उसके लिए सच बनाती हुई कविता स्वयं कवि को सच बनाती है.

विडंंबना

इस समय देश और समाज में जो हो रहा है उसे लेकर लेखकों का चिन्तित होना स्वाभाविक और ज़रूरी है. यह जताना भी कि वे हिंसा-हत्या-जातीय विद्वेष-धार्मिक उन्माद की बढ़ती और लोकप्रिय होती मानसिकता का विरोध करते हैं, बहुत ज़रूरी है. इसके लिए कभी-कभी लेखन से अलग नागरिक प्रतिरोध में भाग लेना भी ज़रूरी है. दूसरी ओर, इसका भी ध्यान रखना ज़रूरी है कि प्रतिरोध की अभिव्यक्ति के लिए कौन सा शिल्प, कौन-सी भाषा चुनी जाये. जब कुछ चतुराई और पाखंड का एक नया क्रूर शिल्प विकसित होकर व्यापक हो रहा हो, भाषा को लगातार गाली-गलौज और घृणा की वाहक बनाया जा रहा हो तब यह प्रलोभन हो सकता है कि प्रतिरोध भी वही मुहावरे अपना ले, अभिधा पर ज़रूरत से ज़्यादा विश्वास करने लगे और भाषा की गहरी अन्तर्ध्वनियों के उपयोग से विरत हो जाये. स्वयं हमारे साहित्य में प्रतिरोध के जो बड़े और टिकाऊ उदाहरण हैं उनसे और संसार की अनेक भाषाओं में भी उनसे यह सीख मिलती है कि प्रतिरोध साहित्य में अख़बारी और दूसरों पर निरा दोषारोपण नहीं हो सकता. ऐसा होकर वह अपने प्रतिरोध को मैला और तुरन्ता ही करेगा. आयरिश कवि यीट्स ने लगभग एक सदी पहले एक राजनैतिक कविता में ‘एक भयानक सौंदर्य’ के पैदा होने की बात की थी. क्या आज हमारे प्रतिरोध का समकालीन साहित्य ऐसा ‘भयानक सौंदर्य’ रचने की सोच भी रहा है?