भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में अरुणाचाल प्रदेश ही ऐसा है जो जातीय हिंसा से लगभग मुक्त है. चकमा शरणार्थी विवाद इस प्रदेश का सबसे संवेदनशील मसला है. चकमा मूलरूप से बौद्ध मान्यताओं के मानने वाला जनजाति समुदाय है. ये लोग सैकड़ों सालों से बांग्लादेश की चिटगांग पहाड़ी क्षेत्र में रहते आए हैं. लेकिन 1964 में इस क्षेत्र में काप्टाई बांध का निर्माण होने के बाद इन्हें विस्थापित होना पड़ा. उस समय चकमा समुदाय बांग्लादेश (पूर्वी पाकिस्तान) की बहुसंख्यक आबादी द्वारा किए गए अत्याचारों का शिकार भी बन रहा था. नतीजतन इस समुदाय के तकरीबन 35 हजार लोग अरुणाचल प्रदेश आ गए.

अरुणाचल प्रदेश को तब नार्दन ईस्टर्न फ्रंटियर एजेंसी (नेफा) के नाम से जाना जाता था और इसका प्रशासन केंद्र सरकार के हाथ में था. पलायन करके भारत आए चकमा लोगों ने जब सरकार से शरणार्थी दर्जे की मांग की तो उन्हें खेती-किसानी के लिए जमीन देकर अरुणाचल प्रदेश के ही कुछ जिलों में बसा दिया गया. फिर 1971 में बांग्लादेश का निर्माण हो गया लेकिन चकमा के लोगों ने वहां लौटने से इनकार कर दिया. उस समय भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में हजारों की संख्या में दूसरे बांग्लादेशी भी शरण लिए हुए थे. इन लोगों की नागरिकता का मुद्दा सुलझाने के लिए प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी औऱ बांग्लादेश के पहले राष्ट्रपति शेख मुजीब के बीच एक संधि हुई. इसके मुताबिक मार्च, 1972 के पहले भारत आए बांग्लादेशियों को भारतीय नागरिकता दी जानी थी. संधि के मुताबिक हजारों लोगों को भारत की नागरिकता मिली भी, लेकिन इस दौरान चकमा शरणार्थी भारतीय नागरिकता पाने से वंचित रह गए.
चूंकि इन लोगों को नागरिकता देने के बारे में सरकार को तब कोई संशय नहीं था और वह पूरी तरह उसके अधिकार क्षेत्र में भी था इसलिए सरकार ने पहले वरीयता अन्य विस्थापितों को दी. इस बीच 1987 में अरुणाचल प्रदेश को अलग राज्य का दर्जा दे दिया गया. इसके बाद से राज्य के राजनीतिक दलों के लिए अचानक ही चकमा शरणार्थियों का विरोध एक राजनीतिक हथियार बन गया. स्थानीय जनजातियां वहां चकमा लोगों को बसाने का विरोध इस आधार पर करने लगीं कि इससे उनकी आजीविका के संसाधन छिन जाएंगे.
राज्य में 1995 में विधानसभा चुनाव होने के ठीक एक साल पहले यह मामला काफी चर्चा में आ गया था. 1994 में ऑल अरुणाचल प्रदेश स्टूडेंट्स यूनियन (आप्सू) ने चकमा शरणार्थियों को प्रदेश छोड़कर जाने का अल्टीमेटम दे दिया. इसके बाद नियत तिथि आते-आते राज्य में जातीय संघर्ष के हालात बन गए. कहा जाता है कि चकमा लोग भी प्रतिरोध के लिए संगठित हो गए थे. दोनों पक्षों के एकजुट हो जाने का असर यह हुआ कि कई दिनों तक यहां तनाव के बाद भी हिंसा की कोई बड़ी घटना नहीं हुई.
1996 में इस घटना के बाद ही राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अरुणाचल प्रदेश सरकार से तुरंत चकमा लोगों के नागरिकता आवेदन जमा करके उन्हें सुरक्षा मुहैया कराने का निर्देश दिया था. कुछ समय के लिए यह प्रक्रिया शुरू की गई लेकिन उसके बाद राजनीतिक विरोध के चलते यह फिर ठंडे बस्ते में चली गई. उसके बाद से आज तक इस प्रदेश में चकमा समुदाय के हजारों लोग शरणार्थियों की तरह ही जीवन जी रहे हैं.
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