पिछले दिनों अमेरिका ने सीरिया से लगती तुर्की की सीमा से अपने सैनिकों को हटाने का ऐलान किया. इसके अगले ही दिन अमेरिकी सेना ने यह इलाका खाली कर दिया. इसके तुरंत बाद ही तुर्की ने सीरियाई कुर्दों पर धावा बोल दिया. सीरिया की उत्तरी सीमा के नजदीक कुर्दों के नेतृत्व वाले सीरियन डेमोक्रेटिक गठबंधन (एसडीएफ) के खिलाफ उसकी कार्रवाई में सैकड़ों कुर्द लड़ाके मारे गए.

सीरिया से सेना वापस बुलाने के अमेरिका के फैसले की भारी आलोचना हुई. इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तुर्की के साथ एक समझौता किया. इसके तहत तुर्की इस बात पर सहमत हुआ कि वह अगले पांच दिन यानी 22 अक्टूबर तक सीरिया में कुर्दों पर कोई हमला नहीं करेगा. अमेरिका की तरफ से कहा गया कि इन पांच दिनों में कुर्द तुर्की से लगते सीरियाई इलाकों को खाली कर देंगे. अमेरिका ने यह भी कहा कि पांच दिनों तक अमेरिका तुर्की पर कोई नए प्रतिबंध नहीं लगाएगा और इसके बाद जब कुर्द सीमाई इलाकों से चले जाएंगे और तुर्की पूर्ण संघर्षविराम के तहत अपनी सेना को सीरियाई क्षेत्रों से वापस बुला लेगा, तो अमेरिका उस पर से पुराने प्रतिबंध भी हटा लेगा. समझौते में यह भी कहा गया कि इसके बाद तुर्की के कुर्दों द्वारा सीरिया में खाली किये क्षेत्र में एक ‘सुरक्षित बफर क्षेत्र’ का निर्माण शुरू करेगा.

लेकिन 22 अक्टूबर को ही तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन रूस चले गए और वहां के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से एक समझौता कर लिया. रूस के सोची में छह घंटे की लंबी बैठक के बाद तय हुआ कि अगले छह दिनों में कुर्द नागरिक और लड़ाके उत्तरी सीरिया में तुर्की से लगते 120 किमी लंबे और 32 किमी चौड़े क्षेत्र को खाली करेंगे. यह काम रूस और सीरिया के सैनिकों की देख रेख में होगा. समझौते के मुताबिक इसके बाद तुर्की इस खाली क्षेत्र में एक ‘सुरक्षित बफर क्षेत्र’ का निर्माण करेगा जिस पर फिलहाल उसका ही कब्जा होगा. वह इस क्षेत्र के निर्माण के बाद यहां अपने यहां रह रहे 10 लाख सीरियाई शरणार्थियों को रखेगा.

तुर्की का कहना है कि सीरिया में तुर्की के कब्जे वाले इस क्षेत्र के निर्माण से सीरियाई कुर्द भी उसकी सीमा से काफी दूर हो जाएंगे जिन्हें वह आतंकवादी मानता है. उसका मानना है कि सीरिया में आईएस से लड़ रहे एसडीएफ गठबंधन में शामिल सशस्त्र कुर्दिश पीपल्स प्रोटेक्शन यूनिट (वाईपीजी) एक आतंकी संगठन है, जो तुर्की स्थित कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी (पीकेके) का अहम सहयोगी है. पीकेके कुर्दों को अधिकार दिलाने के लिए तुर्की सरकार के खिलाफ लम्बे समय से लड़ाई लड़ रही है.

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (बाएं) और तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन | फोटो : एएफपी

बहरहाल, रूस और तुर्की के बीच हुए समझौते में यह भी तय हुआ कि जब तक तुर्की सीरिया में ‘सुरक्षित बफर क्षेत्र’ का निर्माण नहीं कर लेता, तब तक रूसी और तुर्की सेना संयुक्त रूप से इस इलाके में गश्त करेगी.

आठ साल के गृह युद्ध के बाद अब सीरिया सरकार, विद्रोही और आईएस की क्या हालत है?

सीरियाई गृह युद्ध में 2014-2015 के दौरान कहा जाता था कि विद्रोही किसी भी दिन सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद को हटा सकते हैं. उस समय इन विद्रोहियों को अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, इजरायल, सऊदी अरब और तुर्की के अलावा आतंकी संगठन अलकायदा का भी समर्थन हासिल था. लेकिन 2015 के मध्य में बशर अल-असद रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के पास मदद के लिए पहुंच गए. इसके बाद पासा पलट गया. रूस के आने के बाद अमेरिका, इजरायल और सऊदी अरब ने बैक डोर से विद्रोहियों को दी जाने वाली मदद धीरे-धीरे बंद कर दी. रूसी वायुसेना, ईरान और लेबनानी मिलिशिया हिजबुल्लाह की मदद से असद ने एक के बाद एक सभी बड़े प्रांतों से विद्रोहियों को खदेड़ दिया.

सीरिया में अलकायदा से जुड़े विद्रोहियों को सबसे ताकतवर माना जाता था, लेकिन अब ये पूरी तरह बिखर चुके हैं. अलकायदा के समर्थन वाले सबसे बड़े विद्रोही गुट ‘हयात तहरीर अल-शाम’ - जिसे पहले ‘अल नुसरा फ्रंट’ के नाम से भी जाना जाता था, का इदलिब प्रांत के उत्तर पश्चिम हिस्से में ही अब कब्जा रह गया है. इसके अलावा सीरिया के उत्तर पूर्व के कुछ गिने चुने हिस्सों में उन विद्रोहियों का कब्जा है जिन्हें तुर्की का समर्थन हासिल है.

‘हयात तहरीर अल-शाम’ से जुड़े कुछ विद्रोही संगठन असद सरकार की बढ़ती ताकत को देखते हुए आये दिन बातचीत का प्रस्ताव भी देते हैं. लेकिन राष्ट्रपति बशर अल-असद अब किसी भी दबाब के आगे झुकने को तैयार नहीं है. उनका कहना है कि विद्रोहियों को कोई भी रियायत नहीं दी जायेगी और सीरियाई सेना एक-एक गांव पर अपना कब्जा वापस लेगी.

इन दो के अलावा सीरिया में एक तीसरा पक्ष आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएस) है. आईएस अब अपनी जड़ें खो चुका है, इस समय सीरिया के किसी भी शहर पर इस संगठन का कब्जा नहीं है. सीरिया में इस्लामिक सरकार के गठन का ख्याब देखने वाले आईएस के हजारों लड़ाके मारे जा चुके हैं और हजारों वहां की जेलों में बंद हैं. हालांकि, पिछले दिनों आयी अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की एक रिपोर्ट के अनुसार आईएस के जो लड़ाके सीरिया की आबादी में घुलमिल गए हैं, वे एक बार फिर बड़े विद्रोह की योजना बना रहे हैं. अपनी इस योजना के तहत ही ये लड़ाके आत्मघाती हमले कर रहे हैं. पिछले कुछ महीनों में इन्होंने धन उगाहने की कोशिशें भी तेज कर दी हैं.

अमेरिका और रूस से तुर्की के समझौते के बाद सीरिया का क्या भविष्य दिखता है?

पिछले दिनों जब अमेरिका ने कुर्दों को लेकर तुर्की से (5 दिन वाला) समझौता किया था तो इसके बाद सीरिया में आने वाले समय में एक और गृह युद्ध की आशंका जताई जाने लगी थी. कुछ अमेरिकी विशेषज्ञों का कहना था कि ऐसा इसलिए है कि तुर्की सीरिया के अंदर 32 किमी तक एक ऐसा ‘सुरक्षित बफर क्षेत्र’ बनाने जा रहा है जिस पर उसका कब्जा होगा. उनका दावा था कि यही बात आगे जाकर लड़ाई की वजह बनेगी क्योंकि सीरियाई सरकार इसका विरोध कर रही है और इसे अपनी संप्रुभता का उल्लंघन बता रही है. उनके मुताबिक आगे जाकर बड़ी जंग छिड़ने की पूरी आशंका है जिसमें कुर्द और रूस सीरिया की सरकार के साथ होंगे.

इस मामले में अहम यह भी था कि इस बफर क्षेत्र पर तुर्की के अलावा उन सीरियाई विद्रोहियों और तथाकथित आतंकी संगठनों का भी नियंत्रण होता, जो लंबे समय से सीरिया की सरकार के खिलाफ लड़ रहे हैं और तुर्की इनका सहयोगी है.

लेकिन, रूस के साथ हुए समझौते ने स्थिति को पलट दिया

अमेरिका के साथ हुए तुर्की के समझौते के बाद सीरिया के भविष्य को लेकर जो चिंताएं दिखने लगी थीं, उन्हें रूस और तुर्की के बीच हुए समझौते ने लगभग खत्म कर दिया है. तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन जिन बातों पर राजी हुए हैं, उनके चलते सीरिया में परस्थितियां ही उलट गयी हैं. जो जानकार एक दिन पहले तक एक और गृह युद्ध की आशंका जाता रहे थे, वे भी इस समझौते के बाद सीरिया में जल्द ही राजनीतिक हल निकलने की बात कहने लगे हैं.

इन जानकारों के ऐसा कहने की वजह भी है. दरअसल, रूस और तुर्की के बीच हुए समझौते से साफ़ है कि तुर्की बशर अल-असद का अब और विरोध नहीं करेगा क्योंकि उसे ‘सुरक्षित बफर क्षेत्र’ के निर्माण में असद और उनके सबसे बड़े मददगार रूस का सहयोग चाहिए. यानी समझौते के बाद अब तुर्की, रूस और सीरियाई सरकार एक पक्ष में आ चुके हैं. सीरिया की जो सेना कुछ दिन पहले तुर्की के खिलाफ कुर्दों की मदद में सामने गयी थी, अब वह कुर्दों को हटाने और ‘सुरक्षित बफर क्षेत्र’ बनाने में तुर्की की मदद करेगी. सीरियाई राष्ट्रपति को इस समझौते से एक और फायदा ये हुआ है कि तुर्की समर्थित विद्रोही समूह भी अब शांत रहेंगे.

तुर्की और रूस के बीच हुए समझौते में कुछ और बातें भी ऐसी हैं, जिनसे बशर अल-असद को बड़ा फायदा होने जा रहा है. बीते पांच सालों में सीरिया में अन्य देशों की भूमिका पर नजर डालें तो यूरोप, अमेरिका, सऊदी अरब और तुर्की असद के खिलाफ थे और उन्हें सत्ता से उखाड़ फेंकने के लिए विद्रोहियों की मदद कर रहे थे.

लेकिन, रूस के साथ हुए समझौते में तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन ने कहा है कि वे अब बेहद गंभीरता से सीरिया का राजनीतिक हल निकालने के लिए प्रयास शुरू करेंगे. इसके लिए तुर्की, रूस और ईरान के बीच जल्द ही बैठकें शुरू होंगी. समझौते से पहले हुई छह घंटे की बैठक में व्लादिमीर पुतिन ने एर्दोआन से ये भी कहा कि एर्दोआन खुद सीरिया की असद सरकार से बात करें. बताया जा रहा है कि एर्दोआन ने इस पर हामी भरी है, हालांकि यह बात समझौते में शामिल नहीं है.

जो मैकरॉन, अरब सेंटर वाशिंगटन डीसी में मध्यपूर्व मामलों के विशेषज्ञ हैं

इस समझौते के बाद मध्यपूर्व मामलों के कुछ जानकार कहते हैं कि असद के लिए अब परस्थितियां बेहद सहज होती जा रही हैं - इसलिए कि उनका सबसे बड़ा विरोधी अमेरिका पहले ही सीरिया छोड़ चुका है और दूसरा तुर्की, अब उनके पक्ष में आ गया है.

ब्रिटेन के चर्चित थिंक टैंक ‘चाथम हाउस’ में मध्य पूर्व मामलों की प्रमुख लीना खतीब न्यूज़ एजेंसी एपी से बातचीत में कहती हैं कि तुर्की, जिसने सीरियाई शासक बशर अल-असद को सत्ता से बाहर करने की भरपूर कोशिश की और विद्रोहियों का समर्थन किया, उसने अब सीरियाई नेता को ‘वास्तविक रूप से मान्यता’ दे दी है. वे आगे कहती हैं कि असद और रूस तुर्की से मिली इस मान्यता को असद सरकार को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामान्य होने (या मान्यता देने) की शुरुआत की तरह देख रहे हैं, और यह गृह युद्ध में उनकी जीत के संकेत जैसा है.

कुछ अन्य जानकार भी मानते हैं कि अब बशर अल-असद की उस रणनीति को मजबूती मिलेगी जिसके तहत वे दुनिया के सामने खुद को सीरिया के एक मात्र विकल्प के तौर पर पेश कर रहे थे. तुर्की का साथ मिलने का फायदा यह भी है कि मुस्लिम देशों पर तुर्की का अच्छा प्रभाव है. ऐसे में उसके असद का साथ देने के बाद ज्यादातर मुस्लिम देश असद सरकार का विरोध नहीं कर पाएंगे. इसके बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय के पास उन्हें मान्यता देने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा. यह काम अब इसलिए भी आसान होगा क्योंकि अमेरिका ने इस मसले पर दिलचस्पी लेना ही बंद कर दिया है, जो कुछ साल पहले तक संयुक्त राष्ट्र से लेकर हर बड़े मंच पर असद सरकार का सबसे बड़ा विरोधी था.

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