हैदराबाद के सातवें निजाम की संपत्ति से जुड़े एक मामले में पिछले दिनों ब्रिटेन की एक अदालत का फैसला आया था. करीब 300 करोड़ रुपये के मालिकाना हक वाला यह मामला भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहा था. अदालत के फैसले के मुताबिक 71 साल पहले हैदराबाद के सातवें निजाम उस्मान अली खान सिद्दीकी ने जो रकम ब्रिटेन के एक बैंक में जमा करवाई थी उस पर उनके वारिसों और भारत का हक है.

इस खजाने का अब भारत सरकार और निजाम के परिजनों के बीच बंटवारा होगा. निजाम के वंशजों और भारत सरकार के बीच इस खजाने का जिस तरह से बंटवारा होना है उसके बारे में दोनो पक्षों के बीच पहले ही अनुबंध हो चुका है. लेकिन निजाम के परिजनों के बीच इस संपत्ति का बंटवारा कैसे होगा, इसे लेकर स्थिति अभी साफ नहीं है.

जानकारों का मानना है कि इस मामले में हाल में ही नवाबों के एक दूसरे परिवार के बीच चले देश के सबसे लंबे दीवानी मुकदमे को नजीर की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है. सर्वोच्च न्यायालय ने इसी साल जुलाई में इस मुकदमे पर अपना फैसला सुनाया था. इसमें कहा गया था कि देश के सभी पूर्व रजवाड़ों की संपत्ति के हकदार उनके सभी वारिस होंगे न कि सिर्फ गद्दी या वंश परंपरा को संभालने वाला व्यक्ति.

पहले बात निजाम की संपत्ति के मुकदमे की. आजादी के समय हैदराबाद ने भारत में शामिल होने से इनकार कर दिया था. तब हैदराबाद आसफ जाह वंश के सातवें वंशज नवाब मीर उस्मान अली खान सिद्दीकी की रियासत हुआ करती थी. उस दौर में वे दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति माने जाते थे. 1948 में ‘ऑपरेशन पोलो’ नाम के सैन्य अभियान के जरिए इस रियासत का विलय भारत में कर दिया गया. इसी दौरान निजाम ने ब्रिटेन के एक सरकारी बैंक में दस लाख की पाउंड की एक रकम ट्रांसफर की थी. 1948 में निजाम के वित्त मंत्री मोईन नवाब जंग ने इस रकम को जिस बैंक अकाउंट में ट्रांसफर किया था उसे ब्रिटेन में पाकिस्तान के उच्चायुक्त हबीब इब्राहिम रहमतुल्लाह संचालित कर रहे थे.

रियासत के विलय के बाद 1954 में निजाम ने राज्य सरकार के साथ समझौता कर लिया और इस रकम की वापसी के लिए अदालत में मुकदमा दायर कर दिया. मामला किसी निर्णय तक पहुंचता उससे पहले ही पाकिस्तान भी इसे लेकर अदालत में पहुंच गया. उसका दावा था कि निजाम ने यह रकम इसलिए ट्रांसफर की थी ताकि इसके बदले हैदराबाद की सेना को हथियार मिल सकें. उसका यह भी कहना था कि इस मामले की सुनवाई करके अदालत पाकिस्तान की संप्रभुता में दखल दे रही है.

पाकिस्तानी दखल के बाद ब्रिटिश अदालत ने इस रकम से जुड़े खाते को सीज कर दिया. 1965 में इस रकम के लिए भारत सरकार के साथ निजाम का अनुबंध हो जाने पर उसने भी इस रकम पर अपनी दावेदारी ठोंक दी. इस दौरान यह रकम ब्रिटिश बैंक में ही पड़ी रही जो सात दशक में बढ़कर 35 लाख पाउंड यानी 306 करोड़ रूपये हो गई.

इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में कुलभूषण जाधव वाले मामले को लड़ने वाले मशहूर वकील हरीश साल्वे ही ब्रिटिश अदालत में इस मामले को लड़ रहे थे. अभी पाकिस्तान के पास इस फैसले को चुनौती देने का एक मौका है. लेकिन अदालत ने 140 पृष्ठों के अपने फैसले में जिन तर्कों और सबूतों का सहारा लिया है उनसे तय है कि देर-सबेर इस रकम का एक बड़ा हिस्सा निजाम के वंशजों को मिलना ही है. इसमें कोई और कानूनी अड़चन न आए इसके लिए रामपुर नवाब की संपत्ति के बंटवारे के लिए 31 जुलाई 2019 को आया सुप्रीम कोर्ट का फैसला अहम साबित हो सकता है. यह मामला फैसला आने से 53 साल पहले 1966 में शुरू हुआ था.

रामपुर की लगभग 200 वर्ष पुरानी रियासत 15 मई 1949 को भारत में शामिल हुई थी. विलय की शर्तो के मुताबिक नवाब रजा अली खान को अपनी निजी संपत्ति पर सर्वाधिकार प्राप्त हुए थे. 1966 में उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र मुर्तजा अली खान को उनका उत्तराधिकार मिला. लेकिन उनके भाई जुल्फिकार अली ने इसे चुनौती देते हुए संपत्ति में बराबर का हिस्सा मांगा. यहीं से यह मामला दीवानी अदालतों से होता हुआ सुप्रीम कोर्ट में 47 वर्षों तक चलता रहा.

रामपुर से जुड़े मामले में मूल मुद्दा यह था कि संपत्ति का बंटवारा मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत होगा या शाही परिवारों द्वारा अपनाए जाने वाले गद्दी कानून के तहत. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2002 में गद्दी कानून के तहत मुर्तजा अली खान के पक्ष में फैसला दिया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को पलट दिया. ऐसा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आखिरी नवाब के बाद जिसे गद्दी सौंपी गई थी सिर्फ उसे ही नहीं बल्कि नवाब के सभी वंशजों के बीच संपत्ति का विभाजन होगा.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा, ‘ये राजा सिर्फ नाम के राजा हैं. इनका न कोई साम्राज्य रहा और न कोई प्रजा. विलय के बाद इन रजवाड़ों के राजा, राजा नहीं रहे इसलिए उनकी निजी संपत्तियां सामान्य उत्तराधिकार कानून के तहत तमाम उत्तराधिकारियों के बीच साझा होंगी.’

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब रजा परिवार की बेटियों को भी इस संपत्ति में हिस्सा मिलना तय है. यानी कि अब यह संपत्ति मुर्तजा अली, उन्हें कानूनी चुनौती देने वाले जुल्फिकार अली और उनकी छह बहनों के वारिसों के बीच बंटेगी. हाईकोर्ट के फैसले के बाद मुर्तजा अली खान रामपुर महल को हैरिटेज होटल में बदलने की योजना बना रहे थे मगर उनकी यह योजना अब खटाई में पड़ गई है.

रामपुर में रजा वंश की संपत्ति में खास बाग पैलेस और शाहबाद कैसल नाम के दो आलीशान महल हैं. रामपुर के नवाबी महल की भव्यता किसी जमाने में ऐसी थी कि वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने इसे देखकर कहा था कि यह तो लंदन के किसी होटल जैसी भव्य इमारत है.

रजा परिवार की संपत्तियों में कई महल, दर्जनों इमारतें, कई सौ एकड़ खेती व अन्य जमीन तथा बेशकीमती आभूषण शामिल है. रामपुर से बाहर नैनीताल, मुरादाबाद, रामनगर और मसूरी में भी इस परिवार की खासी संपत्तियां है. इनकी कीमत का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इसके सिर्फ एक छोटे से हिस्से पर काबिज इसी परिवार के काजिम अली ने 2014 के लोकसभा चुनाव में खुद को 55 करोड़ की जमीन का मालिक बताया था.

300 एकड़ के परिसर वाली 200 कमरों की कोठी खास बाग, शहर से बाहर बनी नजीर कोठी, नूर महल आदि अनेक नवाबी इमारतें अब खंडहरों मे भले ही तब्दील होती जा रही हों लेकिन उनकी भीतरी साज-सज्जा व फर्नीचर आदि अब भी बेशकीमती हैं.

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद कभी अपने संगीत, कला प्रेम, दस्तकारी के लिए जानी जाने वाली रामपुर रियासत की संपत्ति रजा परिवार के कुल 16 वंशजों में बंटनी है. सर्वोच्च न्यायालय के ही निर्देश के अनुसार रामपुर के जिला जज को 2020 दिसंबर तक इस प्रक्रिया को पूरा कर देना है.

सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय रामपुर के संपत्ति विवाद का जो समाधान लेकर आया है उससे निजाम हैदराबाद की ब्रिटेन में जमा धनराशि के बंटवारे का रास्ता तो बन ही सकता है, यह अनेक दूसरी छोटी-बड़ी रियासतों के मुकदमे निपटाने में भी खासा मददगार साबित हो सकता है.