बिहार की सत्ताधारी पार्टी जनता दल यूनाइटेड ने एक बार फिर से बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अपना राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया है. बीते बुधवार को दिल्ली में जेडीयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक आयोजित की गई थी. इसके बाद पार्टी महासचिव केसी त्यागी ने इस बैठक के बारे में पत्रकारों को जानकारी दी. इस दौरान उनसे केंद्रीय मंत्रिमंडल में जेडीयू के शामिल होने के बारे में भी पूछा गया. इस सवाल के जवाब में त्यागी का कहना था कि ‘अगर संख्या बल के आधार पर केंद्र सरकार में भागीदारी मिलती है और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के शीर्ष नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के द्वारा प्रयास किया जाता है तो जेडीयू इसका स्वागत करेगी.’

उन्होंने यह भी कहा कि 2015 में बिहार में जनादेश भाजपा के खिलाफ था. लेकिन इसके बावजूद जब जेडीयू ने भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने का निर्णय लिया तो संख्या बल के आधार पर उसे सरकार में प्रतिनिधित्व दिया गया. लेकिन यही काम भाजपा ने केंद्र सरकार बनाने के वक्त नहीं किया. जेडीयू ने बिहार सरकार में भाजपा को उपमुख्यमंत्री का पद भी दिया है लेकिन केंद्र में भाजपा के साथ आने के बाद उसे सिर्फ राज्यसभा में उपसभापति का ही पद मिला है.

उल्लेखनीय है कि 2019 में भाजपा के लोकसभा सांसदों की संख्या 300 के पार पहुंच गई है. इस वजह से भाजपा ने अपने सभी सहयोगी दलों को एक-एक मंत्रीपद देने का फॉर्मूला निकाला था. बिना यह सोचे कि किस दल के कितने सांसद हैं, हर सहयोगी दल से एक नाम मांगा गया और उसे मंत्री बना दिया गया. लेकिन जेडीयू ने भाजपा के इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया. उसने केंद्र में ‘सांकेतिक प्रति​निधित्व’ के इस प्रस्ताव को ठुकराते हुए केंद्र सरकार में शामिल नहीं होने का निर्णय लिया.

इसके तुरंत बाद नीतीश कुमार ने बिहार में अपनी सरकार के मंत्रिमंडल का विस्तार किया और भाजपा की ही तर्ज पर उससे मंत्रीपद के लिए एक नाम मांगा. इसे भाजपा ने नहीं माना और पार्टी की ओर से कोई नया नेता नीतीश मंत्रिमंडल में शामिल नहीं हुआ.

अब सवाल यह उठता है कि अभी आखिर ऐसा क्या हुआ कि जेडीयू मोदी मंत्रिमंडल में शामिल होने और उसमें आनुपातिक प्रतिनिधित्व की मांग कर रही है. राजनीतिक जानकार इसे महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनावों के परिणाम से जोड़ रहे हैं. इनका कहना है कि इन दोनों राज्यों में भले ही भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है लेकिन इनमें उसे अपने दम पर बहुमत नहीं मिलना यह दिखाता है कि कहीं न कहीं भाजपा को लेकर अब लोगों में उस स्तर का उत्साह नहीं है जितना लोकसभा चुनाव के वक्त था.

मोदी मंत्रिमंडल में जेडीयू की ओर से आनुपातिक प्रतिनिधित्व की मांग पर भाजपा के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘शिव सेना ने जिस तरह से भाजपा पर दबाव बना रखा है, संभव है कि उसे देखते हुए जेडीयू को लग रहा हो कि ये वक्त उसके भी अनुकूल है. राजनीति में टाइमिंग का बहुत महत्व होता है. जेडीयू को यह लग रहा होगा कि जिस तरह से हरियाणा में 10 सीटों वाली जननायक जनता पार्टी को उपमुख्यमंत्री का पद भाजपा ने दिया और जिस तरह से महाराष्ट्र में शिव सेना की ओर से मुख्यमंत्री पद की मांग की जा रही है, उसमें संभव है कि बीच का रास्ता निकालते हुए शिव सेना को मोदी मंत्रिमंडल में और प्रतिनिधित्व मिले.’

वे आगे कहते हैं, ‘ऐसा लगता है कि जेडीयू ने इस स्थिति को भांपते हुए पहले से ही भाजपा पर दबाव बनाने की शुरुआत कर दी है. जेडीयू को लग रहा होगा कि अगर मोदी मंत्रिमंडल में आने वाले दिनों में विस्तार होना है तो इस दबाव का उसे फायदा मिल सकता है. अगले साल बिहार में भी विधानसभा चुनाव होने हैं. अगर जेडीयू के कुछ नेता केंद्र में मंत्री बनते हैं तो जेडीयू को इसका लाभ बिहार के चुनावों में भी हो सकता है.’

नीतीश कुमार से जब मोदी मंत्रिमंडल में जेडीयू के शामिल होने के बारे में पूछा गया तो उन्होंने ऐसी किसी संभावना को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि ‘ऐसी कोई बात नहीं है.’ राजनीतिक जानकारों का कहना है कि भले ही महाराष्ट्र और हरियाणा के नतीजों की वजह से जेडीयू ने भाजपा पर दबाव बढ़ाया है लेकिन वह यह संकेत वह सार्वजनिक तौर पर नहीं देना चाहती है. यही वजह है कि केसी त्यागी के बयान के बाद नीतीश कुमार ऐसी किसी संभावना से इनकार कर रहे हैं.