निर्देशक: अभिषेक पाठक
लेखक: दानिश जे सिंह, राज बी शेट्टी (मूलकथा)
कलाकार: सन्नी सिंह, मानवी गागरू, सौरभ शुक्ला, अतुल कुमार
रेटिंग: 1.5/5

गंजेपन को किसी डिसेबिलिटी की तरह ट्रीट करने वाली ‘उजड़ा चमन’ साल 2017 में आई कन्नड़ फिल्म ‘ओंडु मोट्टेया काथे’ का हिंदी रीमेक है. यह दिलचस्प है कि जहां ‘उजड़ा चमन’ से एक हफ्ते पहले आई ‘हाउसफुल’ का मुख्य किरदार भी गंजा था, वहीं इसके बाद वाले हफ्ते में आ रही फिल्म ‘बाला’ भी गंजे नायक की ही कथा कहने जा रही है. ‘उजड़ा चमन’ की बात करें तो यह दिल्ली में रहने वाले युवा लेक्चरर चमन की कहानी कहती है. गंजेपन से परेशान चमन की दो ख्वाहिशें हैं. स्वाभाविक है कि इनमें से पहली लहराते बालों को पाने की है और दूसरी एक सुंदर बीवी पाने की. फिल्म की ख्वाहिश इन्हीं दोनों ख्वाहिशों के आसपास घूमती एक रॉम-कॉम रचने की थी लेकिन अफसोस ‘उजड़ा चमन’ इसमें बुरी तरह असफल होती है.

‘उजड़ा चमन’ की पहली बड़ी खामी इसकी अतिशयोक्ति है. यह अपने नायक का इतना मजाक बनते हुए दिखाती है कि लगता है जैसे वह दुनिया का इकलौता या पहला गंजा आदमी है. साथ ही, सामान्य से दोगुने वजन की उसकी नायिका अप्सरा फिल्म में क्यों है और ज्यादातर वक्त वह उदास क्यों रहती है, इसका भी फिल्म भली तरह से जवाब नहीं दे पाती है. इसके बाद अजीब यह है कि दोनों के बीच फिल्माए गए रूमानी दृश्यों में अप्सरा जहां बेवजह उत्साहित दिखाई देती है, वहीं चमन की उदासीनता का कोई कारण समझ नहीं आता है. यानी फिल्म में जो चल रहा है वह क्या है और क्यों है, यह सवाल आप बार-बार पूछते रह सकते हैं. इन सबके अलावा क्लीशेड-रिपीटेटिव कॉमिक सीक्वेंस और कम वजन के अति-शायराना संवाद फिल्म का मजा और किरकिरा करते हैं. यहां पर अगर कुछ अच्छा है तो केवल वही दृश्य हैं जो मूल फिल्म से जस के तस उठा लिए गए हैं.

अभिनय पर आएं तो, ‘प्यार का पंचनामा-2’ और ‘सोनू के टीटू की स्वीटी’ से चर्चा में आए सनी सिंह और वेब एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री का जाना-माना चेहरा बन चुकी मानवी गागरू ने फिल्म में मुख्य भूमिकाएं निभाई हैं. यहां पर ‘उजड़ा चमन’ टाइटल तब एकदम सटीक लगने लगता है, जब पूरी फिल्म के दौरान सनी सिंह सिर्फ उजड़े हुए एक्सप्रेशन्स ही देते दिखते हैं. फिल्म में सनी चाहे प्यार में पड़ रहे हों या उनका प्यार खटाई में पड़ रहा हो, उनके चेहरे पर आने वाले भाव लगभग एक से ही रहते हैं. बुरा यह है कि पूरे आत्मविश्वास के साथ उन्हें इस तरह का अभिनय करते देखकर महसूस होता है, मानो वे अपने सुदर्शन चेहरे पर कुछ ज्यादा ही भरोसा कर बैठे है.

सनी के उलट भारी-भरकम अप्सरा के अवतार में मानवी गागरू ज्यादा गुंजायश न होने के बावजूद अपने बढ़िया अभिनय से आपको खुश करती हैं. ‘फोर मोर शॉट्स प्लीज’, ‘ट्रिपलिंग’ और टीवीएफ की तमाम वेब सीरीजों में नज़र आ चुकी गागरू पहली बार बड़े परदे पर नज़र आई हैं. यहां पर वे अपने अपीयरेंस और अभिनय से ‘दम लगा के हईशा’ की भूमि पेडनेकर की याद दिलाती हैं लेकिन खुद के एक बेहतरीन अभिनेत्री होने का इशारा भी दे जाती हैं.

‘उजड़ा चमन’ के बारे में कहा जा सकता है कि कहानी से लेकर किरदार तक और दृश्यों से लेकर संवाद तक, हर जगह इसमें बढ़िया आइडियाज सोचे गए हैं लेकिन इन्हें सही तरीके से पहले कागज और फिर परदे पर नहीं उतारा जा सका है. यानी उजड़ा चमन में पहले कमजोर लेखन और फिर उतने ही कमजोर निर्देशन ने मिलकर गंजेपन पर एक मनोरंजक फिल्म बन पाने की संभावना को बुरी तरह खत्म किया है.

बाकी पक्षों की बात करें तो बुरे अभिनय के बाद फिल्म में जरूरत से ज्यादा ऊंचे स्वर में बजने वाला बैकग्राउंड संगीत भी आपको खूब खटकता है. कहीं पर यह संवादों के साथ सिंक नहीं हो पाता है तो कहीं पर दृश्यों के साथ फिट नहीं होता. दूसरी तरफ उजड़ा चमन के गाने काफी सुरीले हैं और ठीक सिचुएशन के साथ परदे पर आते हैं. फिल्म में अगर कुछ सबसे अच्छा है तो वह दिल्ली शहर है जिसे सिनेमैटोग्राफर सुधीर के चौधरी का कैमरा काफी खूबसूरती से दिखाता है. यहां पर साउथ दिल्ली या पुरानी दिल्ली के बजाय मध्य वर्ग यानी करोल बाग-मयूर विहार की दिल्ली देखकर आपको नएपन का एहसास होता है. लेकिन सिर्फ गाने सुनने या दिल्ली देखने के लिए थिएटर जाने की सलाह हम आपको नहीं देंगे. इसलिए आपके लिए अभिषेक पाठक निर्देशित ‘उजड़ा चमन’ के इंटरनेट या टीवी पर आने का या अगले हफ्ते इसी विषय पर बनी फिल्म ‘बाला’ का इंतजार करना बेहतर विकल्प होगा!