प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि थाईलैंड में हो रही क्षेत्रीय विस्तृत आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) बैठक में भारत इस बात पर गौर करेगा कि क्या उसके हितों का पूरी तरह से ख्याल रखा जा रहा है. प्रधानमंत्री भारत-आसियान सम्मेलन तथा आरसीईपी सम्मेलन में भाग लेने के लिये तीन दिवसीय यात्रा पर रवाना हुए हैं. तीन नवम्बर को वे 16वें आसियान-भारत शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे. चार नवंबर को वे 14वें पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में शामिल होंगे और उसी दिन वे आरसीईपी समझौते पर बातचीत करने वाले देशों की तीसरी शिखर बैठक में भी भाग लेंगे.

आरसीईपी 16 देशों के बीच एक कारोबारी समझौता है. इसके तहत सदस्य देश आयात और निर्यात शुल्क कम करेंगे या इसे पूरी तरह से खत्म कर देंगे. अंतरराष्ट्रीय कारोबार के क्षेत्र में पिछले कुछ सालों में जिन साझेदारियों की सबसे ज़्यादा चर्चा हुई है उनमें आरसीईपी भी एक है. इसमें आसियान के 10 सदस्यों के साथ भारत, जापान, चीन, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड शामिल होंगे. एशिया-प्रशांत के इन 16 देशों के पास दुनिया की जीडीपी का एक तिहाई हिस्सा है. अगर अगर आरसीईपी समझौता अमल में आता है तो 3.4 अरब लोगों का एक साझा बाजार वजूद में आएगा.

हालांकि इससे पहले कई चुनौतियां हैं. जानकारों के मुताबिक इन 16 देशों के बीच कई बड़ी आर्थिक और सांस्कृतिक विषमताएं हैं. ऑस्ट्रेलिया की प्रति व्यक्ति न्यूनतम जीडीपी 55 हजार डॉलर से अधिक है तो कंबोडिया प्रति व्यक्ति 1,300 डॉलर के साथ इन देशों में आखिरी स्थान पर है. भारत के लिए तो आरसीईपी को बड़ी चुनौती माना जा रहा है. जानकारों का कहना है कि उसकी सबसे बड़ी चिंता इलेक्ट्रॉनिक डेटा शेयरिंग और लोकल डेटा स्टोरेज की मांग है. सुरक्षा कारणों के लिहाज से इसे साझा करना आसान नहीं है.

दूसरी तरफ यह भी कहा जा रहा है कि अगर भारत आरसीईपी में शामिल होता है तो घरेलू उत्पाद बुरी तरह से प्रभावित होंगे. स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट कहती है कि 2018-19 में प्रस्तावित आरसीईपी के 11 सदस्य देशों के साथ भारत का घाटे का व्यापार रहा. यानी यह समझौता अमल में आया तो भारतीय उत्पादकों के लिए हालात और खराब हो सकते हैं.