उम्मीद को लेकर एक बड़ी मुश्किल यह है कि उसकी ज़रूरत तो हर समय रहती है पर वह हर समय होती नहीं. हमारा समय तो तरह-तरह की नाउम्मीदियों से इस क़दर और इतना अधिक पटा है कि उन पर चढ़कर किसी तरह से उम्मीद हमारे पास आ जाये यह मुमकिन नहीं लगता. भले हमें पता है कि कई बार उम्मीद अंधेरे में एक दरार की तरह आती है- रोशनी की एक नाजुक कांपती लकीर जो शायद धीरे-धीरे अंधेरे पर छा सकती है और उसे छील-छीलकर बाहर फेंक सकती है. हो तो यह भी सकता है कि हमारे दरवाज़े पर अप्रत्याशित रूप से एक हल्की दस्तक हो और हम उस पर ध्यान न दें जबकि वह उम्मीद की पहली आहट हो. उसकी पहली लगभग अदृश्य-अश्रव्य पदचाप. हमारे पास यह मानने का कोई आधार नहीं होता कि भटकते हुए उम्मीद ने अपने लंबे-कठिन रास्ते में हमारा घर एक मुक़ाम की तरह पा लिया हो.

हम जिनसे रोज़-ब-रोज़ मिलते हैं और जो ज़्यादातर नाउम्मीदी की एक बड़ी बिरादरी का ही हिस्सा हैं उनमें से किसी को उम्मीद का कोई नया पता-ठिकाना, कोई जगह मिल जाये इसकी सम्भावना तो हमेशा बनी रहती है पर हम उसके होने की प्रतीक्षा नहीं करते. हमारे समय में प्रतीक्षा स्वयं उम्मीद का एक रूपक हो सकती है.

यह भी हो सकता है कि उम्मीद आये और हम अपनी नाउम्मीदी में इस तरह लिप्त हों कि उसे पहचान ही न पायें. वह ऐसा रूप धर कर आये कि हमें समझ में ही न आये कि वह उम्मीद है. सही तो यह है कि भले हमें उम्मीद की बड़ी शिद्दत से तलाश है, हम कई बार उसे पहचान नहीं पाते और कई बार नज़रंदाज करते हैं.

उम्मीद से हमारा रिश्ता कई तरह से बारीक और जटिल दोनों हैं. हम अकसर यह सोचते हैं कि वह कहीं और हैं, कहीं और से आयेगी, कोई और लायेगा जबकि सचाई यह है कि वह कहीं और नहीं है और उसे कोई और कहीं से हमारे पास नहीं लानेवाला. हमें स्वयं उम्मीद गढ़ना होता है. शायद सीधे नहीं कुछ ऐसा करके, सोचकर, सपना देखकर जो उम्मीद को हमारे अपने अस्तित्व में आकार दे. विडम्बना यह है कि हमने दूसरों से उम्मीद का भ्रम इतना अधिक पाल लिया है कि हम अपने से उम्मीद करना छोड़ चुके हैं. हम ही उम्मीद का घर हैं, हम ही उम्मीद का उजाड़.

उम्मीद तभी रूप लेती है जब उसमें हमारा अपना रक्त-मांस-मज्जा लगा होता है- वह हमारी आत्मा के अंधेरों-उजालों में बिंधी होती है, उसमें हमारा अन्तःकरण निस्संकोच और निर्भय बोलता है. एक ऐसे समय में जिसमें अन्तःकरण का आयतन संक्षिप्त ही नहीं हुआ है लगभग भांय-भांय करती एक बड़ी रिक्ति में बदल गया है, उम्मीद उसका असली भरा-पूरा आयतन है. क्या यह सम्भव है कि, बाद में, हमारे बारे में यह कहा जा सके कि जब नाउम्मीदी हमें सम्हलने तक नहीं दे रही थी हमने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा? हम वह दरार बने रहे जो रोशनी अंधेरे की दीवार में बनाती है.

असहमति बहिष्कार लांछन

लेखक-कलाकार का यह बुनियादी अधिकार है कि वह विचारों-कर्मों-प्रयत्नों से अपनी असहमति रखने और व्यक्त करने को स्वतंत्र हो. ऐसे समय होते हैं जब घोषित-अघोषित तानाशाही स्वतंत्रता-समता-न्याय के मूल्यों को कुचलते हैं तो उसका असहमति व्यक्त करना नैतिक कर्तव्य हो जाता है. आधुनिक समय में लेखक प्रायः सत्ता से, लोकतांत्रिक सत्ता से भी असहमत ही रहे हैं. हिन्दी में सत्ता विरोध एक साहित्यिक मूल्य के रूप में स्थापित है. अब तो स्थिति ऐसी है कि इन दिनों जो सत्ता-भक्त या सत्ताकामी हैं वे ज़्यादातर अविचारणीय या मीडियोकर क़िस्म के लेखक हैं. असहमति के कई प्रकार हो सकते हैं, सार्वजनिक वक्तव्य, रचना में विरोध, सामूहिक प्रदर्शन, बहिष्कार आदि.

मैं 2001 तक सरकारी सेवा मे रहा. इसी में रहते अनेक साहित्यिक-सांस्कृतिक प्रयत्न किये. पत्रिकाएं निकालीं, साहित्यिक आयोजन किये, पुस्तक-ख़रीद की योजना जारी की, छोटी पत्रिकाओं को मदद के लिए अनुदान और विज्ञापन की योजनाएं आदि बनायीं. सभी में सम्यक् दृष्टि रखी. अपने घोर वैचारिक विरोधियों और शत्रुओं तक को सादर सभी में यथायोग्य जगह दी. हमारे आयोजनों में 70-80-90 के दशकों में अनेक परस्पर विरोधी वैचारिक दृष्टियों के लोग सहर्ष आते रहे. एकाध लेखक संघ और संगठन ने भारत भवन के बहिष्कार के प्रस्ताव पारित किये पर उनके अधिक महत्वपूर्ण सदस्य-लेखकों पर उसका बहुत कम प्रभाव पड़ा.

2002 में गुजरात के नरसंहार के बाद एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय का कुलपति रहते हुए पहल की और लेखकों-कलाकारों को एकजुट किया जिसमें फिर कई वैचारिक दृष्टियों के लोग शामिल थे; राष्ट्रपति भवन तब मार्च किया; तबकी गुजरात सरकार को भंग करने की मांग की, महाश्वेता देवी और अन्य लेखकों के साथ बड़ौदा में प्रतिरोध सभा की. इस बीच उप्र. सरकार का भारत भारती पुरस्कार इस आधार पर अस्वीकार किया कि सत्तर से अधिक लेखकों को जूरी की सिफ़ारिशों के बावजूद पुरस्कार नहीं दिये जा रहे थे. मप्र. सरकार का कबीर सम्मान स्वीकार किया क्योंकि वह भाजपा सरकार का निर्णय नहीं उस पर बंधनकारी एक जूरी का सर्वसम्मत निर्णय था. 2013 में साहित्य अकादेमी द्वारा रज़ा फ़ाउंडेशन की पहल पर भारत सरकार द्वारा मंजूर विश्व कविता समारोह में फ़ाउंडेशन को संयुक्त आयोजक न बनाने के विरोध में अकादमी का और समारोह का बहिष्कार किया जो आज तक चल रहा है. इस बीच देश में बढ़ती असहिष्णुता के विरोध में साहित्य अकादमी पुरस्कार वापस करनेवाले पहले तीन लेखकों में मैं था. बाद में यह संख्या, कई भारतीय भाषाओं से, बढ़कर साठ से ऊपर हो गयी. कुछ मित्रों के साथ मिलकर हमने बढ़ती असहिष्णुता के विरुद्ध दो ‘प्रतिरोध’ भी आयोजित किये जिनमें कृष्णा सोबती, रोमिला थापर, गणेश देवी आदि के अलावा दाभोलकर और पानसरे परिवार के सदस्य भी शामिल हुए. इन सब मुद्दों पर लगातार लिखता भी रहा. किसी भी अकादमी, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र आदि के किसी कार्यक्रम में भाग नहीं लिया. रस्मी तौर पर न्यौतने के अलावा किसी ने बुलाया भी नहीं. जेएनयू में छात्रों-अध्यापकों द्वारा ‘स्वतंत्रता’ पर आयोजित व्याख्यानमाला में एक व्याख्यान भी दिया.

स्त्री लेखकों पर अपमानजनक और अभद्र टिप्पणियां करने के लिए ‘नया ज्ञानोदय’ में लिखना रवीन्द्र कालिया के संपादक रहते बंद किया और इसी कारण जयपुर समानान्तर साहित्य समारोह में भाग नहीं लिया. इस बीच प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संगठन आदि ने निमंत्रित किया तो उन के मंचों पर यथासम्भव जाता रहा और वाम कट्टरता और संकीर्णता की आलोचना भी करता रहा.

अपने से असहमत व्यक्ति को झटपट संघी कह देना वैसा ही है जैसे संघी हर अहसमत व्यक्ति को वामपंथी कहते हैं. मैंने और मेरी संस्थाओं ने अतिवादी धर्मान्ध, साम्प्रदायिकता बढ़ानेवाली शक्तियों से कभी कोई समझौता नहीं किया है. पर उनका समर्थन करनेवाले कुछ बुद्धिजीवियों को संवाद में शामिल किया है. वाम-विरोध आपको संघी नहीं बना देता. मध्य प्रदेश के कुछ वाम-विरोधी लेखकों ने हमेशा निस्संकोच स्वतंत्रता-समता-न्याय का पक्ष लिया है और उनमें से किसीने वहां भाजपा के लम्बे शासन में एक भी लाभ या सुविधा नहीं ली है, न कोई पुरस्कार ही. रिकार्ड के लिए यह बताना ज़रूरी लगता है कि मुझे जो तीन बड़े पुरस्कार मिले उनमें से एक कांग्रेस शासन में साहित्य अकादेमी द्वारा, एक भाजपा शासन में और एक मायावती शासन में मिले. ब़ाकी सभी निजी संस्थाओं द्वारा.

धीरे-धीरे

हमारे एक बड़े कवि कबीर ने सब कुछ धीरे धीरे होने की बात सदियों पहले की थी पर हम ऐसे समय में हैं और ऐसे लोग हैं जो असाधारण गतिशीलता के शिकार हैं. धीरे धीरे हम न कुछ करते हैं, न सोचते हैं कि कुछ ऐसे हो सकता है. हमारे समय की अधीरता शायद मनुष्य के समूचे इतिहास में हमें सबसे अधीर मनुष्य बनाती है. हमारा झटपटिया और लोकप्रिय लेखन इसका प्रमाण है कि हम कुछ को लेकर जल्दी में हैं. यह और बात है कि जो झटपट होता है वह अकसर टिकाऊ नहीं होता. यह शायद ऐसे लेखन की आकांक्षा भी नहीं होती है कि वह पाठकों के ध्यान में देर तक टिके. टिकना और टेक हमारे बीच से ग़ायब है.

ऐसा धीरे-धीरे ही हुआ है. समय को तेज़ करना हमारे प्रयत्न का एक ज़रूरी हिस्सा कई सदियों से होता रहा है. धीरे-धीरे की तकनालजी को हमने बहुत प्रयत्न से तेज़ तकनालजी में बदल लिया है और धीरेपन के चंगुल से हम तेज़ी से बाहर आ गये हैं. कई बार तो कुछ जगहों में तेज़ी भी धीमी लगने लगी है. हमें तेज़ से भी अधिक और तेज़ चाहिये. एक्सप्रेस और मेल अब बुलेट होने जा रहे हैं.

ज़ाहिर है इस तेज़ी से मनुष्य की लय बदल रही है. तेज़ी से विरत होकर कुछ धीमा पड़ना अब अस्वास्थ्य का प्रमाण होता है. वह अकसर बीमारी के वक़्त ही हो पाता है. कई बार लगता है कि नींद में आनेवाले सपने भी अब धीरे-धीरे नहीं आते-चलते. उनमें भी एक अबूझ और अधिकतर अनावश्यक गतिशीलता आ गयी है. सचाई और सपने में ऐसी एक रूपता पहले बिरली होती थी, अब आम है.

अधीरता के दबाव से साहित्य और कलाएं अछूते नहीं हैं. वहां भी कई बार लगता है कि थोड़ी अनावश्यक गतिशीलता बढ़ रही है. धीरे-धीरे लिखने-रखने वाले और धीरे-धीरे आस्वादन करनेवाले रसिक तेज़ी से घट रहे हैं. शायद काव्यशास्त्र बदल रहा है. शायद शास्त्र धीरे-धीरे अप्रासंगिक हो रहे हैं. झूठ तेज़ी से फैल रहे हैं, सच धीरे-धीरे चल रहा है. आखि़रकार वही जीतेगा ऐसी उम्मीद लगाना, इस मुक़ाम पर, कठिन है. धीरे-धीरे ही पता चलेगा कि सच का क्या हश्र हुआ. जिनके पास धीरज है वे प्रतीक्षा कर सकते हैं, जो तेज़ी में हैं उनके साथ झूठों का रेला है ही!