अयोध्या विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला शनिवार को यानी कल आ जाएगा. देश की मीडिया से लेकर तमाम सार्वजनिक मंचों पर इसकी चर्चा है. राजनेताओं से लेकर हिंदू-मुसलमानों के तमाम संगठन सद्भाव की अपीलें कर रहे हैं. अयोध्या विवाद ने देश के समाज और राजनीति को बहुत गहरे से प्रभावित किया और अब इस विवाद पर आने वाला फैसला क्या नए राजनीतिक-सामाजिक संदेश लेकर आएगा, इस पर सभी की नजर है. दशकों से टीवी, अखबार में छाया रहने वाला थोड़ा उनींदा, थोड़ा चैतन्य सा शहर अयोध्या भी इस वक्त कुछ तो सोच ही रहा होगा.

अयोध्या में घुसते ही इस बात का एहसास हो जाता है कि यहां पर सुरक्षा व्यवस्था के इंतजाम काफी चाक-चौबंद हैं. हर चौराहे और नुक्कड़ पर कोई न कोई पुलिसकर्मी दिख ही जाता है. ड्यूटी पर तैनात एक सब इंस्पेक्टर इतनी पुलिस की मौजूदगी के बारे में कहते हैं, ‘सुरक्षा व्यवस्था कड़ी होने की फिलहाल दो वजहें हैं. जिस दिन सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर मामले की सुनवाई पूरी हुई, उसके बाद से ही पुलिस की तैनाती और गश्त बढ़ा दी गई है और इलाके में धारा 144 लागू है.’

कुछ दिनों के बाद राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ जाएगा, इसको लेकर अयोध्या का माहौल कैसा है? घर से खरीदारी करने निकले विनोद अग्रवाल कहते हैं, ‘देखिए, अयोध्या का माहौल जैसा पहले था, वैसे ही रहेगा. राम मंदिर विवाद को लेकर पूरे देश में तनातनी भले मची रही हो, लेकिन यहां उसे लेकर कभी वैसा सांप्रदायिक तनाव नहीं रहा है.’ ऐसा कहने वाले विनोद कोई अकेले व्यक्ति नहीं हैं. अयोध्या में इतने लोग लगभग यही बात दोहराते हैं कि इसके बारे में पूछने पर हम मजबूर हो जाते हैं. ‘देखिए, 1991 से पहले अयोध्या के लोग मीडिया के आदी नहीं थे. लेकिन, ढांचा गिरने के बाद देशी-विदेशी मीडिया के लोग बड़े पैमाने पर यहां आने लगे. मीडिया का सारा जोर अयोध्या विवाद से संबंधित सवालों पर ही रहता है. इसलिए क्या अयोध्या के लोग, क्या यहां के साधु-महात्मा सब जान गए हैं कि किस सवाल के जवाब में क्या कहना है. मन में कौन क्या सोच रहा है, यह जान पाना बहुत मुश्किल है’ पेशे से वकील रामकुमार शुक्ल हंसते हुए कहते हैं.

अयोध्या विवाद पर कुछ अलग सी राय रखने वालों में यहां पर स्टेशनरी की दुकान चलाने वाले राम प्रकाश भी शामिल हैं. वे कहते हैं, ‘भगवान राम की जन्मभूमि अयोध्या में है और उनका मंदिर यहीं बनना चाहिए इससे किसको इन्कार है. लेकिन मीडिया को थोड़ा रूट डायवर्जन और जाम के बारे में भी लिखना चाहिए.’

रूट डायवर्जन और जाम अयोध्या में अलग तरह की परेशानी है. जब तब अयोध्या में सुरक्षा व्यवस्था के इंतजाम बदलते रहते हैं और सुरक्षा कड़ी होने पर पुलिस की टोका-टाकी भी बढ़ जाती है. यहां के साकेत डिग्री कॉलेज के छात्र पुनीत दुबे कहते हैं, ‘जाम तो हर शहर की परेशानी है, लेकिन अयोध्या में कौन सा रूट कब किस वजह से डायवर्ट कर दिया जाए कुछ मालूम नहीं रहता. इससे शहर के अंदर की गलियों में जाम लग जाता है और परेशानी भी होती है.’ वे आगे कहते हैं कि अयोध्या विवाद के बाद से यहां लोगों की आमद बढ़ी है, इससे दुकानदारों का धंधा जरूर बढ़ा है, लेकिन शहर में भीड़ और जाम भी बढ़ा है.

अयोध्या में कौन सा रूट कब डायवर्ट कर दिया जाए कुछ मालूम नहीं रहता | अनुराग शुक्ला

अयोध्या विवाद के बारे में जब हम अयोध्या में किराने की दुकान चलाने वाले शाहनवाज से बात करते हैं तो वे कहते हैं, ‘इस पर हम क्या बोलेंगे. मामला कोर्ट में है, जो फैसला आए वो सबको मानना चाहिए. बाकी इस बारे में ज्यादा पूछना है तो हाशिम अंसारी जी के घर चले जाइए.’

हाशिम अंसारी अयोध्या विवाद के सबसे पुराने पक्षकार थे. उनके निधन के बाद उनके बेटे इकबाल अंसारी इस मामले के मुद्दई बन गए हैं. उनके घर पहुंचने पर पता चलता है कि इकबाल घर पर नहीं हैं और शाम तक आएंगे. वहां तैनात सुरक्षाकर्मियों के लिए बैठने की जगह पर हाशिम अंसारी की एक बड़ी सी तस्वीर लगी है. इस जगह का फोटो खींचने पर वहां मौजूद पुलिसकर्मी कहते हैं कि हमारी फोटो मत लीजिएगा, एसएसपी साहब का आदेश है कि हम लोगों की फोटो मीडिया में नहीं आनी चाहिए.

हनुमानगढ़ी मंदिर के महंत गौरीशंकर दास कहते हैं कि अयोध्या विवाद को लेकर पूरे देश में जिस तरह का माहौल बनाया जाता है, उसमें अयोध्या के हिंदू-मुसलमानों की कोई गलती नहीं है, अगर किसी की गलती है तो वह है राजनीतिक दलों की. गौरीशंकर दास कहते हैं, ‘अयोध्या का मुसलमान इस बात को समझता है कि यह हिंदुओं के लिए बड़ा तीर्थ और धार्मिक पहचान की जगह है. यहां आने वाले श्रद्धालुओं और रहने वाले साधु-संतों की बड़ी संख्या उनके भी रोजगार और कारोबार के लिए मददगार है. इसलिए राम मंदिर के विवाद को लेकर यहां के मुसलमान बहुत प्रतिक्रियावादी नहीं है.’ अयोध्या में हिंदू-मुसलमान ताने-बाने पर वे कहते हैं, ‘इसे ऐसे समझ लीजिए कि कम से कम 100 मुसलमान तो हनुमानगढ़ी के ही किराएदार हैं. शहर के प्रमुख बाजार में बहुत सी दुकानें निर्वाणी अखाड़े की हैं. उनमें मुसलमान किराएदार कम नहीं हैं.’

साधु-संतों का एक अपना पक्ष है. इसमें प्रचलित धारणा से उलट इस विवाद पर न बोलना भी शामिल है. बड़ी छावनी के महंत बाबा जगदीश दास इस विवाद के बारे में सिर्फ इतना कहते हैं कि यह एक आध्यात्मिक जगह है और बड़ी छावनी का मुखिया आजीवन कभी भी छावनी परिसर के बाहर नहीं जाता, ऐसे में वह इस विवाद के बारे में कैसे कुछ कह सकते हैं. लेकिन, इसी छावनी से जुड़े वृंदावन के एक संत बड़ी परिमार्जित भाषा में कहते हैं कि उनका अंतर्मन कह रहा है कि फैसला राम मंदिर के पक्ष में आएगा और अयोध्या में कोई अशांति नहीं होगी.

अयोध्या के आम हिंदू-मुसलमान राम मंदिर के मुद्दे पर बात करने में आक्रामकता के बजाय सहजता ही दिखाते हैं. लेकिन, हिंदुओं से बात करने पर ऐसा महसूस होता है कि वे इस बात के प्रति आश्वस्त हैं कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला राम मंदिर निर्माण के पक्ष में ही आएगा और मुसलमान पक्ष के लिए कोई बीच का रास्ता निकाला जाएगा. जबकि शाहनवाज दैसे आम मुस्लिमों के जवाब का केंद्रीय भाव यह होता है कि मामला सुप्रीम कोर्ट में है और कोर्ट जो फैसला दे उसे सभी को मानना चाहिए.

सरकारी नौकरी से रिटायर्ड एक मुसलमान सज्जन इस बात को थोड़ा ज्यादा स्पष्ट करते हैं, लेकिन इस शर्त पर कि उनका नाम न छापा जाए. ‘पिछले तीस बरस के विवाद के दौरान राजनीति ने इसे हिंदू-मुसलमान की पहचान का विवाद बना दिया है. मैं पूरे देश की नहीं कह सकता, लेकिन अयोध्या का मुसलमान इस झगड़े से मुक्ति चाहता है’ वे कहते हैं, ‘आम मुसलमान जब ये कहता है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला सभी को मानना चाहिए तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह ये उम्मीद कर रहा है कि फिर से मस्जिद बनाने का हुक्म दे दिया जाए. लेकिन, वह यह जरूर चाहता है कि बाबरी मस्जिद को गिराकर जिस ढंग से मुसलमानों का भरोसा तोड़ा गया उसे बहाल किया जाये.’

भरोसा बहाली से क्या मतलब है और सुप्रीम कोर्ट के फैसले में इसकी क्या सूरत हो सकती है? इस सवाल पर वे कहते हैं, ‘सियासत, सरकार और अदालत को यही तो तय करना है. यही उनका इम्तिहान है. अदालत का जो भी फैसला आता है, उस पर सरकार कैसे अमल करती है. हिंदू-मुसलमानों की राजनीति करने वाले क्या रूख अपनाते हैं. अगर ये सारे लोग झगड़े को सुलझाना चाहेंगे तो सुलझा लेंगे और उलझाना चाहेंगे तो और उलझाएंगे.’

राम मंदिर के निर्माण के लिए बनी कार्यशाला | अनुराग शुक्ला

अयोध्या विवाद में एक अन्य मुस्लिम पक्षकार हाजी महबूब भी कुछ इसी तरह की बात करते हैं. ‘सुप्रीम कोर्ट का जो भी फैसला आए उसे हर पक्ष को मानना चाहिए और सभी की कोशिश होनी चाहिए कि भाईचारा बने रहे. मैं सुनवाई पूरी होने के बाद ही कह चुका हूं कि अगर फैसला मुसलमानों के पक्ष में आए तो भी वहां दोबारा मस्जिद तामीर नहीं करनी चाहिए. बल्कि, उस जगह को घेरकर छोड़ देना चाहिए. मस्जिद दोबारा बनाने की बात करने पर अमन बिगड़ेगा.’

क्या बाकी के मुस्लिम पक्षकार इस बात को मान जाएंगे, इस पर हाजी महबूब कहते हैं कि मैं उम्मीद करता हूं कि इस पर सभी एकराय हो जाएंगे. वे बताते हैं कि उन्होंने कई बार यह प्रस्ताव लिखित में मध्यस्थता समिति के सामने भी रखा, लेकिन हिंदू पक्षकारों के इस बात को लेकर अलग-अलग रूख थे. इशारों में वे कहते हैं कि हिंदू पक्ष के कुछ लोगों का झुकाव सियासी था और बातचीत के जरिये मसला सुलझाने में वे ज्यादा दिलचस्पी नहीं ले रहे थे. फैसले के बाद अयोध्या के सामाजिक ताने-बाने पर कुछ असर तो नहीं होगा? इस पर हाजी महबूब कहते हैं, ‘अयोध्या के भाईचारे का अंदाजा इस बात से लगा लीजिए कि इस समय मेरे साथ जो भी लोग बैठे हैं, सभी हिंदू हैं.’

शाम को जब हम राम मंदिर निर्माण के लिए बनी कार्यशाला में पहुंचते हैं तो पूरे परिसर में न्यूज चैनल की एक टीम के अलावा सिर्फ दो-तीन लोग ही नजर आते हैं. कई जगह दान पात्र रखे हुए हैं. लाउडस्पीकर पर आती ‘सीताराम-सीताराम’ की आवाज ही यहां का सन्नाटा तोड़ रही है. न्यूज चैनल की टीम वहां रखे पत्थरों का विजुअल ले चुकी है. और उसे यहां किसी बाइट की तलाश है. एक पुलिसकर्मी सलाह देता है कि अगर यहां आने वाले लोगों से बात करनी है तो दिन में थोड़ा पहले आना चाहिए. पुलिसकर्मी बताता है कि यहां शिला देखने के लिए जो भी लोग आते हैं वे अक्सर बाहर के राज्यों या दूर-दराज के जिलों के होते हैं, लोकल लोग तो आते नहीं है. पत्थर काटने वाली मशीनें चल रही हैं या नहीं? इस सवाल के जवाब में पता चलता है कि मशीनें तो काफी दिनों से बंद पड़ी हैं, पत्थर भी कई सालों से उतना ही है. इन दान पात्रों में जो चंदा एकत्र होता है, उसका हिसाब-किताब कौन रखता है? यह सवाल करते ही एक दरोगा जी इशारा करते हैं और बात कर रहा कांस्टेबल कुछ बोलने के बजाय वहां से चला जाता है.

अयोध्या विवाद के इतर भी एक अयोध्या है जो अपनी रफ्तार से चल रही है. दूर-दराज से आए श्रद्धालु कहीं माला-कंठी खरीद रहे हैं. धार्मिक पुस्तकों की दुकानों पर लोग रामचरितमानस खरीद रहे हैं. रामचरितमानस किसी भी शहर में आसानी से उपलब्ध है तो लोग इसे अयोध्या से क्यों ले जाते हैं? इस पर एक दुकानदार कहते हैं कि राम के शहर से मानस ले जाने की महिमा अलग है, अयोध्या आने वाले शख्स से आसपास के लोग रामचरितमानस मंगाते हैं.

इसी बाजार में ढांचा ढहाने वाली सीडी भी और तस्वीरें भी बिक रही हैं. और इन सबसे बेखबर एकतारे पर भजन गा रहे जोगी और श्यामा पक्षी के जरिये शगुन विचारने वालों की कतारें भी हैं. अयोध्या विवाद के बारे में पूछने पर वहां खड़े एक सज्जन अवधी में कहते हैं, ‘ई तो श्यामा पक्षी ही बताय पाई कि ई झगड़ा कब खत्म होई.’ इसके बाद वहां लगने वाले ठहाके और लोगों के चेहरों की मुस्कराहटें बताती हैं कि आस्था-श्रद्धा के साथ रोजमर्रा की जिंदगी में व्यंग्य और उल्लास का सहअस्तित्व है.

बहती सरयू को बड़ी शांति से एकटक ताक रहे एक श्वेत वस्त्रधारी साधु से इस मसले पर पूछा जाता है तो वे मुस्करा देते हैं. फिर प्रसंग के साथ रामचरित मानस की दो चौपाइयां सुनाते हैं. प्रसंग यह है कि जब लंकाकांड में रावण युद्ध के लिए विशाल सेना और सुसज्जित रथ के साथ आता है तो विभीषण परेशान हो जाते हैं और राम से कहते हैं कि बिना रथ के नंगे पैर आप रावण का मुकाबला कैसे करेंगे. इस पर राम कहते हैं:

सौरज, धीरज जेहि रथ चाका ।

सत्य शील दृढ़ ध्वज पताका ।।

ईश भजन सारथी सुजाना।

विरति कर्म संतोष कृपाणा।।

(शौर्य और धैर्य मेरे रथ के पहिए हैं, सत्य और शील उस पर लहारने वाली पताका है. ईश्वर का भजन मेरा सारथी है और संसार के विषयों से विरक्ति और संतोष मेरी तलवार है. जिसके पास ऐसा रथ है, उसे संसार के किसी रथ की क्या चिंता.)

चौपाइयों की व्याख्या करके वे कहते हैं कि ये राम के आदर्श हैं. सियासत और समाज राम के इन आदर्शों को समझ जाए यही अयोध्या और पूरे देश के लिए सबसे बड़ा फैसला होगा.