सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण पर काबू पाने में विफल रहने के लिये संबंधित प्राधिकारियों को फटकार लगाई है. शीर्ष अदालत के मुताबिक राज्य सरकारें एक-दूसरे पर ठीकरा फोड़ने में व्यस्त हैं और लोगों को मरने के लिये छोड़ दिया गया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 1975 की इमरजेंसी भी इस इमरजेंसी से बेहतर थी. दिल्ली में हवा की गुणवत्ता गंभीर श्रेणी में बनी हुई है और इसके चलते यहां जन स्वास्थ्य आपातकाल घोषित कर दिया है.

न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पराली जलाये जाने की घटनाओं को भी गंभीरता से लिया. उसने कहा कि हर साल निरंकुश तरीके से ऐसा नहीं हो सकता. पीटीआई के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया, ‘क्या इस वातावरण में हम जीवित रह सकते हैं? यह तरीका नहीं है जिसमें हम जीवित रह सकते हैं.’ शीर्ष अदालत ने कहा, ‘दिल्ली का हर साल दम घुट रहा है और हम इस मामले में कुछ भी नहीं कर पा रहे है.। सवाल यह है कि हर साल ऐसा हो रहा है. किसी भी सभ्य समाज में ऐसा नहीं हो सकता.’ पीठ ने दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण को भयानक बताया और कहा कि अपने घरों के भीतर भी कोई सुरक्षित नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सरकारों की जिम्मेदारी तय करने की बात भी कही. उसका कहना था कि राज्य सरकारें लोगों को सलाह दे रही हैं कि प्रदूषण की गंभीर स्थिति को देखते हुये वे दिल्ली नहीं आयें. अदालत ने कहा कि इस स्थिति को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.