भारत ने क्षेत्रीय विस्तृत आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) नाम के चर्चित व्यापार समझौते में शामिल होने से फिलहाल इनकार कर दिया है. बैंकॉक में इस पर बातचीत के लिए जुटे 16 देशों के शीर्ष नेताओं की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो-टूक कहा कि समझौते का जो प्रारूप है उसमें भारत के हितों का पूरी तरह से ख्याल नहीं रखा गया है. प्रधानमंत्री ने कहा, ‘न तो गांधी के सिद्धांत और न ही मेरी अंतररात्मा इसमें शामिल होने की इजाजत दे रही है.’

वैसे थाईलैंड रवाना होने से पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कह दिया था कि आरसीईपी के लिए राजी होने से पहले भारत इस बात पर गौर करेगा कि क्या उसके हितों का पूरी तरह से ख्याल रखा जा रहा है. इस समझौते के लिए हुई बैठक के दौरान उन्होंने उन देशों को भी नसीहत दी कि जो भारत पर इस समझौते के लिए दबाव बनाने की कोशिश में हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि अब वे दिन नहीं हैं जब बड़ी शक्तियां भारत पर वैश्विक सौदेबाजी का दबाव बनाने में सफल हो जाती थीं.

उधर, आरसीईपी के शीर्ष नेताओं की तरफ से जारी बयान में कहा गया है कि भारत की तरफ से कुछ अहम मुद्दे हैं जिनका समाधान नहीं निकल पाया है. उनके मुताबिक इन मुद्दों को सुलझाने के लिए बात की जाएगी ताकि सभी पक्षों की सहमति के मुताबिक आगे का रास्ता निकल सके.

आरसीईपी क्या है?

आरसीईपी 16 देशों के बीच एक कारोबारी समझौता है. इसके तहत सदस्य देश आयात और निर्यात शुल्क कम करेंगे या इसे पूरी तरह से खत्म कर देंगे. अंतरराष्ट्रीय कारोबार के क्षेत्र में पिछले कुछ सालों में जिन साझेदारियों की सबसे ज़्यादा चर्चा हुई है उनमें आरसीईपी भी एक है. इसमें आसियान के 10 सदस्यों के साथ भारत, जापान, चीन, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड शामिल होंगे. एशिया-प्रशांत के इन 16 देशों के पास दुनिया की जीडीपी का एक तिहाई हिस्सा है. अगर आरसीईपी समझौता अमल में आता है तो 3.4 अरब लोगों का एक साझा बाजार वजूद में आएगा.

चुनौतियां

हालांकि इससे पहले कई चुनौतियां हैं. जानकारों के मुताबिक इन 16 देशों के बीच कई बड़ी आर्थिक और सांस्कृतिक विषमताएं हैं. ऑस्ट्रेलिया की प्रति व्यक्ति न्यूनतम जीडीपी 55 हजार डॉलर से अधिक है तो कंबोडिया प्रति व्यक्ति 1,300 डॉलर के साथ इन देशों में आखिरी स्थान पर है. भारत के लिए तो आरसीईपी को बड़ी चुनौती माना जा रहा है. जानकारों का कहना है कि उसकी सबसे बड़ी चिंता इलेक्ट्रॉनिक डेटा शेयरिंग और लोकल डेटा स्टोरेज की मांग है. सुरक्षा कारणों के लिहाज से इसे साझा करना आसान नहीं है.

दूसरी तरफ यह भी कहा जा रहा है कि अगर भारत आरसीईपी में शामिल होता है तो घरेलू उत्पाद बुरी तरह से प्रभावित होंगे. स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट कहती है कि 2018-19 में प्रस्तावित आरसीईपी के 11 सदस्य देशों के साथ भारत का घाटे का व्यापार रहा. यानी यह समझौता अमल में आया तो भारतीय उत्पादकों के लिए हालात और खराब हो सकते हैं. यही वजह है कि आरसीईपी पर भारत सरकार द्वारा लिए गए फैसले की उद्योग जगत और किसान संगठनों ने तारीफ की है. दुग्ध उत्पाद कंपनी अमूल ने सरकार के इस निर्णय को मील का पत्थर बताया है.