पिछले कुछ दिनों से दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण के चलते हालात खराब हैं. ये कितने खराब हैं इसका अंदाजा एक्यूआई यानी एयर क्वालिटी इंडेक्स से चलता है. अगर आप इसे गूगल पर सर्च करेंगे तो इसके तुरंत बाद से आपके कम्प्यूटर या मोबाइल की स्क्रीन पर एयर प्यूरीफायर और ब्रीदिंग मास्क के विज्ञापन दिखाई पड़ना तय है. दिल्ली में रहने वालों को इनके अलावा इंडोर प्लांट्स की सलाह भी आजकल कहीं न कहीं से मिलती ही रहती है. यह और बात है कि सलाह तो मुफ्त में आती है और पौधे पैसे खर्च करने पर. सीधे शब्दों में कहें तो ये बातें प्रदूषण से जुड़े एक नये बाज़ार के शुरू होने की तरफ इशारा करती हैं. लेकिन एक तरफ जहां प्रदूषण के चलते कुछ नए चलन शुरू होने की गुंजायश बनी है, वहीं कई परंपरागत चीजें जो पहले अच्छी या सेहतमंद समझी जाती थीं, अब उलटे मायने पाती दिख रही हैं.

सुबह का टहलना - कुछ साल पहले तक जहां अच्छे स्वास्थ्य की चाह रखने वालों को सुबह-सुबह उठकर टहलने की सलाह दी जाती थी, वहीं अब सर्दियों की शुरूआत होते ही सुबह की चहलकदमी से बचने को कहा जाता है. इतना ही नहीं, सांस के रोगियों या अलर्जिक राइनाइटिस के शिकार लोगों को तो दिल्ली में लगभग हर मौसम में सुबह बाहर ना निकलने की सलाह दी जाती है. इसके पीछे कारण बताया जाता है कि सुबह के समय हवा में धूल या पोलन (पौधों के परागकण) ज्यादा मात्रा में होते हैं, जो सांस के साथ अंदर जाकर सर्दी-जुकाम और बाकी मुश्किलें पैदा करते हैं. पिछले दिनों दिल्ली में हालात बिगड़ने पर डॉक्टरों ने सुबह के साथ-साथ शाम का टहलना भी बंद करने की सलाह दी थी.

साइकिलिंग और एक्सरसाइज – स्वाभाविक है कि व्यायाम ना करने की सलाह कोई नहीं देगा लेकिन प्रदूषण के चलते अब यह भी कमरों के भीतर सिमट चुका है. इसके अलावा अगर दिल्ली-मुंबई सरीखे बड़े शहर में रहने वाला कोई व्यक्ति इसलिए साइकिल से ऑफिस जाने की सोचे कि इससे शरीर और जेब, दोनों सेहतमंद होंगे तो प्रदूषण ने इसे भी असंभव बना दिया है. स्मॉग ही नहीं सामान्य परिस्थितियों में शहरों की हवा इतनी प्रदूषित होती है कि अगर हमें इसकी सही-सही जानकारी हो तो सांस लेने में भी डर लगें. ट्रैफिक और ग्रीन हाउस गैसें बढ़ने के चलते यहां की हवा में सल्फर-नाइट्रोजन सहित कई तरह के जहरीले ऑक्साइड भी मिले होते हैं. साइकिलिंग या एक्सरसाइज करते हुए हमें ज्यादा ऑक्सीजन की जरूरत होती है और खुले में ऐसा करने पर जहरीली हवा की ज्यादा मात्रा फेफड़ों तक पहुंच सकती है जो स्वास्थ्य के लिए खासी नुकसानदेह साबित हो सकती है.

बच्चों का बाहर खेलना – अक्सर ही इस बात की शिकायत की जाती है कि बच्चे टीवी-वीडियो गेम या मोबाइल में घुसे रहते हैं. मां-बाप आमतौर पर उन्हें इनसे बाहर निकालकर खेल के मैदान पर ले जाने की कोशिशो में लगे रहते हैं. लेकिन प्रदूषण सबसे ज्यादा बच्चों को ही प्रभावित करता है, इसलिए इसके बढ़ने पर उन्हें अधिक से अधिक घर के भीतर रखने की सलाह दी जाती है. हाल ही में गाज़ियाबाद के मुख्य चिकित्सा अधिकारी द्वारा जारी की गई स्मॉग एडवाइजरी में स्कूलों को भी यह निर्देश दिया गया था कि वे बच्चों से कोई आउटडोर एक्टिविटी ना करवाएं.

एयर कंडीशनर का कम इस्तेमाल – एयर कंडीशनर का कम इस्तेमाल एक अच्छी आदत माना जाता है. साथ ही, आमतौर पर स्मॉग वाला सीजन आने तक एयर कंडीशनर की ज़रूरत ही खत्म हो जाती है. लेकिन बढ़े हुए प्रदूषण के इस दौर में अगर कोई इसका इस्तेमाल करता है तो यह फायदेमंद भी साबित हो सकता है. असल में एयर कंडीशनर का फिल्टर धुआं, धूल और पोलन के बड़े कणों को भीतर आने से रोक लेता है जिससे हमें अपेक्षाकृत साफ हवा मिलती है. ऐसे में अगर अपने घर में बंद कोई व्यक्ति टेम्प्रेचर मेंटेन करने या साफ-सुथरी हवा के लिए एसी का इस्तेमाल करे तो उसे गलत कैसे कहा जा सकता है.

गुलाबी सर्दी यानी घूमने का मौसम - उत्तर भारत में घूमने के लिहाज अक्टूबर-नवंबर या फरवरी-मार्च का मौसम का आदर्श कहा जा सकता है क्योंकि इन दिनों में यहां न ज्यादा सर्दी होती है न ज्यादा गर्मी. अगर सिर्फ दिल्ली की बात करें तो अक्टूबर-नवंबर ही वे महीने होते हैं जब यहां पर प्रदूषण अपने चरम पर होता है. ऐसे में सैलानी तो यहां आने से बचते ही हैं, खुद दिल्ली वाले भी दूसरे शहरों की तरफ रुख करने लगते हैं. इसके अलावा, कंस्ट्रक्शन के लिहाज से भी यह मौसम सबसे सही समझा जाता है क्योंकि इन दिनों ज्यादा सर्दी-गर्मी या बरसात न होने के चलते मजदूर आसानी से और ज्यादा काम कर सकते हैं. लेकिन इन दिनों में दिल्ली-एनसीआर में सरकारें प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए किसी भी तरह के निर्माण पर रोक लगा देती हैं जिससे मजदूरों की आय भी प्रभावित होती है.

खाने का तड़का या बघार – एक समय था जब घर का तड़के की खुशबू से भर जाना स्वादिष्ट खाना पकने की पहचान माना जाता था. लेकिन अब इससे बचने की कोशिश की जाने लगी है. पहले से बढ़े हुए प्रदूषण में अगर तड़के-बघार वाली हवा किसी तक पहुंचती है तो वह भी एलर्जी या छींकने-खांसने की वजह बन सकती है. इसलिए चिमनी या एग्ज़ॉस्ट फैन के जरिए इसे घर में फैलने से रोकने के पर्याप्त इंतजाम किए जाने लगे हैं. इस तरह से एक और चीज जो कुछ समय पहले तक हमारी गुडबुक्स में हुआ करती थी, अब बीमारी बढ़ाने की वजह मानी जाने लगी है.