निर्देशक: अमर कौशिक
लेखक: निरेन भट्ट
कलाकार: आयुष्मान खुराना, भूमि पेडनेकर, यामी गौतम, सुप्रिया पाठक, सौरभ शुक्ला, अभिषेक बनर्जी
रेटिंग: 2.5/5

‘बाला’ के दो दृश्यों जिक्र सबसे पहले किया जाना चाहिए. पहला दृश्य वह है, जिसमें सुप्रिया पाठक का किरदार बड़े अफसोस के साथ कहता है कि उसे उसके पति ने सिर्फ इसलिए छोड़ दिया क्योंकि उसके चेहरे पर मूंछनुमा बाल थे. इसके उलट दूसरे दृश्य में सौरभ शुक्ला का किरदार अपनी पत्नी का शुक्रिया अदा करते हुए कहता है कि वह खुशकिस्मत था कि गंजे होने के बाद भी पत्नी ने उसे नहीं छोड़ा. ये दृश्य महिलाओं और पुरुषों की बाहरी सुंदरता को लेकर हमारे समाज के रवैये को सबसे सटीक तरीके से समझा देते हैं. साथ ही, हमारे सामाजिक ताने-बाने की वे गांठें भी दिखा देते हैं जो महिलाओं के हिस्से में ज्यादा आई हैं.

फिल्म की कहानी पर आएं तो ‘बाला’ कानपुर के रहने वाले बालमुकुंद शुक्ला यानी बाला का किस्सा दिखाती है. बाला के जीवन की सबसे बड़ी समस्या उसके झड़ते बाल हैं. आयरनी यह है कि खुद के गंजेपन को जमाने भर की झिझक और शर्मिंदगी के साथ ढोने वाला बाला लड़कियों को फेयरनेस क्रीम यह कहते हुए बेचता है कि गोरा होना ही सुंदर होना है. फिल्म बाला की इस नासमझी के बहाने बहुत सफाई से इस बात पर चुटकी लेती है कि कैसे हम अपने और दूसरों के लिए अलग-अलग पैमाने बनाकर रखते हैं. यहां से आगे बढ़कर, बाला बगैर बालों के भी खुद को किसी काबिल समझे जाने के मुकाम तक कैसे पहुंचता है, फिल्म यही दिखाती है.

इस बात के लिए ‘बाला’ की तारीफ की जानी चाहिए कि यह तमाम तरह के क्लीशे से भरसक दूरी बनाकर रखती है. लेकिन बुरा यह है कि गैर-परंपरागत दिखने-दिखाने के चक्कर में कई मौकों पर यह आधी-अधूरी बातों से ही काम चलाती दिखती है. उदाहरण के लिए बाला के अपने पिता पर चिल्लाने वाला दृश्य भावुक तो करता है लेकिन इसके संवाद और प्लेसिंग, दोनों ही अटपटे लगते हैं. ज्यादातर दृश्यों की लिखाई का कच्चा रह जाना ही फिल्म की वह खामी है जो इसे औसत सिनेमा से उठकर बेहतरीन वाली श्रेणी में नहीं जाने देती.

अभिनय पर आएं तो आयुष्मान खुराना हमेशा की तरह सीटियां बजाने को मजबूर करने वाला अभिनय करते हैं. आयुष्मान का मेकअप इसमें उनका भरपूर साथ देता है और उन्हें देखकर इस बात की कल्पना कर पाना नामुमकिन लगता है कि असल में उनके सिर पर भरपूर बाल हैं. उनकी संवाद अदायगी खासकर उनका कनपुरिया उच्चारण, बाला के किरदार को सच्चा बनाने वाली खूबियां देता है. अभिनय के मामले में भूमि पेडनेकर भी चौबीस कैरेट खरा सोना ही बिखेरती हैं लेकिन उनकी पिछली फिल्म ‘सांड की आंख’ की ही तरह, यहां भी एक बार फिर मेकअप ही उस पर पानी फेरता दिखता है. ‘बाला’ में उन्हें काला दिखाने के लिए जिस तरह का लुक दिया गया है, वह पूरे वक्त आंखों को खटकता रहता है.

फिल्म में तीसरी मुख्य भूमिका निभा रहीं यामी गौतम भी बढ़िया अभिनय करती हैं. उनकी पिछली फिल्मों से तुलना करें तो लगता है कि अपने उच्चारण पर उन्होंने खासा मेहनत की है. इस बार वे सफाई से हिंदी बोलती हैं और कानपुर का लहज़ा भी ठीक-ठाक पकड़ती हैं. शायद इसकी वजह यह भी हो सकती है कि वे पहले भी कानपुर के पड़ोस यानी लखनऊ की एक लड़की की भूमिका निभा चुकी हैं. ऐसा उन्होंने अपने करियर के शुरुआती दौर में ‘ये प्यार ना होगा कम’ नाम के टेलिविजन धारावाहिक में किया था. लेकिन अच्छे अभिनय के बावजूद यामी के किरदार परी को इतना बेवकूफ और बाहरी सुंदरता को इतना ज्यादा तरजीह देने वाला दिखाया गया है कि उससे उकताहट होने लगती है.

फिल्म के बाकी किरदारों की बात करें तो सौरभ शुक्ला, सुप्रिया पाठक, अभिषेक बनर्जी भी इसमें खूब तालियां बटोरते हैं. इसके अलावा, आयुष्मान खुराना के भाई की भूमिका में धीरेंद्र कुमार गौतम खासा प्रभावित करते हैं, उनके हिस्से में आया एक मोनोलॉग भविष्य में छोटे भाइयों की जुबान पर चढ़ने की कुव्वत रखता है.

फिल्म के बाकी पक्षों की बात करें तो इसका संगीत इतना औसत है कि गाने कब आकर चले जाते हैं, पता ही नहीं चलता. संवादों की बात करें तो वे इतने मज़ेदार हैं कि हंसाते भी हैं और याद भी रहते हैं. इनमें कनपुरिया स्लैंग जैसे - लल्लनटॉप, लभेड़ जैसे शब्दों की भरमार है जो फिल्म को सही फ्लेवर देने के काम आते हैं. और हां फिल्म में प्रोडक्शन डिपार्टमेंट और कैमरे का कमाल ऐसा है कि इसकी हर लोकेशन नायक की आर्थिक-सामाजिक स्थिति से मेल खाती हुई दिखाई देती है. दूसरे शब्दों में कहें तो कानपुर और लखनऊ जैसे शहरों का माहौल परदे पर पूरे असर के साथ नज़र आता है.

बीते साल हॉरर कॉमेडी ‘स्त्री’ लेकर आने वाले अमर कौशिक ने बाला का निर्देशन किया है. उन्होंने बाला में नाइन्टीज के नॉस्टैल्जिया से लेकर छोटे शहरों में टिकटॉक की पॉपुलैरिटी तक को काफी चतुराई से इस्तेमाल किया है जिससे ऑडियंस आसानी से इससे कनेक्ट भी होती है. लेकिन उनकी यह फिल्म आपको टुकड़ों में ही प्रभावित करती है. यहां तक कि कुछ दृश्यों की भावुकता और सार्थकता पर तो खड़े होकर तालियां बजाने का मन भी करता है लेकिन पूरी फिल्म के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता है.

फन-फैक्ट: खुद को मर्दों की गृहशोभा कहने वाले आयुष्मान खुराना की अब तक कुल तेरह फिल्में रिलीज हो चुकी हैं जिनमें से ‘बाला’ उनकी छठी ऐसी फिल्म है जिसमें वे आम आदमी की किसी परेशानी पर बात करते नज़र आ रहे हैं