अयोध्या विवाद मध्यकाल के इतिहास से जुड़ा ऐसा मसला है जिसने आधुनिक भारत में भी सियासत से लेकर सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित करने का काम किया है. 1992 में विवादित ढांचा ढहाए जाने से कुछ समय पहले से अयोध्या देश-दुनिया में जाना जाने लगा और राम मंदिर आंदोलन से जुड़े राजनेताओं और साधु-संतों के साथ बाबरी मस्जिद के पक्षकारों के नाम और काम सुर्खियों का हिस्सा बनते रहे.

इस मामले में राजीव गांधी की चर्चा इसलिए होती है कि उन्हीं के प्रधानमंत्री रहते विवादित स्थल का ताला खोला गया और इसके बाद राम मंदिर आंदोलन ने एक नए चरण में प्रवेश किया. लाल कृष्ण आडवाणी ने पूरे देश में रथ यात्रा निकालकर अयोध्या विवाद को जनभावना के ऐसे बिंदु से जोड़ दिया कि इसका असर चुनावी राजनीति में भी नजर आने लगा. मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्री रहते अयोध्या पहुंचे कारसेवकों पर फायरिंग हुई तो कल्याण सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में विवादित ढांचा गिराया गया. उस समय प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव थे, जिन पर विवादित ढांचा ढहाए जाने को लेकर ढुलमुल रवैये के आरोप लगे.

इन सभी लोगों की चर्चा इस विवाद में होती रहती है. लेकिन, अगर मध्यकाल से लेकर आज तक इस विवाद पर नजर दौड़ाई जाए तो इसमें कुछ ऐसे भी किरदार हैं जो महत्वपूर्ण होने के बावजूद कम चर्चित हैं. विवाद की वृहद पृष्ठभूमि में इनके नाम नेपथ्य में रह जाते हैं.

मीर बाकी

अयोध्या की जिस मस्जिद को लेकर लंबे समय से चला आ रहा विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, उसे आम तौर पर बाबरी मस्जिद के नाम से जाना जाता है. लेकिन, इस मस्जिद का निर्माण मीर बाकी ने कराया था और इसका नामकरण बाबर के नाम पर किया गया था. मीर बाकी का वास्तविक नाम बाकी ताशकंदी था. नाम से ही साफ है कि उसका ताल्लुक ताशकंद से था. वह शिया मुसलमान था. बाकी ताशकंदी मुगल शासक बाबर का सेनापति था और कहा जाता है कि उसकी सैन्य क्षमताओं के कारण बाबर ने उसे ‘मीर’ की उपाधि से नवाजा था. इसके बाद उसे मीर बाकी कहा जाने लगा था. इब्राहिम लोदी को हराने के बाद बाबर ने जब अपना साम्राज्य विस्तार करना शुरु किया तो उसने मीर बाकी को अवध प्रांत का सूबेदार बना दिया. माना जाता है कि मीर बाकी ने 1528 से 1529 के बीच बाबरी मस्जिद का निर्माण कराया.

हालांकि, बहुत सारे इतिहासकार इस तथ्य पर सहमत नहीं हैं कि मीर बाकी ने बाबरी मस्जिद बनवाने के लिए कोई मंदिर तोड़ा. ऐसा मानने वाले तर्क देते हैं कि मध्यकाल के महान राम भक्त कवि तुलसीदास की किसी रचना में ऐसा संकेत नहीं मिलता कि राम मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई. हालांकि, हिंदू पक्ष यह दावा करता है कि तुलसीदास की ‘दोहाशतक’ नाम की कृति में इस घटना का जिक्र है और उसमें मीर बाकी के नाम का भी उल्लेख किया गया है. लेकिन, इतिहासकार और साहित्यकार ‘दोहाशतक’ को तुलसीदास की प्रामाणिक रचना नहीं मानते.

बाबर की जीवनी बाबरनामा में भी बाबरी मस्जिद से संबंधित प्रकरण नहीं है. बाबरी मस्जिद का निर्माण 1528 से 1529 के बीच हुआ. चूंकि बाबर ने खुद लिखा है कि 1529 में आए एक तूफान के कारण बाबरनामा पांडुलिपि के बहुत से पन्ने नष्ट हो गए तो ऐसे में संभव है कि उसका जिक्र बाबरनामा में होने से रह गया हो. हालांकि, बहुत सारे इतिहासकारों का यह भी मानना है कि अंग्रेजों के समय के गजट और उससे पहले के दस्तावेजों से यह तो लगता है कि बाबरी मस्जिद के निर्माण के कुछ दिनों के बाद ही इसको लेकर विवाद शुरु हो गए थे औऱ हिंदू जनमानस में यह धारणा थी कि इसे मंदिर को तोड़कर बनाया गया है. तो कुल मिलाकर मध्यकाल के एक सूबेदार मीर बाकी के एक निर्माण के चलते आधुनिक भारत का सबसे बड़ा विवाद खड़ा हुआ. मीर बाकी की मौत फैजाबाद के ही सहनवा गांव में हुई, जहां उसकी मजार भी है.

हनुमान प्रसाद पोद्दार

अयोध्या में बाबरी मस्जिद के मालिकाना हक को लेकर शिकायत-मुकदमेबाजी की शुरुआत काफी पहले से ही हो चुकी थी. लेकिन, 23 दिसंबर 1949 को मस्जिद में मूर्ति रखने की घटना ने इस मसले को अलग स्तर पर पहुंचा दिया. विवादित इमारत में भगवान राम की मूर्ति रखे जाने की घटना के सूत्रधार कौन थे, इसको लेकर कई तरह के मत हैं. हालांकि, मस्जिद में जाकर मूर्ति रखने का काम निर्वाणी अखाड़े के साधु अभिरामदास ने किया था. लेकिन, इसके योजनाकारों में जिन लोगों का नाम लिया जाता है, उनमें गोरक्षपीठ के महंत दिग्विजय नाथ, बाबा राघवदास और दिगंबर अखाड़े के महंत रामचंद्र परमहंस शामिल हैं.

बताया जाता है कि इस गोपनीय योजना के व्यवस्थापक थे - गीता प्रेस के संस्थापक हनुमान प्रसाद पोद्दार. हनुमान प्रसाद पोद्दार को उनके साथी ‘भाई’ जी कहते थे. वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा ‘युद्ध में अयोध्या’ नाम की अपनी पुस्तक में विवादित इमारत में मूर्ति रखने के प्रकरण के बारे में लिखते हैं, ‘ये सभी लोग हाड़ तोड़ने वाली सर्दी में सरयू में स्नान करते हैं. नए कपड़े पहनते हैं. उनके साथ तीस चालीस वैरागी साधु होते हैं. भाई जी (हनुमान प्रसाद पोद्दार) अपने साथ अष्टधातु की मूर्ति लाए थे. मूर्ति को बांस की एक टोकरी में रखा जाता है और बाबा अभिराम दास उसे सिर पर उठाते हैं.’ बाद में यही मूर्ति विवादित इमारत में रखी जाती है.

हनुमान प्रसाद पोद्दार 1914 में मदन मोहन मालवीय के संपर्क में आने के बाद से हिंदू महासभा में सक्रिय थे. वे दिग्विजय नाथ के भी करीबी थे जो इस विवाद के एक अन्य महत्वपूर्ण किरदार थे. गीता प्रेस की कल्याण पत्रिका उस दौर में खूब पढ़ी जाती थी और हनुमान प्रसाद पोद्दार ने कल्याण का राम जन्मभूमि अंक भी निकाला था.

हवलदार अब्दुल बरकत

अब्दुल बरकत का भी किस्सा उसी रात से जुड़ा है जब विवादित इमारत में मूर्तियां रखी गईं थीं. 22 और 23 दिसंबर, 1949 की दरमियानी रात को अब्दुल बरकत की विवादित इमारत पर ड्यूटी थी. ड्यूटी का वक्त रात बारह बजे से था. लेकिन, किसी वजह से वे देर से पहुंचे. जब तक अब्दुल बरकत विवादित इमारत की ड्यूटी पर पहुंचे तब तक बैरागी साधुओं के समूह के साथ कुछ लोग मस्जिद में मूर्तियां रख चुके थे. कहा जाता है कि संवेदनशील जगह की ड्यूटी पर तैनात अब्दुल बरकत इससे घबरा गए. इसके बाद अपनी नौकरी पर संकट जान उन्होंने वही बातें दोहरा दीं जो मूर्ति रखवाने के योजनाकारों ने उनसे कहीं.

पुलिस को दिए अपने बयान में अब्दुल बरकत ने कहा, ‘मैं बाबरी मस्जिद की ड्यूटी पर तैनात था. तभी बाबरी मस्जिद के अंदर से एक रोशनी उठी जो धीरे-धीरे सुनहली होती गई. भीतर एक चार-पांच साल के बच्चे की सूरत नजर आई. ऐसा खूबसूरत बच्चा मैंने अपनी जिंदगी में नहीं देखा था. जब मुझे होश आया तो मैंने देखा कि सदर दरवाजे का ताला टूटा हुआ है और हिंदुओं की भीड़ एक बुत की आरती कर रही है. इसके अलावा मैं कुछ नहीं जानता.’ अब्दुल बरकत के इस बयान का कानूनी तौर पर जो भी महत्व हो, लेकिन लोकप्रिय अवधारणा में इसके महत्व का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि राम मंदिर के लिए पत्थर तराशने के लिए बनाई गई कार्यशाला में अब्दुल बरकत के इस बयान का बाकायदा बोर्ड लगा हुआ है.

राम जन्मभूमि न्यास कार्यशाला परिसर में अब्दुल बरकत के बयान का बोर्ड बनवाकर लगाया गया है.

केकेके नायर

केकेके नायर फैजाबाद के जिलाधिकारी थे और इन्हीं के कार्यकाल के दौरान बाबरी ढांचे में मूर्ति रखीं गईं थीं. यह अयोध्या विवाद के इतिहास में सबसे अहम मोड़ था. केकेके नायर मूलतः केरल के थे और 1930 बैच के आईसीएस अधिकारी थे. नायर पर आरोप लगाए जाते हैं कि विवादित इमारत में मूर्ति रखवाने में उनकी भूमिका भी थी. यह आरोप कितना सही या गलत है यह नहीं कहा जा सकता. लेकिन, यह सही है कि उन्होंने बाबरी ढांचे से मूर्तियां हटाने का कोई बहुत ज्यादा प्रयास नहीं किया. कहा जाता है कि उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत को केकेके नायर ने यह कहकर समझा लिया था कि विवादित परिसर से मूर्ति हटाने पर हालात और बिगडेंगे. इसके बाद गोविंद बल्लभ पंत का रवैया इस बारे में नरम ही रहा.

तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने विवादित परिसर से मूर्तियां हटाने के लिए कहा तो उत्तर प्रदेश सरकार ने भी मूर्तियां हटाने का आदेश जारी किया. लेकिन, केकेके नायर ने फिर सरकार को लिखा कि दंगे और खून-खराबा होने की आशंका को देखते हुए मूर्तियां नहीं हटाई जा सकती. ज्यादा दबाव पड़ने पर उन्होंने कहा कि अगर मूर्तियां हटानी हैं तो पहले उन्हें हटा दिया जाए. उनकी इस चेतावनी और विभाजन के बाद देश के माहौल को देखते हुए सरकार इस मामले में पीछे हट गई. केकेके नायर इसके बाद सिविल सेवा के अधिकारी से इतर हिंदुत्व के नायक बन चुके थे और 1952 में उन्होंने वीआरएस ले लिया. इसके बाद वे बहराइच से जनसंघ के टिकट पर लोकसभा सदस्य भी बने. उनकी पत्नी शंकुतला नायर भी कैसरगंज संसदीय क्षेत्र से कई बार सांसद बनीं.

अली मियां

मौलाना अबुल हसन अली नदवी. इन्हें अली मियां भी कहा जाता था. अली मियां से भी अयोध्या विवाद के तार कई तरह से और दिलचस्प तरीके से जुड़ते हैं. 1986 में शाहबानो प्रकरण के समय अली मियां मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के चेयरमैन थे. शाहबानो को गुजारा भत्ता देने के अदालत के फैसले का मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सख्त विरोध किया था. मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के दबाव में ही राजीव गांधी ने शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने की योजना बनाई. कहा जाता है कि शाहबानो प्रकरण में अदालत का फैसला पलटने को लेकर तत्कालीन मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अध्यक्ष अली मियां और प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बीच एक डील हुई थी. इस डील की वजह यह बताई जाती है कि शाहबानो प्रकरण के बाद राजीव गांधी पर मुस्लिम कट्टरपंथ को प्रश्रय देने के आरोप लगने लगे थे. इस वजह से उन्होंने अयोध्या में विवादित ढांचे का ताला खुलवाने का फैसला किया और अली मियां से कहा कि इस मसले पर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड उनका साथ दे.

अली मियां ने इस मसले पर राजीव गांधी का साथ दिया और अयोध्या में ताला खोलने के फैसले पर कोई सख्त एतराज नहीं जताया. बल्कि, मुस्लिम पक्ष के जो लोग इसका विरोध कर रहे थे, अली मियां ने उनकी आलोचना की. केरल के मौजूदा राज्यपाल आऱिफ मोहम्मद खान का अपने हालिया साक्षात्कारों में भी कहना है कि राजीव गांधी के जीवनकाल में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड कभी भी अयोध्या विवाद पर आक्रामक नहीं रहा, इसकी वजह अली मियां और राजीव गांधी के बीच अलिखित समझौता ही था. अली मियांं के उस समय के लिखे हुए से भी इस बात का थोड़ा आभास मिलता हैै. उनका मानना था कि बाबरी मस्जिद पर मुस्लिम पक्ष का सख्त रवैया हिंदुओं को और प्रतिक्रियावादी बनाएगा.

शाहबानो प्रकरण के बदले अयोध्या विवाद की डील के अलावा भी अली मियां का अयोध्या विवाद से एक दिलचस्प नाता है. अली मियां के पिता मौलाना अब्दुल हई ने अरबी में एक किताब लिखी थी. अली मियां ने अपने वालिद की अरबी की किताब का 1973 में उर्दू में तर्जुमा किया था. इस किताब के एक अध्याय ‘हिंदुस्तान की मस्जिदें’ में बाबरी मस्जिद का उल्लेख किया गया था. बाबरी मस्जिद के बारे में इस किताब में लिखा था कि यह मस्जिद अयोध्या में है और इसका निर्माण उस जगह पर कराया गया था, जिसे हिंदू रामचंद्र जी का जन्मस्थान कहते हैं. बाद में अयोध्या विवाद के दौरान इस किताब के हवाले से देश के अखबारों में कुछ खबरें भी छपीं. लेकिन, इसके बाद इस किताब की जो सीमित प्रतियां अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और लखनऊ के नदवा में थीं, गायब हो गईं. कहा जाता है कि अखबारों में खबरें छपने के बाद अली मियां ने ही उन्हें पुस्तकालयों से हटवा दिया.