अयोध्या विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पाकिस्तान से भी प्रतिक्रिया आई है. पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने करतारपुर कॉरीडोर खोले जाने के दिन आए इस फैसले पर सवाल उठाए हैं. पीटीआई के मुताबिक उन्होंने कहा, ‘क्या इसको थोड़े दिन टाला नहीं जा सकता था? मैं इस खुशी के मौके पर दिखाए गई असंवेदनशीलता से बेहद दुखी हूं.’

करतारपुर कॉरीडोर के बहुप्रतीक्षित उद्घाटन का जिक्र करते हुए शाह महमूद कुरैशी ने कहा, ‘आपको इससे ध्यान भटकाने की बजाय इस खुशी के मौके का हिस्सा बनना चाहिए था. यह विवाद संवेदनशील था और उसे इस शुभ दिन का हिस्सा नहीं बनाना चाहिए था.’ यह कॉरीडोर गुरदासपुर में बाबा नानक गुरुद्वारे को पाकिस्तान के करतारपुर स्थित दरबार साहिब से जोड़ता है. कहा जाता है कि यहां गुरु नानक देव ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष बिताए थे. पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने कहा कि मुसलमान भारत में पहले ही काफी दबाव में है और सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन पर और दबाव बढ़ाएगा.

उधर, पाकिस्तान के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री फवाद हुसैन ने फैसले को शर्मनाक, बेहूदा, अवैध और अनैतिक करार दिया है. सरकारी पाकिस्तानी रेडियो की एक खबर के अनुसार सूचना और प्रसारण मामलों में प्रधानमंत्री की विशेष सहायक फिरदौस एवान ने फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भारतीय शीर्ष अदालत ने बता दिया कि वह स्वतंत्र नहीं है. उन्होंने कहा कि एक ओर जहां करतारपुर गलियारा खोल पाकिस्तान अल्पसंख्यकों के अधिकार सुनिश्चित कर रहा है वहीं दूसरी ओर भारत मुसलमानों सहित अल्पसंख्यकों पर जुल्म कर रहा है.

इस फैसले पर पाकिस्तानी सेना की प्रतिक्रिया भी आई है. सेना के प्रवक्ता आसिफ़ गफूर ने ट्वीट कर कहा, ‘दुनिया ने एक बार फिर से अतिवादी भारत का असली चेहरा देख लिया है. पांच अगस्त को कश्मीर का भारत ने संवैधानिक दर्जा ख़त्म किया और आज बाबरी मस्जिद पर फ़ैसला आया. दूसरी तरफ, पाकिस्तान ने दूसरे धर्म का आदर करते हुए गुरु नानक के सेवकों के लिए करतारपुर कॉरिडोर खोल दिया.’

सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर दिया है. उसने विवादित भूमि हिंदू पक्ष को देते हुए सरकार को निर्देश दिया है कि मंदिर निर्माण के लिए एक ट्रस्ट बनाया जाए. साथ ही उसने कहा है कि ‘सुन्नी वक्फ बोर्ड’ को मस्जिद के निर्माण के लिये पांच एकड़ जमीन आवंटित की जाये. प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने इसके साथ ही करीब 130 साल से चले आ रहे इस संवेदनशील विवाद का पटाक्षेप कर दिया.