9 नवंबर 1989 बर्लिन की दीवार गिरी थी. लेकिन इस पूरी कहानी की शुरुआत हुई थी द्वितीय विश्वयुद्ध के अंत में. 8 मई 1945 को जर्मन सेना के बिना शर्त आत्मसमर्पण के महीने भर बाद ही, 5 जून को, जर्मनी के चारों विजेता देशों - सोवियत संघ, अमेरिका, ब्रिटेन और फ़्रांस - ने उसे अपने-अपने क़ब्ज़े वाले चार अलग-अलग क्षेत्रों (ज़ोनों) में तथा राजधानी बर्लिन को चार सेक्टरों में बांट लिया.

तीनों पश्चिमी विजेता शक्तियों वाले जर्मनी के पश्चिमी ज़ोनों को मिला कर, 23 मई 1949 को ‘फ़ेडरल रिपब्लिक ऑफ़ जर्मनी’ (संघीय जर्मन गणराज्य) नाम से एक नया पूंजीवादी लोकतांत्रिक देश बना. आम तौर पर उसे ‘पश्चिम जर्मनी’ कहा जाता था. बर्लिन से क़रीब छह सौ किलोमीटर दूर के छोटे-से बॉन शहर को उसकी अंतरिम राजधानी बनाया गया.

जर्मनी का पूर्वी हिस्सा, और उसके बीचों-बीच पड़ने वाले बर्लिन शहर का पूर्वी भाग, सोवियत संघ को मिला था. उसने जर्मन कम्युनिस्टों की सहायता से, 7 अक्टूबर 1949 को, वहां ‘जर्मन डेमोक्रैटिक रिपब्लिक’ (जर्मन जनवादी गणतंत्र) नाम से एक कम्युनिस्ट जर्मनी की स्थापना की. उसे ‘जीडीआर’ या ‘पूर्व जर्मनी’ भी कहा जाता था. पूर्वी जर्मनी ने विभाजित बर्लिन शहर के पूर्वी सेक्टर को अपनी राजधानी बनाया.

जर्मनी दो गुटों में भी बंट गया था

इस प्रकार तानाशाह अडोल्फ़ हिटलर द्वारा छेड़े गये युद्ध में पराजित जर्मनी की जनता स्वेच्छा से नहीं, अपने विजेताओं की इच्छानुसार न केवल दो देशों में, बल्कि दो परस्पर विरोधी सैनिक-राजनैतिक गुटों में भी बंट गयी. पश्चिम जर्मनी अमेरिकी नेतृत्व वाले पूंजीवादी पश्चिमी देशों के उत्तर एटलांटिक संधि संगठन ‘नाटो’ का, और पूर्वी जर्मनी सोवियत संघ के नेतृत्व वाले पूर्वी यूरोपीय कम्युनिस्ट देशों के वार्सा संधि संगठन का सदस्य बना. दोनों गुटों ने अपने-अपने सदस्य देशों में जी भर कर परमाणु अस्त्र भी तैनात किये. इनके बीच की घोर तनातनी ‘शीतयुद्ध’ (कोल्ड वॉर) के नाम से विख्यात हुई.

1949 में दो जर्मनी बन जाने के बाद उनके बीच की 1378 किलोमीटर लंबी सीमा की घेराबंदी 1950 वाले दशक के मध्य तक पूरी हो चुकी थी. अपनी कम्युनिस्ट सरकार से असंतुष्ट पूर्वी जर्मन लोग अब आसानी से पश्चिम की ओर पलायन नहीं कर सकते थे. बर्लिन के दोनों हिस्सों के बीच की सीमा पर उस समय कोई बाड़ या दीवार नहीं थी. बाधारहित सीमा को लांघ कर पलायन करने वाले या तो पश्चिम बर्लिन में ही बस जाते थे या वहां से विमान द्वारा पश्चिम जर्मनी चले जाते थे. विमान से इसलिए, क्योंकि पूरा बर्लिन शहर एक द्वीप के समान पूर्वी जर्मन भूभाग से घिरा हुआ था. कार या ट्रेन से पश्चिम बर्लिन से पश्चिम जर्मनी जाने पर बीच रास्ते में पकड़े जाने का डर रहता था.

बर्लिन दीवार बनाने का निर्णय मॉस्को में हुआ

पूर्वी जर्मनी की सरकार पश्चिम बर्लिन के साथ वाली सीमा को बंद करने के लिए काफ़ी समय से प्रयत्नशील थी, किंतु उसे सोवियत नेताओं से हरी झंडी नहीं मिल रही थी. हरी झंडी मिली 3 अगस्त 1961 को. मॉस्को में वार्सा संधि संगठन के नेताओं का शिखर सम्मेलन चल रहा था. पूर्वी जर्मन नेता वाल्टर उल्ब्रिश्त सोवियत नेता निकिता ख्रुश्चेव को मनाने में सफल हो गये कि पश्चिम बर्लिन के साथ वाली सीमा को यदि बंद नहीं किया गया, तो पूर्वी जर्मनी का दीवाला पिट जायेगा और वह निर्जन हो जायेगा. इस शिखर सम्मेलन में अन्य कम्युनिस्ट नेताओं ने भी इस सहमति का अनुमोदन कर दिया.

एक ही सप्ताह बाद, पश्चिम बर्लिन को चारों ओर से घेरते हुए दीवार बनाने का काम शुरू हो गया. सबसे पहले 12 और 13 अगस्त 1961 के बीच वाली रात को सीमा पर कंटीली बाड़ के तार बिछाये गए. अपने अंतिम रूप में सीमेंट-कंक्रीट की बनी प्रायः दोहरी बर्लिन दीवार 160 किलोमीटर लंबी और साढ़े तीन मीटर से कुछ अधिक ऊंची थी. सीमारक्षक सैनिकों के लिए इसमें अनेक ऊंचे-ऊंचे निगरानी टॉवर बने हुए थे. तेज़ रोशनी वाली फ्लड लाइटें लगी हुई थीं. स्वचालित मशीनगनें थीं और बारूदी सुरंगें बिछी हुई थीं. लेखक 1970 वाले दशक में पूर्वी बर्लिन में रहा है. पैदल या ट्रेन द्वारा दीवार के आर-पार की अपनी अनगिनत यात्राओं में बर्लिन दीवार का यह भयावह स्वरूप मैंने स्वयं देखा है.

पूर्वी जर्मन सीमारक्षक सैनिक अल्शेसियन कुत्तों के साथ वहां गश्त लगाते थे. बर्लिन दीवार फांदने के प्रयास में कम से कम 140 लोगों को अपने प्राण गंवाने पड़े. इनमें से अंतिम अभागा था क्रिस गेफ़ोए नाम का 20 साल का एक युवक. 4 फ़रवरी 1989 के दिन दीवार फांदने के प्रयास में वह दस गोलियों का शिकार बन गया. सीमापारगमन के लिए एक रेलवे स्टेशन और सात सड़कों पर चेक-पोस्ट थे. वहां वैध दस्तावेज़ों के साथ बहुत ही गिनेचुने पूर्वी जर्मन और एक वीसा-फ़ीस तथा अनिवार्य मुद्रा-विनिमय राशि के साथ केवल विदेशी या पश्चिम जर्मन नागरिक ही सीमा पार कर सकते थे. पूर्वी जर्मनी में विदेशी राजनयिक और मान्यता प्राप्त पत्रकार इन नियमों से ऊपर थे. मैं भी इस छूट से लाभान्वित था.

बर्लिन दीवार के पास जमा पूर्वी जर्मनी के लोग

सीमा पर निष्ठुर तलाशी

सीमा पर सामान्य लोगों की इतनी निष्ठुर तलाशी ली जाती थी कि विशेषकर वृद्धजनों को घबराहट से दिल का दौरा पड़ जाता था. ऐसी घटनाओं के कारण भी, दीवार गिरने तक, कम से कम 251 लोगों की मृत्यु हो गई. दीवार के रहते 277 लोगों को किसी न किसी उचित-अनुचित कारण से सज़ाएं भी भुगतनी पड़ीं. केवल चारों विजेता शक्तियों के सैनिकों को अपनी वर्दियों और वाहनों में बर्लिन के दोनों हिस्सों में किसी भी समय आने-जाने और गश्त लगाने की छूट थी. उस समय बर्लिन संसार में जासूसी का सबसे बड़ा अड्डा था. बहुत से पत्रकार भी किसी न किसी पक्ष के लिए जासूसी किया करते थे.

बर्लिन का एक दक्षिण-पश्चिमी उपनगर है मरीनफ़ेल्डे. पूर्वी जर्मनी से आने वाले भगोड़ों और शरणार्थियों के लिए 1953 से वहां एक शरणार्थी शिविर था, जो अब एक शरणार्थी संग्रहालय बन गया है. अक्टूबर 1990 में दोनों जर्मनी का एकीकरण होने तक उसने कुल 13 लाख 50 हज़ार शरणार्थियों के रहने-खाने और एक नया जीवन शुरू करने की व्यवस्था की. देश के विभाजन के बाद पश्चिम जर्मनी में ऐसे और भी कई शरणार्थी शिविर थे, जिनमें 1949 से 1990 तक लगभग 40 लाख पूर्वी जर्मन नागरिकों को शरण मिली.

ढाई वर्षों में ही तीन सोवियत नेताओं की मृत्यु

इसे सौभाग्य कहें, एक अबूझ विडंबना या ईश्वरीय न्याय, कि अंततः उसी सोवियत संघ ने, जिसने मार्क्स और लेनिन की अंधभक्ति से अंधे होकर आधे यूरोप और आधे एशिया को अपना उपनिवेश बना रखा था, बर्लिन दीवार के पतन, जर्मनी के एकीकरण और पूर्वी यूरोप के देशों की मुक्त का मार्ग भी प्रशस्त किया. अक्टूबर 1964 में निकिता ख्रुश्चेव को हटाकर सोवियत संघ के सर्वेसर्वा बने लेओनिद ब्रेज़नेव की 10 नवंबर 1982 को मृत्यु हो गयी. उनका स्थान लेने वाले यूरी अंद्रोपोव भी डेढ़ ही वर्ष बाद 9 फ़रवरी 1984 को चल बसे. अंद्रोपोव का स्थान लिया 13 फ़रवरी 1984 के दिन कोस्तांतिन चेर्नेंको ने. पर 10 मार्च 1985 के दिन उनकी भी सांस थम गयी. मात्र ढाई वर्षों में ही सोवियत संघ ने अपने तीन शीर्ष नेता खो दिये.

11 मार्च 1985 को सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव के रूप में सत्ता के शिखर पर पहुंचने वाले नये नेता थे मात्र 54 वर्ष के मिख़ाइल गोर्बाचोव. उनके दिमाग़ में सोवियत संघ के उदारवादी कायापलट की एक से एक योजनाएं कुलबुला रही थीं. उन्होंने पाया कि अमेरिका वाले पश्चिमी गुट के साथ हथियारों की होड़ से सोवियत अर्थव्यवस्था की हालत बहुत ख़स्ता हो चली है. अतः आते ही उन्होंने आर्थिक ही नहीं, गृह और विदेशनीति में भी दूरगामी सुधार लाने शुरू कर दिये.

सोवियत गुट के देशों को सोवियत हस्तक्षेप से मुक्ति मिली

मिख़ाइल गोर्बाचोव ने अपने सुधारों को पेरेस्त्रोइका (पुनर्गठन) और ग्लासनोस्त(पारदर्शिता) का नाम दिया. लेओनिद ब्रेज़नेव की 1969 की एक नीति को पलटते हुए 1987 में उन्होने सोवियत गुट के वार्सा संधि वाले देशों को यह छूट भी दे दी कि वे अपनी नीतियां अब मॉस्को के हस्तक्षेप के बिना स्वयं तय कर सकते हैं. इसका अर्थ यह था कि जिस सोवियत संघ ने अतीत में अपने सैनिक और टैंक भेजकर पूर्वी जर्मनी के श्रमिक विद्रोह, हंगेरियाई छात्र विद्रोह और ‘प्राग वसंत’ कहलाने वाले चेकोस्लोवाकियाई उदारीकरण को निर्ममतापूर्वक कुचल दिया था, वैसा बलप्रयोग अब नहीं होगा. गोर्बाचोव की इन अप्रत्याशित घोषणाओं से पूर्वी और पश्चिमी गुटों के बीच पारस्परिक अविश्वास और तनातनी की गरमाहट तेज़ी से घटने लगी.

अंद्रोपोव और चेर्नेंको के अंतिम संस्कारों में तत्कालीन पश्चिम जर्मन चांसलर (प्रधानमंत्री) हेल्मूट कोल भी शांमिल हुए थे. इससे उन्हें उनके उत्तराधिकारियों से बातचीत करने और उन्हें जानने-समझने का सुअवसर मिला.1985 में वे इसी तरह मिख़ाइल गोर्बाचोव से भी परिचित हुए. गोर्बाचोव द्वारा किये जा रहे साहसिक सुधारों को जर्मनी सहित सारे पश्चिमी जगत में समर्थन-भरे कौतूहल के साथ देखा जा रहा था.

सोवियत विदेशनीति में इन परिवर्तनों का ही परिणाम था कि पश्चिम जर्मनी के ज़ारलैंड राज्य में जन्मे पूर्वी जर्मनी के तत्कालीन सर्वोच्च नेता एरिश होनेकर,1987 में पहली बार अपनी मातृभूमि की यात्रा कर सके. 7 सितंबर 1987 को वे पश्चिम जर्मनी की तत्कालीन राजधानी बॉन में चांसलर हेल्मूट कोल से भी मिले. सोवियत संघ में गोर्बाचोव के उदय से पहले होनेकर ऐसी किसी यात्रा के केवल सपने भर देख सकते थे.

पू्र्वी जर्मनी ने सोवियत पत्र-पत्रिकाओं पर रोक लगाई

एरिश होनेकर तब भी गोर्बाचोव के कृतज्ञ, प्रशंसक या अनुगामी कभी नहीं रहे. बल्कि उन्होंने कुछेक सोवियत पत्र-पत्रिकाओं की बिक्री पर अपने यहां रोक लगा दी. उन्हें जानने वालों का कहना है कि होनेकर भांप गये थे कि यदि वे भी गोर्बाचोव की तरह उदारवादी या सुधारवादी बन गये, तो बहुत जल्दी ही उनकी लुटिया डूब जायेगी. दुर्भाग्य से गोर्बाचोव और उनकी नेकनीयती का चार वर्ष बाद ठीक यही परिणाम हुआ. भाग्य ने जिस प्रकार अहिंसावादी गांधी को हिंसा का शिकार बनाया और धार्मिक हिंसा और विद्वेष भड़काने वाले जिन्ना को एक नया देश देकर पुरस्कृत किया, कुछ वैसा ही गोर्बाचोव के साथ भी हुआ!

अपनी नीतियों की वजह से एरिश होनेकर के प्रति पूर्वी जर्मनी में असंतोष निरंतर बढ़ता जा रहा था. इसकी एक प्रबल अभिव्यक्ति 1989 में हुए पूर्वी जर्मनी के संसदीय चुनावों में हुई. इससे पहले हमेशा यही होता आया था कि (सरकारी दावे के अनुसार) 99 प्रतिशत मतदाता मतपत्र पर लिखे नामों का अनुमोदन कर दिया करते थे. इस बार सरकार को स्वीकार करना पड़ा कि सात प्रतिशत मतदाताओं ने ऐसा नहीं किया. वैसे वास्तविक अनुपात इससे कहीं अधिक ही रहा होगा.

1989 के मई महीने से चीन में राजधानी बेजिंग के तियान’ आनमेन चौक पर छात्रों के प्रदर्शन, धरने और अनशन चल रहे थे. यह आन्दोलन गोर्बाचोव के उदारीकरण अभियान के बाद से सोवियत संघ, पोलैंड और हंगरी में बह रही नयी हवा से प्रेरित था. बेजिंग के अन्य हिस्सों में भारी संख्या में श्रमिक भी इस आन्दोलन में शामिल होने लगे थे. 3 और 4 जून के बीच वाली रात को, चीनी सरकार के आदेश पर, सेना ने अपने टैंकों से इस आन्दोलन को कुचलने का अभियान छेड़ दिया. यह अभियान सप्ताह भर चला. चीनी रेडक्रॉस का उल्लेख करते हुए प्रेस-रिपोर्टों में कहा गया कि आन्दोलनकारियों और सेना के कुल क़रीब 2600 लोगों की मृत्यु हुई और 7000 से अधिक घायल हुए.

चीन के तियानआनमेन हत्याकांड को हथकंडा बनाया

पूर्वी जर्मन कम्युनिस्ट पार्टी के पोलिटब्यूरो की बैठक में चीन के इस कदम के प्रति सहमति जतायी गयी. यह पूर्वी जर्मन जनता के लिए एक संदेश था कि यदि वहां भी कोई ऐसा प्रयास हुआ, तो उसका भी वही अंत होगा जो चीन में हुआ.

इस परोक्ष धमकी के बाद उन लोगों की संख्या तेज़ी से बढ़ने लगी, जो देश छोड़कर जाने की अनुमति पाने के लिए आवेदन करने लगे. ऐसे लोगों को डराने-धमकाने और गिरफ्तार कर लेने के बढ़ते हुए मामलों के बावजूद उनकी संख्या बढ़ती ही रही. जिनके धीरज का बांध टूट रहा था, वे सैर-सपाटे के बहाने से पूर्वी यूरोप के हंगरी जैसे देशों में जाते थे और वहां से ऑस्ट्रिया होते हुए पश्चिम जर्मनी में पहुंचने का प्रयास करते थे.

हंगरी ने बर्लिन दीवार की पहली ईंट गिराई

19 अगस्त 1989 के दिन हंगरी के लोगों ने देश के धुर पश्चिम में ऑस्ट्रिया के साथ वाली सीमा के पास के शोप्रोन नाम के स्थान पर ‘पैनयूरोपियन पिकनिक’ नाम का एक आयोजन किया. ढेर सारी पर्चियां बांटकर प्रचारित किया गया कि उस दिन ऑस्ट्रिया के साथ वाली सीमा कुछ समय के लिए खोल दी जायेगी. तीसरे पहर तीन बजे तक वहां हज़ारों लोग जमा हो गये. तब तीन घंटे के लिए सीमा खोल दी गई. इसका लाभ उठा कर क़रीब 600 पूर्वी जर्मन नागरिक भी सीमा पार कर ऑस्ट्रिया पहुंच गये. ऑस्ट्रिया भी एक जर्मन-जातीय और जर्मन भाषीय देश है. वहां से वे रेलमार्ग से पश्चिम जर्मनी पहुंचे.

पूर्वी जर्मन नागरिकों का यह तब तक का सबसे बड़ा सामूहिक पलायन था. यही नहीं, मिख़ाइल गोर्बाचोव की हरी झंडी मिलते ही, एक ही महीने के भीतर, 11 सितंबर 1989 के दिन हंगरी ने ऑस्ट्रिया के साथ वाली अपनी सीमा सबके लिए पूरी तरह खोल दी. पूर्वी जर्मन नागरिकों के लिए अब हंगरी के रास्ते से पलायन करना, हंगरी के नियमों के अनुसार, अवैध नहीं रहा. इसके बाद तो पूर्वी जर्मनी में जैसे भगदड़-सी मच गयी. हंगरी का यह निर्णय 9 नवंबर 1989 की शाम बर्लिन दीवार गिरने का एक निर्णायक कारण बना.

1989 के सितंबर का अंत आते-आते प्राग, वार्सा और बुडापेस्ट के पश्चिम जर्मन दूतावास उन पूर्वी जर्मनों की भीड़ से भर गये, जो पश्चिम जर्मनी भेजे जाने की मांग कर रहे थे. प्राग स्थित पश्चिम जर्मन दूतावास के कमरों में और बाहरी चहारदीवारी के भीतर तक सात हज़ार लोग जमा हो गये थे. दूतावास का काम ठप्प पड़ गया था. लेकिन इतने लोगों को पश्चिम जर्मनी में ले जाना आसान नहीं था. क्योंकि चेकोस्लोवाकिया के विदेशमंत्री ने इस मामले में कोई भी सहयोग करने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि “इससे हमारा क्या लेना-देना है?”

मिख़ाइल गोर्बाचोव ने कहा, “ठीक है, हम मदद करेंगे

तत्कालीन पश्चिम जर्मन विदेशमंत्री हांस-डीट्रिश गेंशर संयुक्त राष्ट्र महासभा के अधिवेशन के सिलसिले में उस समय अमेरिका में थे. सोवियत विदेशमंत्री एदुआर्द शेवार्दनाद्से भी उस समय वहीं थे. 26 सितंबर की रात गेंशर उनसे मिलने उनके होटल पहुंचे. उन्होंने सोवियत विदेशमंत्री से अनुरोध किया कि प्राग वाली समस्या का अब वे ही कोई रास्ता निकालें. शेवार्दनाद्से ने उसी रात मॉस्को में गोर्बाचोव को फ़ोन किया. गोर्बाचोव ने कहा, “ठीक है, हम मदद करेंगे.”

गोर्बाचोव ने मदद की. जर्मन विदेशमंत्री गेंशर 30 सितंबर को स्वयं सीधे प्राग पहुंचे. वहां पश्चिम जर्मन दूतावास के छज्जे से भीड़ को संबोधित करते हुए जैसे ही उन्होंने कहा, “मैं आप लोगों को यह बताने आया हूं कि आज रात आप...” बाद के सारे शब्द भीड़ में फैली खुशी की लहर के शोर में डूब गये. हज़ारों लोग झूमने और जय-जयकार ही नहीं करने लगे, उनकी आंखों से अपार खुशी के आंसू भी छलक पड़े. वह हर किसी को भावविभोर कर देने वाला एक अपूर्व ऐतिहासिक क्षण था.

पूर्वी जर्मनी ने शर्त थोपी कि प्राग में जमा सभी पूर्वी जर्मन नागरिक, ट्रेनों द्वरा पूर्वी जर्मनी की भूमि पर से गुज़रते हुए पश्चिम जर्मनी पहुंचेंगे. लोगों को डर लगा कि कहीं ऐसा तो नहीं होगा कि पूर्वी जर्मनी से गुज़रते समय ट्रेन रोक कर कुछ लोगों को गिरफ्तार कर लिया जायेगा! ऐसे नहीं हुआ. भारत में इस समय के आधार-कार्ड के समान पूर्वी जर्मन नागरिकों के पहचान-कार्ड (आइडेंटिटी कार्ड) ही उनसे ले लिये गये. चार दिन बाद जब दूसरी ट्रेन प्राग से चली, तब पूर्वी जर्मनी के ड्रेस्डेन शहर के मुख्य रेलवे स्टेशन से उसके गुज़रते समय स्थिति बहुत भयावह हो गयी. स्टेशन के बाहर ऐसे लोगों की भारी भीड़ जमा हो गयी, जो स्टेशन में घुस कर उस ट्रेन में चढ़ जाना और पश्चिम जर्मनी पहुंच जाना चाहते थे. पुलिस ने जैसे-तैसे भीड़ को प्लेटफ़ॉर्म तक पहुंचने से रोका.

ख़तरे उन्हीं का इंतज़ार करते हैं, जो जीवन की सच्चाइयों से मुंह मोड़ लेते हैं

7 अक्टूबर 1989 साम्यवादी पूर्वी जर्मनी की स्थापना की 40वीं जयंती का दिन था. दिन शुरू हुआ पूर्वी बर्लिन और देश के अन्य क़रीब 50 छोटे-बड़े शहरों में सरकार-विरोधी प्रदर्शनों और सैकड़ों लोगों की गिरफ्तारियों के साथ. मिख़ाइल गोर्बाचोव उस दिन जयंती समारोह के मुख्य अतिथि थे. पूर्वी बर्लिन की सड़कों पर से उनकी कार गुज़रते समय लोग उन्हें प्रेम और उल्लास से “गोर्बी, गोर्बी” पुकारते हुए उनका स्वागत कर रहे थे. एक पत्रकार ने उनसे पूछा कि “क्या आप नहीं सोचते कि पूर्वी जर्मनी की स्थिति इस समय ख़तरनाक़ हो गयी है?” होनेकर पर लक्षित उनका व्यंगात्मक उत्तर था, “मैं समझता हूं कि ख़तरे सिर्फ़ उन्हीं का इंतज़ार करते हैं, जो जीवन की सच्चाइयों से मुंह मोड़ लेते हैं.”

एरिश होनेकर और मिख़ाइल गोर्बाचोव

पू्र्वी बर्लिन के भव्य गणतंत्र प्रासाद में, जिसे होनेकर ने अरबों मार्क की लागत से बनवाया था, 7 अक्टूबर की शाम मुख्य समारोह था. गोर्बाचोव की उपस्थिति में अपने जयंती-भाषण में होनेकर ने कहा, “जर्मन जनवादी गणतंत्र वर्ष 2000 तक इस विश्वास के साथ आगे बढ़ता रहेगा कि भविष्य केवल और केवल समाजवाद का ही है.” यानी, वे गोर्बाचोव के सुधारों को ग़ैर-समाजवादी मानते हैं और उन्हें अपनाने की कतई नहीं सोच रहे हैं.

40वीं जयंती समारोहों के दो ही दिन बाद, 9 अक्टूबर 1989 को पूर्वी जर्मनी के दूसरे सबसे बड़े शहर लाइपज़िग में कोई 70 हज़ार लोग सड़कों पर उतर आये. प्रदर्शनकारी गोर्बाचोव के बड़े-बड़े फ़ोटो उठाये चल रहे थे. गुप्तचर सेवा मंत्रालय में, जिसे संक्षेप में ‘स्टाज़ी’ कहा जाता था, सबके हाथ-पैर फूलने लगे. उसके मंत्री एरिश मील्के ने ख़तरे का अलार्म बजाते हुए सेना को पहले ही सजग कर दिया था. वे चीन के तियान’आनमेन चौक जैसे किसी जनसंहार के लिए भी तैयार लगे.

क्या हम टैंक तैनात नहीं कर सकते?’’

पिछली ही शाम को हुई एक बैठक में होनेकर ने अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से पूछा था कि क्या हम टैंक तैनात नहीं कर सकते? उस समय एक पार्टी नेता हांस मोद्रोव ने उनसे कहा, “कॉमरेड अध्यक्ष महोदय, लाइपज़िग में हम टैंक तैनात नहीं कर सकते. सारी सड़कें पहले ही टूट-फूट चुकी हैं. हम केवल एक नयी अराजकता पैदा कर देंगे.“ मोद्रोव का कहना है कि बात होनेकर के पल्ले पड़ी और पहली बार उन्होंने एक ऐसे आदेश पर हस्ताक्षर किये कि किसी हथियार का प्रयोग नहीं होगा. इस प्रकार 9 अक्टूबर 1989 पूर्वी जर्मनी के इतिहास में ऐसा दिन बना, जब सरकार ने प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध बलप्रयोग नहीं किया. प्रदर्शनकारियों को उस दिन से राज्यसत्ता का डर भी नहीं रहा. वे नारे लगाने लगे “हम ही जनता हैं” (विअर ज़िन्ट दास फ़ोल्क) और “एसईडी (कम्युनिस्ट पार्टी) मुर्दाबाद.”

1989 की18 अक्टूबर को सत्ता से होनेकर का पत्ता कट गया. उन्हीं के एक चहेते रहे एगोन क्रेंत्स ने उनकी जगह ली. जनता ने कोई उत्सव नहीं मनाया. जन-प्रदर्शन चलते रहे. हंगरी से होकर जनपलायन भी होता रहा. 4 नवंबर को पूर्वी बर्लिन में पूर्वी जर्मनी के इतिहास का सबसे बड़ा प्रदर्शन हुआ. क़रीब पांच लाख लोग सड़कों पर उमड़ पड़े. उनकी मांग थी कि हमें देश से बाहर जाने और विदेश यात्रा करने का अधिकार मिले. कम्युनिस्ट पार्टी के सर्वोच्च नेतृत्वमंडल पोलिटब्यूरो के सदस्य और मीडिया प्रभारी ग्युन्टर शाबोव्स्की ने उस दिन आश्वासन दिया कि विदेश यात्रा के नियमों को बहुत जल्द ही उदार बनाया जायेगा.

9 नवंबर जर्मन इतिहास की एक नाटकीय तारीख़

तब आया 9 नवंबर 1989 का ऐतिहासिक दिन. 9 नवंबर की तारीख़ 20वीं सदी के जर्मन इतिहास में पहले से ही एक बहुत ही नाटकीय तारीख़ सिद्ध हो चुकी है. प्रथम विश्वयुद्ध का अंत होते ही 9 नवंबर 1918 को ही जर्मनी में राजशाही का अंत हुआ था और देश पहली बार एक संसदीय लोकतंत्र बना था. 1923 में इसी दिन हिटलर ने बवेरिया की राजधानी म्युनिक में वहां की राजशाही का तख्ता पलटने का असफल प्रयास किया था. 1933 में हिटलर द्वारा जर्मनी की सत्ता हथिया लेने के बाद, 1938 में इसी दिन, उसकी इच्छानुसार यहूदियों की संपत्तियों और उनके पूजा स्थलों को फूंकने-जलाने, तोड़ने-फोड़ने और यहूदियों को लूटने-मारने का अभियान छिड़ा था.

1989 के 9 नवंबर की शाम ग्युन्टर शाबोव्स्की ने पूर्वी बर्लिन में एक बार फिर पत्रकार सम्मेलन को संबोधित किया. इस बार वे पूर्वी जर्मनी के नये विदेश यात्रा नियमों का परिचय देने आये थे. आनन-फ़ानन में बने इन नियमों में संभवतः अंतिम क्षण तक संशोधन होते रहे थे. शाबोव्स्की स्वयं उन्हें ठीक से पढ़ या समझ नहीं पाये थे. उन्होंने कहा, नये नियमों के अनुसार “कोई कारण या पारिवारिक संबंध बताये बिना निजी विदेश यात्राओं की अनुमति यथासंभव शीघ्र ही दे दी जायेगी.”

शब्दों की एक छोटी-सी भूल ने बर्लिन दीवार गिरा दी

एक संवाददाता द्वारा यह पूछने पर कि यह नियम कब से लागू होगा, शाबोव्स्की ने अपने कागज़ों के बीच खोजते हुए कहा, “मेरी जानकारी के अनुसार तुरंत, बिना किसी देर के.” ऐसा वास्तव में था नहीं. शाबोव्स्की को ऐसा आभास भी नहीं हुआ कि वे कुछ ऐसा कह बैठे हैं, जिसके कारण पूर्वी जर्मनी का अस्तित्व ही मिट जायेगा. उन्हें अपनी ग़लती का आभास तब हुआ, जब वे पूर्वी जर्मन नेताओं के रहने की माया नगरी वान्डलित्स में अपने घर पहुंचे. तब तक यह समाचार पश्चिमी रेडियो और टीवी चैनलों पर प्रसारित हो चुका था.

इस समाचार को देखते और सुनते ही पूर्वी बर्लिन के लोग दीवार के पार पश्चिम बर्लिन जाने के पारगमन चेक-पोस्टों पर टूट पड़े. वहां के अधिकारियों-कर्मचारियों को इस बारे में कोई आदेश ही नहीं मिला था. उन्होंने अपने से ऊपर के अधिकारियों से बात करने के लिए जहां कहीं फ़ोन किये, वहां या तो कोई फ़ोन उठा नहीं रहा था या किसी को ठीक से कुछ पता नहीं था. दूसरी ओर, लोगों की भीड़ इस तेज़ी से बढ़ रही थी कि सीमारक्षक उसे संभाल नहीं पा रहे थे. घबरा कर बोर्नहोल्म नाम की सड़क पर बने चेक-पोस्ट के फ़र्स्ट लेफ्टिनेन्ट यैगर ने रात साढ़े 11 बजे सीमा खोल दी.

अजेय-अभेद्य दीवार धराशायी होने लगी

इसके बाद दीवार के पार जाने के दूसरे चेक-पोस्ट भी खुलते गये. लोग उल्लास मनाते हुए पैदल या अपनी कारों से पश्चिम बर्लिन की ओर दौड़ पड़े. कुछ दूसरे लोग हथौड़ों आदि से दीवार तोड़ते हुए उसके टुकड़े यादगार के तौर पर जमा करने लगे. टेलीविज़न कैमरे इस ऐतिहासिक दृश्य को सारी रात प्रसारित करते रहे. वह बर्लिन दीवार, जो चीन की लंबी दीवार की तरह अभेद्य और अजेय होनी थी, देखते ही देखते धराशायी होने लगी.

पश्चिम जर्मन चांसलर हेल्मूट कोल उस समय पोलैंड की राजकीय यात्रा पर वार्सा में थे. वहां एक जर्मन पत्रकार से उन्होंने कहा, “समस्या का समाधान यह नहीं है कि पूर्वी जर्मनी के ढेर सारे लोग हमारे यहां आयें. समाधान यह होगा कि वहां के हमारे देशवासियों को रहने-जीने की वहीं बेहतर परिस्थितियां मिलें. स्वतंत्रता-भरी एक ऐसी व्यवस्था मिले कि वे अपने गृहस्थानों पर ही रहें.” चासलर कोल की इस कामना को नकारते हुए 1990 आने तक 10 लाख से अधिक पूर्वी जर्मन नागरिक अपने घर-द्वार छोड़ कर पश्चिम जर्मनी चले गये.

‘’स्वयं मॉस्को ही जर्मनी के एकीकरण के बारे में सोचने लगा’’

बर्लिन दीवार गिरने के कुछ ही समय बाद एक नामी सोवियत पत्रकार निकोलाई पोर्तुगालोव चांसलर हेल्मूट कोल के परामर्शदाता होर्स्ट टेल्चिक से बॉन में मिले. बातचीत के लिए पोर्तुगालोव का एक ही विषय था, विभाजित जर्मनी का पुनः एकीकरण. आश्चर्यचकित टेल्चिक का कहना था, “स्वाभाविक है कि मैं इससे चौंका. सबको छोड़कर पोर्तुगालोव ही, जिन्हें मैं हमेशा क्रेमलिन का प्रवक्ता समझता था, जर्मनी के एकीकरण के बारे में बात कर रहे थे. मैंने, स्वाभाविक है, कि चांसलर महोदय को तुरंत इस बारे में बताया. कहा, जब स्वयं मॉस्को ही जर्मनी के एकीकरण के बारे में सोचने लगा है, तो समय आ गया है कि हम भी इस बारे में सोचें.”

यानी, बर्लिन दीवार गिरने के बाद दोनों जर्मन देशों के क़ानूनी एकीकरण का विचार भी सभंवतः मिख़ाइल गोर्बाचोव का ही सुझाव था. 11 महीने बाद, 3 अक्टूबर 1990 को यह एकीकरण संपन्न हुआ. दूसरी ओर, 26 दिसंबर 1991 को गोर्बाचोव के अपने सोवियत संघ का अंत हो गया. उन्होंने बिना किसी वादे के जर्मनी का एकीकरण संभव बनाया. पर जर्मनी ने नाटो का विस्तार पूर्वी यूरोप या रूस की सीमा तक नहीं होने देने का अपना वादा कभी नहीं निभाया.

राजनीति में भलमनसाहत नहीं चलती. वह अक्सर ठगी जाती है और मूर्खता कहलाती है. गोर्बाचोव की भलमनसाहत इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. जर्मनी के एकीकरण का कम से कम 80 प्रतिशत श्रेय उन्हीं को मिलना चाहिये. पर आज वे राजनैतिक इतिहास के रंगमंच का एक ठगा हुआ दयनीय पात्र बन कर रह गये हैं. जो लोग भारत को पाकिस्तान के प्रति भलमनसाहत दिखाने का उपदेश देते हैं, वे भी इस कहावत को भुला देते हैं कि “होम करे सो हाथ जले.’’ होम करने से हमेशा पुण्य ही नहीं मिलता. अधिकतर अपना ही हाथ जलता है.