भारतीय न्यायिक इतिहास में केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य सबसे चर्चित मुकदमों में गिना जाता है. इसके द्वारा मूल रूप से यह निर्धारित किया जाना था कि संसद के पास संविधान संशोधन के असीमित अधिकार हैं या नहीं. केशवानंद मामला सरकार (इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार) और न्यायपालिका के टकराव की कुछ घटनाओं की परिणति था. इसकी शुरूआत गोलकनाथ बनाम पंजाब सरकार (1967) मामले से मानी जाती है. यहां सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया था कि कोई भी सरकार संशोधन के जरिए संविधान के अंतर्गत नागरिकों को मिले मूल अधिकारों में बदलाव नहीं कर सकती.

इसके बाद 1969 में इंदिरा गांधी सरकार ने बैंको का राष्ट्रीयकरण कर दिया, लेकिन इस मामले पर भी सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार के फैसले के एक बड़े हिस्से को पलट दिया. 1970 में प्रिवी पर्स (आज़ादी के समय की रियासतों के प्रमुखों को सरकार द्वारा कुछ नियत सुविधाओं की संवैधानिक गारंटी) समाप्त करने का फैसला हुआ तो इसे भी न्यायालय ने रद्द कर दिया. ये निर्णय सरकार के लिए शर्मिंदगी का कारण बन गए और आखिरकार उसने इन तीनों फैसलों को पलटने व न्यायपालिका पर अंकुश लगाने के लिए तीन संविधान संशोधन कर दिए.

इसी समय केरल के एक मठ प्रमुख केशवानंद ने इन संशोधनों को चुनौती देते हुए संसद की संविधान संशोधन संबंधी शक्ति तय करने के लिए एक याचिका दाखिल कर दी. इस केस पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने अंतिम आदेश में कहा कि किसी भी सरकार के पास संविधान संशोधन के अधिकार तो हैं लेकिन इससे संविधान की मूल भावना खंडित नहीं होनी चाहिए.

25 अप्रैल, 1973 को यह फैसला आया था और इसके अगले ही दिन सरकार ने जस्टिस अजित नाथ रे को सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर दिया. यह नियुक्ति रे को उनसे तीन वरिष्ठ जजों पर वरीयता देते हुए की गई थी. यह घटना भारत के न्यायिक इतिहास में काला अध्याय मानी जाती है क्योंकि तब पहली बार एक कनिष्ठ जज को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया था. इसके अलावा रे उन जजों में शामिल थे जिन्होंने केशवानंद मामले में आए फैसले का विरोध किया था. इसलिए उनकी नियुक्ति को देश भर में सरकार द्वारा न्यायपालिका पर कब्जे की तरह देखा गया. मुख्य जज की नियुक्ति के बाद से पूरे देश में वकीलों की बार काउंसिलों ने विरोध प्रदर्शन किए लेकिन सरकार अपने फैसले पर अडिग रही.

जस्टिस रे सिर्फ अपनी नियुक्ति की वजह से ही विवादित नहीं रहे. उन्होंने केशवानंद मामले में अदालत के निर्णय की समीक्षा के लिए एक खंडपीठ का गठन किया था जिसे बाद में भंग करना पड़ा. इसी तरह से आपातकाल के समय संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 22 के तहत मिले नागरिक अधिकारों (व्यक्तिगत स्वतंत्रता व अदालत में अपील का अधिकार) को निलंबित करने का फैसला भी जस्टिस रे की खंडपीठ ने ही किया था. इनके लिए भी वे हमेशा आलोचनाओं के शिकार हुए.