एक वैज्ञानिक बंधु से हिंदी कविता में अवां गार्द की अनुपस्थिति में परिवर्तन की स्थिति पर बात हो रही थी. उनके अनुसार, कविता में न हो पर, कम से कम तीन ऐसे क्षेत्र हैं जहां अवां गार्द हैं. पहला विज्ञान और तकनालजी में, दूसरा अर्थ और वित्त में और तीसरा नयी राजनीति में. विज्ञान और तकनालजी का अवां गार्द, मुख्यतः आर्टिफिशियल इन्टेलीजेन्स में, जहां धीरे-धीरे सोचने का काम मनुष्य से हटकर मशीन करने लगेगी. ऐसी कोशिश हो रही है कि मानवीय भाव भी मशीन महसूस और प्रगट करने लगे. इस तकनालजी का उपयोग कर अर्थ-वित्त के क्षेत्र में कुछ लोग इस तरह का नियोजन तैयार करने में लगे हैं जिसमें अर्थ-वित्त कुछ लोगों के हाथों में सीमित हो जायें. इसी तकनालजी का इस्तेमाल कर सारे संसार में नयी अधिकार-विरोधी, बंदिशों की हामी, किसी चमत्कारिक नेता पर केंद्रित राजनीति फैल रही है जो सारी राजनैतिक और क़ानूनी शक्ति फिर किसी समूह में एकत्र करेगी.

मैंने यह प्रतितर्क किया कि पहला तो अवां गार्द है क्योंकि वह नयी मानवीय संभावना सामने लगता है पर उसकी मूल्यमूढ़ता या मूल्य-निरपेक्षता उसे इस संभावना का अर्थ-वित्त और राजनीतिक के द्वारा दुरुपयोग की पूरी छूट दे रही है. स्थिति यह है कि तीनों मिलकर साहित्य और कलाओं को हाशिये पर डाल रहे हैं. अच्छा यह है कि कुल मिलाकर साहित्य अभी भी रेडिकल असहमति की जगह बना हुआ है. लेकिन उसे भी ज़्यादातर इन तीन बड़ी परिवर्तनकारी प्रवृत्तियों की ख़बर नहीं है. अगर है भी तो उसे उनसे किसी तरह का संवाद नहीं है. तकनालजी से ऐसे संवाद का अभाव साहित्य और समाज के हित में नहीं है.

यह बात भी उभरी कि मनुष्य जाति संसार में व्याप्त जीवन की निरन्तरता का अन्तिम लक्ष्य या मुक़ाम नहीं है. वह एक मुक़ाम भर है जो इस निरंतरता से कुछ अधिक ही विपथगामी हो गया है. वैज्ञानिक बंधु ने स्पष्ट किया कि अगर मानवीय जीवन समाप्त हो जाये और उसका कोई नामो-निशान संसार में न बचे तो भी जीवन अबाध चलता रहेगा क्योंकि वह मानव पर आधारित नहीं है.

फिर हमने इस पर विचार किया कि क्या तकनालजी और साहित्य-कलाओं के बीच भारत में एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में कोई संवाद शुरू किया जा सकता है. वह इस पर सीमित न हो कि तकनालजी साहित्य-कलाओं के लिए क्या कर सकती है बल्कि यह कि हम मिलकर मानवीय नियति के लिए क्या और कैसे कर सकते हैं. क्या हम तकनालजी के एक हिस्से को इस पर राज़ी कर सकते हैं कि वह मानवीय भविष्य और नियति के बारे में नये रचनात्मक ढंग से सोचे और अगर ऐसा सोच-विचार पहले से चल रहा है तो उसका हमसे साझा करे और उसे तेज़ तथा गहरा करे.

साहित्य और कलाएं मनुष्य की चिंता से ही उपजी हैं और वे किसी भी समय में इस चिंता से अपने को मुक्त या दूर नहीं कर सकतीं. क्या यह चिंता तकनालजी में भी दाखि़ल की जा सकती है? क्या वह सम्प्रेषण को अधिक तेज़ और सक्षम बनाने, गति और तेज़ करने आदि के अपने सरोकारों से अलग मानव जीवन को अधिक रचनात्मक, अधिक कल्पनाशील, अधिक सहानुभूतिमूलक, अधिक समतापरक, अधिक न्यायसम्मत, अधिक स्वतंत्र बनाने के उपक्रम में हिस्सेदार हो सकती है? जल्दी ही इस दिशा में कुछ ठोस क़दम हम उठा सकते हैं ताकि कम से कम संवाद संभव हो सके. सहकार तो बाद की बात है.

आत्मवृत्तांत के बहाने

पोलिश कवि अदम आयेवेस्की ने आत्मवृत्तान्त के बहाने अपनी आत्मकथा रस्मिया तौर पर नहीं लिखी है उसमें साहित्य, कविता, कवियों, अवान्तर, प्रसंगों आदि पर भी लिखा है जो उनकी अंग्रेज़ी में अनूदित पुस्तक ‘स्लाइट एवजेजेरेशन’ याने ‘थोड़ी अतिशयोक्ति’ को दिलचस्प और पठनीय बनाती है. न्यूयार्क के फ़रार स्ट्रॉस एण्ड जीरो ने प्रकाशित की है.

रूसी कवि ओसिप मंडलस्टाम के बारे में अदम लिखते हैं कि उनका प्रती कवादियों की धुंधली नीम रोशन दूसरी दुनिया में कोई यक़ीन नहीं था- उनका इसरार था उस ठोस सचाई पर जिसमें मनुष्य रहते हैं और वास्तुकला पर जो अंदरूनी और बाहरी दुनियाओं को जोड़ती है. कवि कोई पुरोहित नहीं था सिर्फ़ एक शिल्पकार, बुद्धिमान, बीच की दुनिया का स्वतंत्र स्वामी पर अदृश्य का सम्राट् नहीं. उन्हें आधुनिकता में उन आध्यात्मिक विटेमिन्स की तलाश थी, धीरज भरी, जो सचाई में मौजूद न थे.

अदम स्वयं एक जगह कहते हैं, ‘कविता मानवीय चेहरे जैसी होती है- वह एक चीज़ होती है जिसे नापा, बखाना, सूचीबद्ध किया जा सकता है पर वह एक अपील भी होती है. आप अपील पर ध्यान धर सकते हैं या उसकी अवहेलना कर सकते हैं. पर आप उसके छंद को नाप नहीं सकते. आप एक रूलर से किसी दीपशिखा की ऊंचाई नहीं माप सकते.’ अदम एक और जगह पाल क्लोदेल के हवाले से कहते हैं कि जो प्रशंसा करता है वह कभी ग़लत नहीं हो सकता. वे इस वाक्य को बेहद बासी और पुनरीक्षण के योग्य मानते हैं. लेकिन एक बुनियादी ढंग से आध्यात्मिक अर्थ में वह हमें बता रहा है कि प्रशंसा और उत्साह आलोचना, व्यंग आदि से कहीं ऊंचे होते हैं. विक्टर ह्यूगो ने यह पूछे जाने पर कि कविता लिखना कितना कठिन होता है कहा था कि जब आप उसे लिखते हैं तो आसान होता है पर जब आप नहीं लिख सकते तो वह असम्भव होता है.

अदम का एक इन्दराज़ है- ‘लेखक एक उच्चतर संसार के अस्तित्व में यक़ीन करता है पर वह उसे अपने देश, अपने परिवार या अपने दैनन्दिन जीवन में अस्तित्व में नहीं ला सकता है. अधिक से अधिक उसकी पुस्तकों के कुछ पृष्ठों में कोशिश दिखायी देती है, हमेशा विफल, हमेशा दोषपूर्ण, इस उच्चतर क्षेत्र को पाने की. लेकिन, बिना ऐसी कोशिशों के, लेखक अपने आप में नहीं निश्चय ही लेखक तक नहीं हो सकता.’ वे यह भी लिखते हैं- ‘संगीत हमें याद दिलाता है कि प्रेम क्या होता है. अगर तुम भूल गये हो कि प्रेम क्या है तो जाओ संगीत सुनो.’

अदम दार्शनिक सिओरान के हवाले से एक घटना बताते हैं- जब अंग्रेज़ी कवि डायलन टामस की उपस्थिति में उनकी एक कविता की व्याख्या किसी ने करने की कोशिश की तो उन्हें शरीर में मरोड़ होने लगी और उन्होंने अपने को फ़र्श पर फेंक दिया. एक जगह अदम लिखते हैं कि हम विशाल उपेक्षा के समय में रहते हैं, सिर्फ़ आतंककारी ही ऐसे हैं जो विचारों को गम्भीरता से लेते हैं. वे यह भी बताते हैं कि अंग्रेज़ी कवि-कथाकार डी एच लारेन्स ने प्रचलित यूटोपिया के बरक़्स एक विकल्प खोजने की कोशिश की और यह जताया कि हमें यूटोपिया तजने की दरकार नहीं है अगर हम संयम भी बरतें और उन्हें नाम देने की उत्कट इच्छा को रोक पायें. हमारी सदी नाम देने, नामों से आक्रान्त सदी है और शायद लेखक जो विकल्प रचते-गढ़ते हैं उसे कोई नाम नहीं देते और न ही उसके लिए कोई अनुयायी खोजते-पोसते हैं. शायद यह कहना ठीक होगा कि अब साहित्य नामहीन यूटोपियों का शरण्य है और हम आसानी से इस व्यापक नामहीनता को पहचान नहीं पाते.

वापसी

यह तो नहीं कहा जा सकता कि मुक्तिबोध की दो प्रसिद्ध कविताएं ‘भूल-ग़लती’ और ‘अंधेरे में’ कभी साहित्यिक चर्चा और ध्यान से बाहर हुई हैं. आज से 55 वर्ष पहले जब उनका पहला कविता-संग्रह भारतीय ज्ञानपीठ से ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’ नाम से प्रकाशित किया था तो पहली उसकी पहली कविता थी और दूसरी, 50 से अधिक पृष्ठों में फैली, आखि़री. दोनों ही जैसे कि मुक्तिबोध की कुछ और कविताएं भी इतने दशकों बाद भी बासी या पुरानी नहीं पड़ी हैं. यह कैसे सम्भव हुआ है इस पर विचार करना चाहिये.

कोई भी कवि, सच्चा और साहसी कवि, यह सोचकर कविता नहीं लिखता कि वह टिकाऊ या कालजयी होगी. सभी कवि अपने को, अपनी भाषा और समाज को, अपने समय को लिखते हैं. कुछ हैं जो इन सभी को याने आत्म, भाषा, समय और समाज को ऐसे जोड़-गूंथ लेते हैं कि वे सभी को एकसाथ लिख पाते हैं. यह सबके बस की बात नहीं होती. कुछ आत्मग्रस्त होकर रह जाते हैं, कुछ समाज या समयग्रस्त होकर. अगर मुक्तिबोध में यह दुर्लभ संयोग घटित हुआ तो इसकी एक बड़ी वजह थी उनकी प्रश्नवाचकता: वह उन्हें आत्म, समय, समाज, भाषा सभी को लगातार प्रश्नांकित करने ले जाती थी. एक और वजह थी या है: उनकी निपट अदम्य मानवीयता. यह मानवीय गरमाहट जो, समय के ख़ासे बदल जाने के बाद भी, धूमिल या शिथिल नहीं पड़ती.

इसका एक आशय यह भी है कि कविता का टिकाऊपन इस बात पर भी निर्भर करता है कि वह कितनी मानवीयता अपने में समेट-सहेज पाती है. हर बड़ा कवि हर समय में मानवीय बना रहता है- हम उसकी मानवीयता में अपनी अस्पष्ट अविवक्षित मानवीयता को स्पष्ट देख-पहचान पाते हैं. हर बड़ी कविता हमारी अधूरी मानवीयता को पूरा करती है. मुक्तिबोध, अज्ञेय, शमशेर आदि इसीलिए बड़े हैं और रहेंगे क्यों उनमें जाकर हमारी अपनी निजी और सामूहिक दोनों ही क़िस्म की मानवीयता, किसी हद तक, पूरी हो पाती है. इससेयह भी नतीजा निकलता है कि हमें साहित्य इसलिए चाहिये कि वह हमारी मानवीयता का एक ज़रूरी आयाम है. ऐसी मानवीयता जो हमारे आत्म और हमारी सामूहिकता दोनों को एक साथ झंकृत और सत्यापित करती है.