1-भारत ने फिलहाल क्षेत्रीय विस्तृत आर्थिक समझौते (आरसीईपी) से बाहर रहने का फैसला किया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि इस समझौते का फिलहाल जो प्रारूप है उसमें भारत के हितों का पूरी तरह ख्याल नहीं रखा गया है और इसलिए उनकी अंतरात्मा इसमें शामिल होने की इजाजत नहीं देती. इस पूरे मुद्दे पर द प्रिंट हिंदी पर आलोक जोशी का लेख.

भारतीय अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए आरसीईपी से बाहर रहना नहीं बल्कि अपनी प्रतिस्पर्धा बढ़ाना उपाय है

2-सूचना का अधिकार (आरटीआई) से जुड़े नए नियमों को लेकर काफी विवाद हो रहा है. विपक्षी दलों का आरोप है कि केंद्र सरकार ने इनके जरिये सूचना आयोग की स्वतंत्रता खत्म कर दी है. उधर, सरकार ने इन आरोपों को खारिज किया है. इस विवाद के बीच द वायर हिंदी पर पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त एम श्रीधर आचार्युलु की टिप्पणी.

आरटीआई के नए नियम सूचना आयुक्तों को सरकार की कठपुतली बनाने की कोशिश हैं

3-ऊंची आमदनी को कामयाबी की पहचान माना जाता है. दुनिया के ज्यादातर देशों में आप अगर किसी को अपनी भारी-भरकम तनख्वाह बताएं तो इससे आपका कद बढ़ता है. लेकिन स्वीडन इसका अपवाद है. यहां की एक परंपरा लोगों को इस बारे में बात करने से रोकती है. बीबीसी पर मैडी सैवेज की रिपोर्ट.

स्वीडन के लोग पैसे के बारे में बात क्यों नहीं करते

4- साधु-संन्यासी पिछले कुछ समय से समाचार चैनलों की परिचर्चा का स्थायी हिस्सा हो गए हैं. इनमें कुछ तो ऐसे हैं जिनकी पहचान कोई प्रवचन-उपदेश देकर नहीं बल्कि चैनलों पर आने से ही बनी है. न्यूजलॉन्ड्री हिंदी पर आयुष तिवारी की रिपोर्ट.

टीवी चैनलों के स्थायी नागरिक बन चुके साधु कौन हैं?

4- माइक्रो ब्लॉगिंग साइट ट्विटर के जरिए आम लोग अपनी बात या विचार सार्वजनिक करते आए हैं लेकिन इन दिनों भारत में ट्विटर के खिलाफ दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक मुसलमान समुदाय के कई लोग मुहिम छेड़े हुए हैं. आखिर क्यों? डॉयचे वेले हिंदी पर आमिर अंसारी का लेख.

क्या ट्विटर जातिवादी है?