अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ चुका है. ऐतिहासिक रूप से सदियों से विवाद बने इस मसले का पटाक्षेप होता दिख रहा है. इस विवाद ने भारतीय समाज और राजनीति को बहुत गहरे से प्रभावित किया है. इस पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राजनीति-समाज किस तरह प्रभावित होंगे यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा. लेकिन, इस विवाद और उसके समांतर चलने वाली सियासत को पीछे मुड़कर देखने पर जरूर कुछ सबक लिए जा सकते हैं.

अयोध्या विवाद चुनावी राजनीति से होता हुआ सरकारों और फिर सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच गया. इस दरमियान विवादित ढांचा ढहाने जैसे वाकये भी हुए जिन्होंने पूरे देश को असहज कर दिया. देश सांप्रदायिक खांचों में बंटा नजर आने लगा. बहुत सारे विश्लेषक मानते हैं कि राजीव गांधी अगर अयोध्या में विवादित ढांचे का ताला नहीं खुलवाते तो विवाद अपने मौजूदा स्वरूप में नहीं पहुंचता. ऐसा मानने वालों की तर्क पद्धति अमूमन यूं रहती है कि न ताला खुलता, न शिलान्यास की नौबत आती और न ढांचा गिरता. इसकी वजह वे मुस्लिम तुष्टीकरण को मानते हैं.

वहीं, कुछ लोग यह भी मानते हैं कि राजीव गांधी इस विवाद को सुलझाना चाहते थे और इसी क्रम में उन्होंने कुछ फैसले लिए थे. लेकिन, बाद में वे सत्ता में नहीं रहे और अयोध्या मसले बिगड़ता चला गया. राजीव गांधी के समर्थक या उनसे सहानुभूति रखने वाले यह तर्क दें तो इसमें अचरज नहीं होना चाहिए. लेकिन अगर कोई दक्षिणपंथी हिंदूवादी विचारक-कार्यकर्ता राजीव गांधी को लेकर ऐसा कहे तो यह बात जरूर चौंकाती है.

बेल्जियम के रहने वाले भारतशास्त्री कोनराड एल्स्ट अपने सख्त हिंदूवादी विचारों के लिए जाने जाते हैं. आरएसएस और भाजपा के कई नेताओं से उनकी निकटता है और लालकृष्ण आडवाणी उन्हें ‘महान इतिहासकार’ मानते हैं. कई साल पहले केे अपने एक लेख में कोनराड एल्स्ट लिखते हैं कि राजीव गांधी का विवादित ढांचे का ताला खुलवाना और फिर वहां शिलान्यास की अनुमति देना एक व्यवहारिक और संतुलित फैसला था, लेकिन बाद में उनके उत्तराधिकारी वैसी अयोध्या नीति नहीं जारी रख सके.

अगर राजीव गांधी विवादित ढांचे का ताला नहीं खुलवाते तो क्या विवाद इतना व्यापक रूप अख्तियार नहीं करता? कोनराड एल्स्ट का इस बारे में मानना है कि मंदिर का ताला खुलवाने या न खुलवाने से इस विवाद में कोई मूलभूत अंतर नहीं पड़ता, लेकिन विवादित ढांचे का ताला खुलवाने का फैसला बताता है कि राजीव गांधी यह समझ गए थे कि अयोध्या मसले से देश के हिंदुओं की भावनाएं बहुत गहरे से जुड़ती जा रही हैं और अब उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती है. कोनराड एल्स्ट यह भी लिखते हैं विवादित ढांचे का ताला खुलवाकर राजीव ने उस पर हिंदू समुदाय की दावेदारी को सांकेतिक रूप से मान लिया था. दूसरी तरफ उन्होंने देश के मुस्लिम नेतृत्व को बातचीत और कुछ रियायतों के जरिये विश्वास में लेने की कोशिश भी शुरु की थी. लेकिन पहले उनके सत्ता से बाहर होने और फिर उनकी हत्या के चलते ये कोशिशें किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंच सकीं.

हालांकि कोनराड यह भी मानते हैं कि अगर राजीव गांधी ताला नहीं खुलवाते तो वे 1989 में भी शायद सत्ता में आ सकते थे और इस मसले को बेहतर तरीके से हल कर सकते थे. उनके ताला खुलवाने से भाजपा और उसके सहयोगियों को राम मंदिर बनाने का एक बड़ा मुद्दा मिल गया जिसने उसकी राजनीतिक ताकत को काफी बढ़ा दिया. दूसरी ओर इसी मुद्दे की वजह से कई मुस्लिम मतदाताओं ने 1989 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को छोड़कर जनता दल का दामन थाम लिया.

कोनराड एल्स्ट को अकादमिक जगत में दक्षिणपंथी सिरे पर खड़ा एक अति हिंदूवादी विचारक माना जाता है. अयोध्या विवाद में राजीव गांधी की भूमिका पर उनके ऐसे विचारों से कुछ सवाल जरूर उठते हैं. अपने प्रधानमंत्रित्वकाल में राजीव गांधी ने अयोध्या विवाद से जुड़े जो भी फैसले लिए वे महज राजनीतिक दांव-पेंच भर थे या वे इस मामले में पहल कर वाकई किसी सकारात्मक नतीजे पर पहुंचने की कोशिश कर रहे थे?

विवादित ढांचे का ताला खोलने के मसले पर आमतौर पर यह कहा जाता है कि राजीव ने यह अनुमति दी. हालांकि, तकनीकी तौर पर देखें तो यह फैजाबाद की जिला अदालत का फैसला था. लेकिन, यह महज इत्तेफाक नहीं था. न्यायपालिका के इस फैसले में विधायिका और कार्यपालिका की जो भी भूमिका हो सकती थी, उसका पूरा इस्तेमाल किया गया था.

राजीव गांधी ने ताला खुलवाने का फैसला मुस्लिम तुष्टीकरण के चलते लिया गया, इस तर्क को मानने वाले कहते हैं कि शाहबानो प्रकरण के कारण यह विचार बढ़ रहा था कि कांग्रेस मुस्लिम कट्टरपंथ को बढ़ावा दे रही है. इस वजह से हिंदुओं में काफी रोष था जिसे खत्म करने के लिए ताला खुलवाने का फैसला लिया. शाहबानो प्रकरण की गरमागरमी और अयोध्या में ताला खोलने का फैसला आगे-पीछे का था, इसलिए इस तर्क को बल मिल जाता है.

शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जब गुजारा भत्ता देने का फैसला किया तो शुरुआत में सरकार ने इसका समर्थन किया. तत्कालीन कांग्रेस सरकार में मंत्री आरिफ मोहम्मद खान ने इस फैसले के समर्थन में ऐतिहासिक भाषण भी दिया. लेकिन बाद में सरकार मौलवियों के दबाव में कदम पीछे खींचने लगी. नौबत यहां तक आ पहुंची कि उसने मुस्लिम संगठनों को आश्वासन दिया कि वह कानून बनाकर इस फैसले को पलटेगी. इसके बाद अयोध्या और कुछ अन्य मसलों को लेकर पहले से ही आक्रामक हिंदू समूहों को और आक्रामक होने का मौका मिल गया. विश्व हिंदू परिषद ने अयोध्या मसले को लेकर पूरे देश में रथ यात्राएं तेज कर दीं.

राजीव सरकार के लिए मुश्किलें बढ़ती जा रहीं थीं. हिंदुओं में गुस्सा सिर्फ इसलिए नहीं था कि शाहबानो प्रकरण में सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदलने के बारे में क्यों सोच रही है. हिंदूवादी संगठन इस बात पर जोर दे रहे थे कि सरकार अयोध्या विवाद पर कुछ नहीं कर रही है जबकि मुस्लिम समुदाय के लिए सुप्रीम कोर्ट का फैैसला बदला जा रहा है. शाहबानो प्रकरण इस लिहाज से उत्प्रेरक जरूर था, लेकिन नाराजगी के केंद्र में अयोध्या विवाद ही था. ऐसे में यह कहना कि अयोध्या में ताला खुलवाने का फैसला शाहबानो की प्रतिक्रिया में था आंशिक तौर पर ही सही लगता है.

80 के दशक में अयोध्या मसले पर वीएचपी के आंदोलन चलते ही रहते थे. लेकिन 1986 में एकाएक केंद्र की राजीव सरकार भी इस मसले पर सक्रिय हो गई. उस समय जिला अदालत में अयोध्या में ताला खुलवाने के लिए जब भी अर्जी डाली जाती थी प्रशासन व्यवस्था बिगड़ने का हवाला देता था और अर्जी खारिज हो जाती थी. यह तकरीबन हर साल का वाकया था. लेकिन, एक फरवरी, 1986 को ऐसा नहीं हुआ. ऐसी एक अर्जी पर फैजाबाद के तत्कालीन डीएम और एएसपी जिला अदालत में पेश हुए और कहा कि प्रशासन को ताला खुलने से कोई एतराज नहीं है. जानकार कहते हैं कि इस पूरे मामले को दिल्ली से निर्देशित किया जा रहा था और फैजाबाद के डीएम और एसपी को ऐसा करने के लिए कहा गया था. डीएम और एसपी के इस बयान के बाद फैजाबाद के जिला जज ने विवादित ढांचे का ताला खोलने का आदेश दे दिया. राज्य या केंद्र की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने इस फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में न जाने का फैसला तो किया ही, महज कुछ घंटे बाद ही इसे अमल में भी ला दिया गया.

कहा तो यह भी जाता है कि गोरक्षपीठ के तब के महंत अवैद्यनाथ के जरिये पहले राज्य की कांग्रेस सरकार ने वीएचपी को ही संदेशा भिजवाया था कि वह अयोध्या में ताला खोलने की अर्जी डाल दे. लेकिन, उसने इस मसले पर कोई जवाब नहीं दिया. वीएचपी अयोध्या में ‘ताला खोल या ताला तोड़’ आंदोलन की चेतावनी तो दे रही थी, लेकिन कांग्रेस सरकार पेशकश पर अमल करना उसके सियासी रूख के अनुकूल नहींं था. ऐसे में राज्य सरकार ने एक वकील उमेश चंद्र पांडेय से ताला खुलवाने की अर्जी डलवाई जिनके तार सियासी तौर पर कांग्रेस से ही जुड़े थे. उनकी अर्जी पर डीएम और एएसपी के बयानों के बाद ताला खुल गया.

आरिफ मोहम्मद खान अपने एक साक्षात्कार में कहते हैं कि प्रधानमंत्री राजीव गांधी से जब उन्होंने ताला खुलने के बाद स्थिति बिगड़ने और मुस्लिमों की नाराजगी की बात कही तो उन्होंने कहा कि ऐसा कुछ नहीं होगा. आरिफ मोहम्मद खान अपने वक्तव्यों में अक्सर इस बात की ओर इशारा करते हैं कि अयोध्या मेें ताला खोलने को लेकर राजीव गांधी और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के तत्कालीन अध्यक्ष अली मियां के बीच सहमति बन चुकी थी. इस सहमति के मुताबिक शाहबानो प्रकरण में सरकार सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट देगी, और इसके एवज में अयोध्या में ताला खुलने का मुस्लिम संगठन विरोध नहीं करेंगे. अली मियां ने अपने जीवनकाल में न कभी इस वाकये की न पुष्टि की और न खंडन किया. लेकिन, उन्होंने उस समय के बयानों में यह जरूर कहा कि मुस्लिमों को अयोध्या में ताला खुलने को इतना महत्व नहीं देना चाहिए क्योंकि बहुत सी मस्जिदें हैं जो गैर मुस्लिमों के कब्जे में हैं. उस समय पर्सनल लॉ बोर्ड ने अयोध्या में ताला खुलने के खिलाफ कोई आंदोलन भी नहीं चलाया.

एक फरवरी 1986 को अयोध्या का ताला खुला और पांच फरवरी को संसद में मुस्लिम महिला बिल पेश किया गया, जिसमें शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटकर कानून बनने वाला था. कांग्रेस के कुछ पुराने दक्षिणपंथी रूझान वाले नेता कहते हैं कि ज्यादा गहराई से जाने पर समझा जा सकता है कि शाहबानो मामले में नया कानून बनाने और कुछ प्रतीकात्मक चीजों के जरिये राजीव जी तत्कालीन मुस्लिम नेतृत्व को अयोध्या मसले पर चुप रहने के लिए मना चुके थे. हालांकि, बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी और कुछ दूसरे मुस्लिम संगठन ताला खुलने के मसले पर सरकार का विरोध कर रहे थे, लेकिन, अली मियां इन संगठनों की आलोचना कर रहे थे. अली मियां ने यहां तक कहा कि बाबरी मस्जिद कमेटी जिस किस्म से अयोध्या मसले पर आंदोलन कर रही है वह हिंदुओं को और प्रतिक्रियावादी बनाएगा जो मुसलमानों के हित में नहीं है.

कांग्रेस के एक अन्य वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘यह बात पूरी तरह से ठीक नहीं है कि शाहबानो प्रकरण की प्रतिक्रिया में राजीव गांधी ने अयोध्या में ताला खुलवाने का फैसला लिया. वे अयोध्या मामले के बारे में अलग से सोच रहे थे. उनकी कोशिश थी कि विवादित ढांचे पर मंदिर निर्माण का रास्ता निकाला जाए और मुस्लिम नेतृत्व को इस बात के लिए सहमत किया जाए कि वे मस्जिद को दूसरी जगह बना लें और इसको लेकर बिना वजह का तनाव न भड़के. इसके अलावा राजीव जी यह भी चाहते थे कि अयोध्या विवाद से वीएचपी को किसी तरह दूर किया जाए क्योंकि उसकी रूचि मसले को सुलझाने से ज्यादा इस मामले में भाजपा को राजनीतिक फायदा दिलाने की थी.’ वे आगे कहते हैं, ‘राजीव गांधी मुस्लिम नेतृत्व को पूरी तरह भले ही नहीं मना पाए, लेकिन बाबरी प्रकरण को लेकर मुसलमानों के बीच दो तरह की सोच जरूर हो गई थी. एक सोच अली मियां वाली थी तो दूसरी बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी वाले सैयद शहाबुद्दीन वाली. अगले चुनाव में राजीव गांधी सत्ता से बाहर हो गए और फिर उनकी हत्या हो गई वर्ना उनके दिमाग में इसकी पूरी रूपरेखा थी.’

कोनराड एल्स्ट भी अपने लेख में कुछ इससे मिलती-जुलती बात कहते हैं. वे लिखते हैं राजीव गांधी तत्कालीन मुस्लिम नेतृत्व की कई छोटी-छोटी मांगें मानकर अयोध्या जैसा बड़ा मसला सुलझाना चाहते थे जो हिंदुओं के लिए एक बड़ी धार्मिक पहचान के मुद्दे में तब्दील हो गया था. एल्स्ट लिखते हैं कि इन मांगों में हज सब्सिडी से लेकर सलमान रश्दी की किताब सेटेनिक वर्सेज पर प्रतिबंध जैसी चीजें थीं. एल्स्ट यह भी लिखते हैं कि ताला खुलवाने के साथ ही यह तय हो गया था कि एक तरह से वहां हिंदू दावेदारी मान ली गई है जो इस विवाद के अंतिम फैसले की दिशा भी तय करने वाला था.

कोनराड एल्स्ट कहते हैं कि ताला खुलने के बाद लिबरल और वामपंथी विचारकों के रूख ने मसले को और उलझा दिया. एल्स्ट के मुताबिक पहले इस बात को लेकर एक तरह की सहमति थी कि विवादित ढांचा एक मंदिर था जिस पर सदियों पहले एक मस्जिद बनी थी. इसे 1880 के दशक में अदालत की कार्यवाही के दौरान मुस्लिम पक्ष और अंग्रेज शासकों ने भी माना था. लेकिन उनका मानना था कि चूंकि ऐसा सदियों पहले हुआ था इसलिए इस पर हिंदुओं के दावे को मानना सही नहीं है. अपने लेख में एल्स्ट यह भी कहते हैं कि सैंकड़ों सालों से मस्जिद के इर्द-गिर्द हिंदू समुदाय पूजा-अर्चना कर रहा था और उसके लिए इस स्थान की बहुत खास अहमियत थी जबकि मुस्लिम समुदाय के मामले में ऐसा नहीं था.

लेकिन वामपंथी विचारकों का कहना था कि वहां कभी मंदिर था ही नहीं. कोनराड एल्स्ट के मुताबिक राजीव गांधी के बाद इसी वामपंथी रूख को कांग्रेस का पक्ष माना जाना लगा और फिर पार्टी कभी खुद को इससे अलग नहींं दिखा पाई, जिसका अंततः कांग्रेस को नुकसान ही हुआ.

एल्स्ट कट्टर हिंदूवादी विचारक हैं. लेकिन फिर भी वे अयोध्या के मसले पर राजीव गांधी के जमाने की कांग्रेस को और उनके बाद की कांग्रेस से अलग रूख रखने वाला मानते हैं तो यह गौर करने वाली बात है. अयोध्या में ताला खुलने के बाद राजीव सरकार के दौरान ही शिलान्यास भी हुआ और अपने चुनावी अभियान की शुरूआत भी राजीव गांधी ने अयोध्या से ही की. उन्होंने चंद्रशेखर की अल्पमत की सरकार के दौरान एक चर्चा का भी आयोजन करवाया जिसे एल्स्ट मानते हैं कि अयोध्या पर हिंदू दावे को ही और मजबूत करने के लिए ही आयोजित किया गया था. कहा जाता है कि इस दौरान उन्होंने कुछ हिंदू नेताओं से यह भी पेशकश की थी कि अयोध्या में मंदिर निर्माण सरकार करवाएगी, लेकिन विश्व हिंदू परिषद को इससे दूर रहना होगा. इस प्रस्ताव में यह भी शर्त रखी गई थी कि ढांचे को गिराया नहीं जाएगा. बल्कि वह प्रस्तावित मंदिर के नीचे ही रहेगा. इसके लिए हिंदू नेताओं को यह कहकर समझाया गया था कि ढांचे का निर्माण इतना जर्जर है कि कुछ दिनों के बाद यह खुद गिर जाएगा.

लेकिन, हिंदू संगठनों पर वीएचपी तेजी से अपना प्रभाव बढ़ा रही थी और राजीव अगला चुनाव हार भी गए. ऐसे में यह प्रस्ताव, प्रस्ताव ही रह गया. कोनराड एल्स्ट के मुताबिक इस तरह के प्रस्तावों पर आने वाली मुस्लिम प्रतिक्रिया को संभालने के लिए भी राजीव गांधी के दिमाग में कुछ न कुछ रहा होगा. उनके मुताबिक उस समय की कांग्रेस ऐसे मसलों को कुछ ले-देकर हल करने में सिद्धहस्त थी.

आज राजीव गांधी नहीं हैं. इन सब बातों के ठोस जवाब नहीं मिल सकते. राजीव गांधी सियासी व्यक्ति थे तो उनके फैसलों के पीछे राजनीतिक संभावनायें तो रही ही होंगी. लेकिन, राजीव गांधी अयोध्या मुद्दे के हल के बारे में गंभीरता से सोच रहे थे, इससे साफ तौर पर इनकार भी नहीं किया जा सकता है. राजीव के ताला खुलवाने या शिलान्यास की अनुमति देने और मुस्लिम नेताओं को मनाने की कोशिशों में तो यह झलकता ही है.