2013 में राजस्थान सरकार ने नर्सिंग (ग्रेड-2) के 15,773 पदों के लिए भर्ती निकाली थी. बाद में इन पदों को घटाकर 11,259 कर दिया गया. इनमें से भी 100 पदों को विशेष परिस्थिति के लिए ऐहतियातन खाली रखा गया. आम भर्तियों की तरह नर्सिंग ग्रेड-2 में भी शारीरिक रूप से अशक्त लोगों के लिए तीन फीसदी (2016 के बाद चार फीसदी) यानी 338 पद आरक्षित होने चाहिए थे. लेकिन चिकित्सा विभाग ने इन पदों की संख्या 334 तय की.

2015 तक इस भर्ती के सभी चरण, जैसे डॉक्युमेंट वेरिफिकेशन और मेडिकल टेस्ट पूरे कर लिए गए और चयनित अभ्यर्थियों की सूची सार्वजनिक कर दी गई. लेकिन राजस्थान की अधिकतर भर्तियों की तरह इस पर भी किन्हीं कारणों से कोर्ट ने स्टे लगा दिया. साल भर बाद चिकित्सा विभाग ने चुने गए 11,028 अभ्यर्थियों की नई सूची निकाली. लेकिन इसमें पिछली सूची के ऐसे कई अभ्यर्थियों के नाम ही नहीं थे जो या तो दोहरी विकलांगता (किन्हीं दो अंगों, जैसे दोनों पैरों में खराबी होना) से ग्रस्त थे या फिर जिनके अपर लिंब (कमर से ऊपरी अंगों, जैसे हाथ) में परेशानी थी. ऐसे अभ्यर्थियों की संख्या 91 बताई गई.

दरअसल, राजस्थान के चिकित्सा विभाग ने इस भर्ती की अधिसूचना में ही स्पष्ट कर दिया था कि नर्सिंग के लिए सिर्फ़ ओएल (वन लेग) यानी एक पैर में खराबी वाले अभ्यर्थी ही उपयुक्त माने जाएंगे. चिकित्सा विभाग ने ये मापदंड ‘सामाजिक न्याय एवं सशक्तिकरण मंत्रालय भारत सरकार’ द्वारा विभिन्न सरकारी नौकरियों के लिए जरूरी शारीरिक योग्यता के संदर्भ में जारी किए गए निर्देशों के आधार पर तय किए थे.

लेकिन नर्सिंग भर्ती से बाहर निकाले गए अभ्यर्थियों में से कई इन निर्देशों और चिकित्सा विभाग के फैसले को अपने साथ हुए अन्याय के तौर पर देखते हैं. हनुमानगढ़ निवासी पूजा कुमारी भी इनमें से एक हैं. उनकी पीठ में टेड़ापन (कूबड़) है. सत्याग्रह से हुई बातचीत में पूजा कुमारी बताती हैं कि जिस कॉलेज से उन्होंने जनरल नर्सिंग मिडवाइफरी (जीएनएम) की पढ़ाई की वह इंडियन और राजस्थान मेडिकल काउन्सिल से मान्यता प्राप्त था. ऐसे संस्थानों से डिग्री/डिप्लोमा करने वाले शिक्षार्थियों को कानूनन पेशेवर दक्ष माना जाता है.

‘यदि हम लोग नर्सिंग के काम के लिए उपयुक्त नहीं थे तो हमें इसकी पढ़ाई की अनुमति ही क्यों दी गई? पूरे कोर्स के दौरान हमने प्रदेश के अलग-अलग प्रतिष्ठित अस्पतालों में जाकर 400 घंटे की प्रेक्टिकल ट्रेनिंग ली और वहां सेवाएं भी दीं, तब तो हमारे काम में कोई कमी नहीं पाई गई. लेकिन जिंदगी के तीन महत्वपूर्ण साल और लाखों रुपए खर्च करवाने के बाद हमें अयोग्य घोषित कर दिया गया है. अब हम लोग क्या करें और कहां जाएं!’ यह सवाल पूछते वक़्त पूजा की फ़िक्र उनके चेहरे पर साफ झलकती है.

नर्सिंग भर्ती से बाहर कर दिए गए अभ्यर्थियों में इंतेजाम अली भी शामिल हैं. वे एक हाथ (वन आर्म- ओए) से विकलांग हैं. दिलचस्प बात यह है कि अली इस समय केंद्र और राज्य सरकार की साझेदारी में चलाए जा रहे राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) में जीएनएम के तौर पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. अली का कहना है कि जब तक वे काफी कम मानदेय और संविदा पर एनआरएचएम में कार्यरत हैं, किसी को आपत्ति नहीं है. लेकिन जब उन्हें अपनी काबिलियत के बूते स्थायी नौकरी करने का मौका मिला तो उन्हें जान-बूझकर अयोग्य घोषित कर दिया गया है.

इन दिव्यांग अभ्यर्थियों का पक्ष लेते हुए राजस्थान हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता तनवीर अहमद हमें बताते हैं कि नौकरियों के लिए शारीरिक योग्यता के संबंध में भारत सरकार द्वारा जारी किए गए दिशा-निर्देश संपूर्ण नहीं हैं और उनमें कई सुधारों की गुंजाइश है. अहमद इस बात को ‘न्यायालय मुख्य आयुक्त दिव्यांगजन (कमिश्नर ऑफ कोर्ट फोर डिसेबल्स) नई दिल्ली’ के एक फैसले के आधार पर कहते हैं.

सरकारी नियुक्तियों से जुड़े विवादों के जानकार अहमद आगे जोड़ते हैं, ‘नर्सिंग जैसी नौकरियों के दायरे में हेल्थ ट्यूटर या वार्ड अटेंडेट जैसे पचासों तरह के वैकल्पिक कार्यभार आते हैं जिन्हें विकलांग अभ्यर्थी बखूबी संभाल सकते हैं. नि:शक्त व्यक्ति अधिकार अधिनियम- 2016 के तहत किसी विशेष जिम्मेदारी को संभाल पाने में असमर्थ अभ्यर्थी को वैकल्पिक कार्यभार दिए जाने का प्रावधान है. यही नियम उन कर्मचारियों के लिए भी मान्य है जो नौकरी के दौरान दुर्घटनावश विकलांग हो जाते हैं. लेकिन चिकित्सा विभाग के अधिकारियों ने न सिर्फ़ मानवीय संवेदनाओं बल्कि कानून को भी ताक पर रख दिया.’

नि:शक्तजनों के हक़ के लिए लड़ने वाली सामाजिक कार्यकर्ता प्रतिभा भटनागर ‘ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस’ (एम्स) की एक गाइडलाइन के हवाले से बताती हैं कि ऐसा कोई भी अभ्यर्थी जो चयन परीक्षा उतीर्ण कर चुका है और कुछ शारीरिक आवश्यकताओं, जैसे बैठने, खड़े होने, चलने, देखने, पढ़ने, लिखने और संप्रेषण में सक्षम है, उसे दोहरी विकलांगता या अपर लिंब में खराबी के आधार पर नर्स की नौकरी से वंचित नहीं रखा जा सकता.

राजस्थान सरकार द्वारा दिव्यांगों के हितों के लिए गठित की गई एक उच्चस्तरीय कमेटी की सदस्य रह चुकीं प्रतिभा भटनागर अपनी बात के पक्ष में उत्तर प्रदेश समेत ऐसे कई राज्यों का उदहारण देती हैं जहां दोहरी विकलांगता वाले अभ्यर्थियों को जीएनएम के पद पर नियुक्त किया जाता रहा है.

एक बार चुनकर दिव्यांग अभ्यर्थियों को अयोग्य घोषित करने के चिकित्सा विभाग के फैसले को जो बातें प्रमुखता से कटघरे में खड़ा करती हैं, उनमें उसी के द्वारा गठित चार अलग-अलग मेडिकल बोर्डों की रिपोर्टें भी शामिल हैं. इनमें से पहले बोर्ड का गठन भर्ती परीक्षा की शुरुआत में ही अभ्यर्थियों की शारीरिक दक्षता जांचने के लिए किया गया था. इस बोर्ड ने अपनी जांच में उन सभी अभ्यर्थियों को नर्स का काम करने के लिए पूरी तरह सक्षम माना जिनका नाम पहली चयनित सूची में शामिल था.

दूसरे मेडिकल बोर्ड का गठन तब किया गया जब भर्ती से बाहर कर दिए गए अभ्यर्थियों ने विरोध प्रदर्शन शुरु कर दिए. इस बोर्ड ने पहले बोर्ड से अलग रिपोर्ट तैयार की और चिकित्सा विभाग के फैसले पर अपनी मुहर लगाते हुए इन अभ्यर्थियों को अयोग्य घोषित कर दिया.

एक बार को यदि दूसरे मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट को सही मान भी लिया जाए तो यहां एक सवाल नया यह उठता है कि इस भर्ती में जिन दिव्यांग अभ्यर्थियों का चयन किया गया, क्या वे सभी चिकित्सा विभाग के “पैमाने” पर पूरी तरह खरे उतरते थे? इस बारे में जब प्रभावित अभ्यर्थियों ने जानकारी जुटानी चाही तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए. इनकी शुरुआत इस भर्ती में योग्य और अयोग्य माने गए दिव्यांग अभ्यर्थियों की संख्या से ही होती है.

शिकायत मिलने पर जब राजस्थान सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने चिकित्सा विभाग से इस भर्ती से जुड़े आंकड़े मांगे तो उसने दूसरी सूची से बाहर किए गए प्रार्थियों की संख्या 91 बताई (जैसा कि हमने रिपोर्ट में ऊपर ज़िक्र किया है). जबकि बाद में सूचना आयोग के समक्ष जानकारी देते समय चिकित्सा विभाग ने यह आंकड़ा 76 बताया और उसमें से भी सिर्फ़ 59 की जानकारी उपलब्ध करवाई. (आंकड़ों में इस अंतर की संभावित वजह हम आगे जानेंगे)

चिकित्सा विभाग द्वारा बताई गई नर्सिंग भर्ती से अचयनित अभ्यर्थियों की अलग-अलग संख्या

इसी दौरान प्रभावित अभ्यर्थियों ने अपनी फरियाद लेकर न्यायालय मुख्य आयुक्त दिव्यांगजन, जयपुर का भी रुख किया. यहां एक सुनवाई में चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के तत्कालीन निदेशक ने नर्सिंग भर्ती - 2013 में चुने गए 327 दिव्यांग अभ्यर्थियों की सूची उपलब्ध करवाई. लेकिन इसमें दो अभ्यर्थियों के नाम दो बार लिखे गए थे. इस लिहाज से इस भर्ती में 325 दिव्यांगों को नियुक्ति मिली.

लेकिन जब आरटीआई के जरिए इस बारे में विस्तृत जानकारी जुटाने की कोशिश हुई तो तीन अलग-अलग दरख़्वास्तों के जवाब में चुने गए दिव्यांग अभ्यर्थियों की संख्या क्रमश: 325, 315 और 324 बताई गई. दिलचस्प बात यह भी थी कि चिकित्सा विभाग की तरफ़ से मिले इन तीन जवाबों में कुल 28 अभ्यर्थी ऐसे थे जिनका नाम और विवरण किसी एक सूची में था और किसी एक में नहीं. आम बोलचाल की भाषा में समझें तो चिकित्सा विभाग ने हर बार जानकारी देते समय अपनी मर्जी और सहूलियत से कुछ नए दिव्यांग अभ्यर्थी पैदा कर दिए और कुछ पुराने ख़त्म.

लेकिन यह तो नर्सिंग भर्ती-2013 में हुई अनियमितताओं की बस बानगी भर थी. आरटीआई के जवाब में चिकित्सा विभाग ने जो दस्तावेज़ साझा किए उनके अनुसार चुने गए दिव्यांग अभ्यर्थियों में से कई अयोग्य घोषित किए गए अभ्यर्थियों की ही तरह दोहरी विकलांगता से ग्रस्त थे. इनमें से कुछ के अपर लिंब में परेशानी थी, कुछ चालीस प्रतिशत से कम विकलांग थे, कुछ के विकलांगता प्रमाण पत्र मेडिकल बोर्ड द्वारा सत्यापित नहीं थे तो कुछ अभ्यर्थी ऐसे भी थे जिनकी नियुक्ति ओबीसी/एससी/एसटी कैटेगरी में हुई, लेकिन आरटीआई के जवाब में उन्हें विकलांगता कोटे में चयनित बताया गया ताकि दिव्यांग अभ्यर्थियों की गिनती ज्यादा से ज्यादा बताई जा सके. ऐसे कुल अभ्यर्थियों की संख्या 30 से ज्यादा है.

इस भर्ती से जुड़ी एक गड़बड़ यह भी थी कि इसमें विशेष पिछड़ा वर्ग (एसबीसी) यानी गुर्जर समुदाय से ताल्लुक रखने वाले 210 से ज्यादा अभ्यर्थियों का चयन किया गया. जबकि एसबीसी के लिए तय एक प्रतिशत आरक्षण के हिसाब से इस श्रेणी में सिर्फ़ 102 अभ्यर्थी ही लिए जा सकते थे. गौरतलब है कि नर्सिंग भर्ती-2013 के समय एसबीसी वर्ग से ही ताल्लुक रखने वाले एक अधिकारी चिकित्सा विभाग में बड़े पद पर थे. हाल ही में उन्हें एसीबी ने एक अन्य मामले में बड़े भ्रष्टाचार का दोषी माना है. इस रिपोर्ट लिखे जाने तक वे फ़रार चल रहे थे.

इस पूरे घटनाक्रम के बीच प्रभावित दिव्यांग अभ्यर्थियों में से चार - प्रेम कुमारी, मनोहर सिंह, अमृत लाल और नटवर लाल शर्मा - अपनी गुहार लेकर राजस्थान के तत्कालीन चिकित्सा मंत्री राजेंद्र राठौड़ के पास भी पहुंचे. मामले की गंभीरता देखते हुए राठौड़ ने एक बार फ़िर इनका मेडिकल करवाने और मामले की जांच के लिए ‘राजस्थान नि:शक्त व्यक्ति अधिनियम 2011’ की धारा 38-2 (ब) के तहत एक कमेटी गठित करने का आदेश दिया.

इस बार गठित हुए तीसरे मेडिकल बोर्ड ने इन चारों अभ्यर्थियों को पहले बोर्ड की ही तरह नर्स का काम करने में पूरी तरह सक्षम माना. विशेष कमेटी के सदस्यों ने भी नए बोर्ड की रिपोर्ट से सहमति जताते हुए चिकित्सा विभाग से इन चारों को नियुक्ति दिए जाने की अनुशंसा की. लेकिन इसके कुछ दिन बाद राजेंद्र राठौड़ को चिकित्सा की जगह ग्रामीण विकास मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंप दी गई और यह प्रक्रिया ठंडे बस्ते में चली गई.

प्रभावित अभ्यर्थियों में से एक प्रेम कुमारी को नर्सिंग भर्ती से जुड़े पहले बोर्ड ने जीएनएम का काम करने में सक्षम, दूसरे मेडिकल बोर्ड (बांयें) ने अयोग्य और बाद में गठित तीसरे बोर्ड ने प्रेम कुमारी को एक बार फ़िर इस काम में सक्षम माना था

अब इन अभ्यर्थियों को सिर्फ़ कमिश्नर कोर्ट का आसरा था. तीसरे मेडिकल बोर्ड और 38-2 (ब) के तहत गठित कमेटी की रिपोर्ट के मद्देनज़र अदालत ने अक्टूबर-2016 में इन चारों अभ्यर्थियों को तुरंत नियुक्ति देने के आदेश दिए. इस फैसले से बाकी अभ्यर्थियों के लिए भी राह खुलने की उम्मीद जगी. लेकिन अदालत के आदेश की पालना नहीं हुई. गौरतलब है कि 2016 से 2018 के बीच कमिश्नर कोर्ट ने इन चार अभ्यर्थियों की नियुक्ति को लेकर चिकित्सा विभाग को एक या दो बार नहीं बल्कि आठ बार आदेश दिया जिसे हर बार अनसुना कर दिया गया.

चिकित्सा विभाग के रवैये से तंग आकर भर्ती परीक्षा से बाहर कर दिए गए अभ्यर्थी अप्रैल-2018 से अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ गए जो कि 84 दिन तक चला. मामले को बढ़ता देख विभाग के अधिकारियों ने भी दूसरी बार में चुने गए 38 विकलांग अभ्यर्थियों का फ़िर से मेडिकल करवाने की ठानी. जल्दबाजी में उठाया गया यही कदम इस भर्ती से जुड़ी सबसे बड़ी अनियमितता सामने लेकर आया. इस नए और चौथे मेडिकल बोर्ड ने अपनी जांच में उन सभी 38 अभ्यर्थियों को जीएनएम पद के लिए उपयुक्त पाया. लेकिन सूचना के अधिकार के तहत निकाली गई इन अभ्यर्थियों की मेडिकल रिपोर्ट हैरान करने वाली थी.

चौथे मेडिकल बोर्ड ने 38 में से दस ऐसे अभ्यर्थियों को सिर्फ़ एक पैर (वन लैग/ओएल) से विकलांग घोषित किया जिन्हें सबसे पहले मेडिकल बोर्ड ने दोहरी विकलांगता से ग्रस्त माना था. यानी चिकित्सा विभाग ने ढाई साल से भी कम समय में अपनी पसंद के अभ्यर्थियों के एक अंग की विकलांगता ही ख़त्म कर दी थी. यही नहीं, इन 38 में से पच्चीस से ज्यादा अभ्यर्थी ऐसे थे जिन्हें चिकित्सा विभाग ने भर्ती के लिए अनुपस्थित-अपात्र घोषित किया था. यानी कि विभाग ने पहली बार में चुने हुए अभ्यर्थियों को बाहर निकालकर ऐसे लोगों को नियुक्ति दे दी जिन्होंने भर्ती परीक्षा ही नहीं दी थी. इस बारे में सिर्फ़ कयास लगाए जा सकते हैं कि किसी सरकारी भर्ती में ऐसी गड़बड़ आख़िर क्यों हुई होगी!

इस मामले में लगातार संघर्ष कर रहे चार अभ्यर्थियों में से एक प्रेम कुमारी बताती हैं कि चिकित्सा विभाग के उच्चाधिकारियों से परीक्षा से अनुपस्थित रहे अभ्यर्थियों को नौकरी देने का ज़िक्र करते ही विभाग की वेबसाइट से इस भर्ती से जुड़ी अधिकतर जानकारियां हटा ली गईं. प्रभावित अभ्यर्थियों का यह आरोप भी है कि इस सबके बाद कुछ और नए दिव्यांग अभ्यर्थियों का चयन किया गया. लेकिन उन्हें एक-एक, दो-दो करके नौकरी दी गई ताकि ज्यादा हो-हल्ला न होने पाए. साथ ही इन अभ्यर्थियों की नियुक्ति से जुड़ी जानकारी भी विभाग की वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं करवाई गई.

दूसरी बार में अयोग्य घोषित कर दिए गए अभ्यर्थियों का आरोप है कि इस भर्ती में दिव्यांगों के लिए आरक्षित पदों में से भरे जा चुके और खाली पड़े पदों की सही संख्या को इसलिए ही छिपाने की कोशिश की गई ताकि कुछ और नियुक्तियों की बंदरबांट की जा सके.

2015 में गठित मेडिकल बोर्ड ने पहले एक अभ्यर्थी को अपर और लोअर लिंब से विकलांग माना था (बांयी तरफ़ लाल घेरे में) जबकि बाद में गठित चौथे मेडिकल बोर्ड ने उसी अभ्यर्थी के सिर्फ़ एक पैर में नि:शक्तता (दांयी तरफ़ लाल घेरे में) घोषित की

जब चिकित्सा विभाग ने इस पूरे मामले में अपने ही उपविधि परामर्शी (कानूनी मामलों को देखने वाले अधिकारी) से सलाह ली तो उन्होंने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि ‘इस भर्ती में तय पात्रता से अलग नि:शक्तता रखने वाले अभ्यर्थियों को नियुक्ति दी गई... राज्य सरकार ने जब चिकित्सा विभाग से इस बारे में जानकारी चाही तो विभाग द्वारा सरकार को गुमराह करने का प्रयास किया जाना प्रतीत हुआ.’

हालांकि उपविधि परामर्शी की रिपोर्ट में अनुपस्थित अपात्र अभ्यर्थियों का ज़िक्र नहीं मिलता, लेकिन इसमें यह स्पष्ट तौर पर लिखा है कि ‘...चयन प्रक्रिया पर लिटिगेशन (कानूनी चुनौती) से इन्कार नहीं किया जा सकता है जिसके लिए गलत चयन करने में सम्मिलित एवं सरकार को गुमराह करने वाले अधिकारियों के उत्तरदायित्व के निर्धारण की आवश्यकता होगी.’

नर्सिंग भर्ती -2013 में हुए अनियमितताओं के संदर्भ में चिकित्सा विभाग के उपविधि परामर्शी की टिप्पणी

वर्तमान स्थिति की बात करें तो 2018 में चिकित्सा विभाग की तरफ़ से नर्स ग्रेड-2 की एक और भर्ती आ चुकी है. इसमें एक बार फ़िर वन लैग (ओएल) का नियम लगाकर इन अभ्यर्थियों को परीक्षा के योग्य नहीं माना गया. नतीजतन ये अभ्यर्थी अब भी अपने हक़ के लिए संघर्षरत हैं.

इस मामले में जब सत्याग्रह ने कुछ दिव्यांग अभ्यर्थियों से यह पूछा कि ‘इस भर्ती में अनियमितता का अंदेशा लगने के बावजूद इतनी देर से आवाज क्यों उठाई गई?’ तो इसका जवाब कुछ यूं मिला - ‘अव्वल तो सारी जानकारी हमें तीन साल में धीरे-धीरे मिली जिसे समझने में काफ़ी वक़्त लग गया. दूसरे हम घर-परिवार वाले शरीर से कमजोर लोग हैं. हमें कई तरह के डर थे जिनके चलते जुबान खोलने से झिझकते रहे. लेकिन अब हमने तय कर लिया है कि चुप नहीं बैठेंगे.’

इस पूरी मुहीम में सबसे ज्यादा सक्रिय रहे अभ्यर्थियों का यह कहना है कि जब से उन्होंने इस मामले को उजागर किया है, तभी से उन्हें ऐसा महसूस होता है कि कुछ लोग उनके पीछे लगे हुए हैं. इन लोगों की बात को इससे भी बल मिलता है कि 84 दिनों के धरने के दौरान बाइक पर सवार दो नकाबपोशों ने दस्तावेजों से भरा इनका बैग चुरा लिया था. संयोग से इन दस्तावेजों की एक प्रति पहले ही सुरक्षित रख ली गई थी.

सत्याग्रह से हुई बातचीत में राजस्थान के मौजूदा चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री रघु शर्मा जल्द ही मामले की जांच शुरु करने और उसके सही पाए जाने पर दोषी अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का आश्वासन देते हैं. वहीं, चिकित्सा विभाग में हाल ही में नियुक्त हुए एक उच्चाधिकारी पिछली सरकार का मामला होने की बात कहकर इससे अनभिज्ञता जाहिर करते हैं. लेकिन नियमों के हवाले से वे यह भी कहते हैं कि ‘नई भर्ती के आ जाने पर पुरानी भर्ती की फाइल पूरी तरह बंद हो जाती है. विशेष परिस्थिति को छोड़कर उसे वापिस खोला जाना मुश्किल है.’

(इस रिपोर्ट में जिन दस्तावेज़ों का जिक्र किया गया है, वे अभ्यर्थियों ने ही उपलब्ध करवाये हैं. सत्याग्रह इनकी सत्यता की अलग से पुष्टि नहीं कर सका है.)