मध्यपूर्व के देश लेबनान में सरकार विरोधी प्रदर्शन रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं. बीते 17 अक्टूबर को शुरू हुए इन प्रदर्शनों के दबाव में 29 अक्टूबर को लेबनान के प्रधानमंत्री साद अल-हरीरी ने इस्तीफा दे दिया. हरीरी का कहना था कि वे बीते साल अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के वादे के साथ सत्ता में आये थे, लेकिन इसे पूरा नहीं कर सके और अब जनता के रुख को देखते हुए अपना पद छोड़ रहे हैं. लेकिन प्रधानमंत्री के इस्तीफे के बाद भी प्रदर्शनकारी सड़कों पर डटे हुए हैं. ख़ास बात यह भी है कि इन प्रदर्शनों में लोगों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है.

वॉट्सएप के लिए हुए प्रदर्शन आंदोलन में कैसे बदल गये?

बीते अक्टूबर में लेबनान में सरकार विरोधी प्रदर्शन तब शुरू हुए जब वहां की सरकार ने वाट्सएप यूजर्स से हर महीने छह डॉलर का टैक्स लेने का फैसला किया. सरकार का कहना था कि पिछले दिनों लेबनान के जंगलों में जो आग लगी थी उसमें हजारों एकड़ जंगल और फसलों का नुकसान हुआ है, वाट्सएप यूजर्स से टैक्स लेकर इस नुकसान की भरपाई की जाएगी. सरकारी अधिकारियों का कहना था कि देश की आर्थिक हालत सही न होने के चलते यह फैसला लिया गया है.

सरकार का यह फैसला लेबनानी जनता खासकर युवा वर्ग के लिए किसी झटके से कम नहीं था. इसके बाद राजधानी बेरुत में इसके विरोध में प्रदर्शन शुरू हुए और कुछ घंटों बाद यहां के कई और शहरों के युवा सड़कों पर आ गए. हालांकि, प्रदर्शनों के कुछ घंटे बाद ही सरकार ने वाट्सएप टैक्स संबंधी अपना फैसला वापस ले लिया, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी. इसके बाद प्रदर्शनकारियों ने बेरोजगारी और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे उठाने शुरू कर दिए. उन्होंने सत्ता में बैठे लोगों से भी इस्तीफा देने की मांग की. युवा प्रदर्शनकारियों की इन मांगों ने हर उम्र के लोगों को इन प्रदर्शनों से जोड़ दिया.

लेबनानी मीडिया के मुताबिक अमेरिकी प्रतिबंधों और कुछ अन्य वजहों से देश की आर्थिक स्थिति बीते कुछ सालों से काफी खराब हैं. ऊपर से बेरोजगारी और भ्रष्टाचार ने भी लोगों को परेशान कर रखा है. जानकारों के मुताबिक बीते साल हुए चुनाव में प्रधानमंत्री साद अल-हरीरी ने जनता को इन समस्याओं से जल्द मुक्ति दिलाने का वादा किया था. लेकिन, साल भर बीते जाने के बाद भी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ. ऐसे में जब सरकार ने वाट्सएप पर टैक्स लगाने का फरमान जारी किया तो इसने जले पर नमक छिड़कने का काम किया.

लेबनान के हालात की बात करें तो यहां की आर्थिक हालत का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि इस समय 1500 लेबनानी पाउंड की कीमत एक डॉलर से भी कम है. लेबनानी पाउंड का यह पिछले 10 सालों का सबसे न्यूनतम स्तर है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार लेबनान में बेरोजगारी की दर भी 30 फीसदी तक पहुंच गई है. इस वक्त यहां 15 से 29 साल के हर तीन में से केवल एक युवा को ही रोजगार मिल पा रहा है. इसके अलावा यहां भ्रष्टाचार भी अपने चरम पर है. ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के मुताबिक लेबनान इस मामले में 175 देशों की सूची में 138वें स्थान पर खड़ा है.

कुछ जानकार बताते हैं कि जब सरकार ने वाट्सएप टैक्स वाला फैसला वापस ले लिया तो सड़कों पर उतर चुके युवाओं को लगा कि वे इन प्रदर्शनों से और भी बहुत कुछ हासिल किया जा सकता है. इसीलिए उन्होंने अर्थव्यवस्था की बदहाली, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी जैसे मुद्दे उठाने शुरू कर दिए. इसके बाद इन प्रदर्शनों में मध्य वर्ग और निम्न मध्य वर्ग की वह आबादी भी शामिल हो गयी जिसके लिए बिजली-पानी की कमी और महंगाई पिछले कुछ समय से एक बड़ी समस्या बनी हुई है. देखते ही देखते वाट्सएप जैसी छोटी सी चीज के लिए शुरू हुए प्रदर्शन एक बड़े आंदोलन में तब्दील हो गये जिनके चलते प्रधानमंत्री साद अल-हरीरी को इस्तीफा देना पड़ गया.

लेबनानी प्रधानमंत्री साद अल-हरीरी

प्रधानमंत्री के इस्तीफे के बाद भी प्रदर्शन रुके क्यों नहीं?

बीते 29 अक्टूबर को जब लेबनान के प्रधानमंत्री साद अल-हरीरी ने इस्तीफा दिया था उस वक्त राष्ट्रपति मिशेल एउन ने वादा किया था कि जनता की जो मांगे हैं उन पर सरकार गंभीरता से विचार कर रही है. लेकिन इसके बाद भी प्रदर्शनकारी सड़कों पर डटे हैं. प्रदर्शनकारियों का कहना है कि साद अल-हरीरी का इस्तीफा उनकी छोटी और शुरूआती जीत है, अब उन्हें राष्ट्रपति और संसद के अध्यक्ष सहित सत्ता में बैठे सभी शीर्ष नेताओं का इस्तीफा चाहिए. कुछ प्रदर्शनकारी मीडिया से बातचीत में कहते हैं, ‘अगर हमने प्रदर्शन जारी नहीं रखा तो यही नेता फिर से सत्ता में आएंगे और हमारी समस्याएं जस की तस बनी रहेंगी... फिर इस आंदोलन का कोई फायदा नहीं निकलेगा. इसलिए हमारी मांग है कि सभी इस्तीफा दें. सभी का मतलब सभी.’

प्रदर्शनकारियों का यह भी कहना है कि सभी बड़े नेताओं के इस्तीफे के बाद सरकार का नेतृत्व जानकारों की एक स्वतंत्र समिति को सौंपा जाए जिनका किसी भी राजनीतिक पार्टी के साथ कोई संबंध न हो. यह समिति ही देश को आर्थिक संकट से निकालने पर काम करे और कैसे लोगों की बिजली-पानी जैसी बुनियादी जरूरतें पूरी की जाएं इसे लेकर योजना बनाये.

लेबनान का राजनीतिक सिस्टम कैसे फेल हुआ?

लेबनान के राजनीतिक सिस्टम के लिए कहा जाता रहा है कि यह पूरी दुनिया और खासकर मुस्लिम देशों को आईना दिखाता है. लेकिन, प्रदर्शनकारी लेबनान के इस पूरे राजनीतिक सिस्टम को ही बदलने की मांग कर रहे हैं. इनका कहना है कि वर्तमान सिस्टम की वजह से उनके देश को भारी नुकसान हो रहा है.

लेबनान में 1975-1990 के गृह युद्ध के बाद एक नई राजनीतिक व्यवस्था लाई गई थी. इसके तहत यह तय हुआ था कि देश का राष्ट्रपति ईसाई, प्रधानमंत्री सुन्नी मुस्लिम और संसद का अध्यक्ष एक शिया मुसलमान होगा. संसद की सीटों को दो बराबर भागों में मुस्लिमों और ईसाईयों में बांटा गया, नौकरशाही में भी यही नियम लागू किया गया. लेबनान में 27 फीसदी शिया मुस्लिम, 27 फीसदी सुन्नी मुस्लिम, करीब 40 फीसदी ईसाई और छह फीसदी द्रूज आबादी है. माना जाता है कि देश के सभी समुदाय के लोगों को संतुष्ट रखने के लिए ही नया राजनीतिक सिस्टम लाया गया था.

लेकिन, कुछ समय बाद ही इस सिस्टम की कमियां सामने आने लगीं. दरअसल, शिया, सुन्नी और ईसाई तीनों ही राजनीतिक गुट अपने-अपने पक्ष को मजबूत रखने के लिए अलग-अलग बाहरी ताकतों के करीब हो गए. यहां की सुन्नी मुसलमानों की पार्टियों पर सऊदी अरब का प्रभाव रहता है. हिज़्बुल्लाह और अमल जैसी शिया मुसलमानों की पार्टियां ईरान के करीब हैं. इसी तरह देश की ईसाई पार्टियों पर फ्रांस का प्रभाव माना जाता है.

सड़कों पर उतरी लेबनान की जनता का मानना है कि लेबनान के विभिन्न राजनीतिक गुट अपने-अपने बाहरी मित्रों को खुश करने में ही लगे रहते हैं और इस वजह से यहां की सरकार अपने घरेलू मुद्दों पर ज्यादा ध्यान नहीं दे पाती है. यही वजह है कि प्रदर्शनकारी अब लेबनान के वर्तमान राजनीतिक सिस्टम में ही आमूल-चूल बदलाव की मांग कर रहे हैं.