आध्यात्मिक दृष्टि से एकांतवास श्रेष्ठ होता है. लेकिन गृहस्थ जीवन में, विशेषकर जब हम सार्वजनिक जीवन में हों तो हमें स्वयं से श्रेष्ठ मनुष्यों से सत्संगति की आवश्यकता होती है. एक साधक और मुमुक्षु(मोक्ष की इच्छा रखने वाला) के जीवन में अलग-अलग अवसरों पर कई नैतिक प्रश्न खड़े होते रहते हैं. ऐसे प्रश्नों के सामने जब वह धर्म-अधर्म का निर्णय कर पाने की स्थिति में नहीं होता. या कि वह अपनी अंतरात्मा की आवाज़ को ठीक से सुनने-समझने में स्वयं को अक्षम पाता है, तो वह अपनी पहुंच के ऐसे श्रेष्ठतर साधकों या सिद्धों के पास जाता है, जिनसे उसे लगता है कि उन प्रश्नों का समाधान मिलेगा.

हमारे समाज में गुरु-शिष्य परंपरा के अतिरिक्त सत्संगति और वैचारिक मार्गदर्शन की उपरोक्त परंपरा भी बहुत ही जीवंत रूप से विद्यमान रही है. यहां तक कि जब दो व्यक्तियों के बीच प्रत्यक्ष संवाद न भी हो रहा हो, तब भी इसमें गुणदर्शन से गुणग्रहण का आदर्श रहा है. विनोबा ने इसे ‘गुणदर्शन’ कहा था. उनकी प्रेरणा से रचे गये जैन धर्म-दर्शन के ग्रंथ समणसुत्तं में कहा गया है - गुणेहि साहू अगुणेहिऽसाहू, गिण्हाहि साहूगुण मुंचऽसाहू. (अर्थात् कोई भी गुणों से ही साधु होता है और अगुणों से असाधु. अतः साधु के गुणों को ग्रहण करो और असाधुता का त्याग करो.) संत कबीर कह गए- संगत कीजै साधु की, कभी निष्फल होय. लोहा पारस परस ते, सो भी कंचन होय…’

श्रीमद् राजचंद्र महात्मा गांधी से उमर में केवल दो साल बड़े थे. 1891 में जब गांधी अदन के रास्ते विलायत से बंबई लौट रहे थे तो समुद्र में तूफान चल रहा था. लेकिन जैसा कि गांधीजी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है -‘मेरे विचार में बाहर का यह तूफान मेरे अंदर के तूफान का चिह्नरूप था. पर जिस तरह बाहर तूफान के रहते मैं शांत रह सका, मुझे लगता है कि अंदर के तूफान के लिए भी यह बात कही जा सकती है. जाति (से बहिष्कृत किए जाने) का प्रश्न तो था ही. धंधे की चिंता के विषय में भी लिख चुका हूं. इसके अलावा, सुधारक होने के कारण मैंने मन में कई सुधारों की कल्पना कर रखी थी. उनकी भी चिंता थी. कुछ दूसरी चिंताएं अनसोची भी उत्पन्न हो गई थी.’

तो इस तरह की मनःस्थिति में जब मोहनदास गांधी ने भारत में कदम रखा उसी दिन यानी 6 जुलाई 1891 को बंबई में कवि रायचंदभाई से उनकी मुलाकात हुई. उस समय गांधी महज 22 साल के नौजवान थे जो विलायत से बैरिस्टरी की डिग्री लेकर लौटे थे और उन पर अंग्रेजी रंग-ढंग पूरी तरह हावी था. इधर श्रीमद् राजचंद्र की उम्र थी लगभग 24 साल. लेकिन इतनी सी उम्र में ही उनकी आध्यात्मिक अनुभूतियां आत्मदर्शन की परिपक्वता को छू रही थीं. उधर गांधी के जीवन में अनसुलझे आध्यात्मिक और अस्तित्ववादी प्रश्नों का तूफान चल रहा था. प्रकृति ने दोनों को क्या खूब मिलाया था. इस तरह दोनों की यह पहली मुलाकात ही एक प्यासे और निर्झर की मुलाकात सरीखी थी. यह एक सहजमना जिज्ञासु और एक तपोनिष्ठ ज्ञानी की मुलाकात जैसी थी.

अपनी आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ में गांधीजी ने एक पूरा अध्याय श्रीमद् राजचन्द्र पर लिखा है. इसमें उन्होंने लिखा है:

‘डॉ. मेहता ने अपने घर पर जिन लोगों से मेरा परिचय कराया, उनमें से एक का उल्लेख किए बिना काम नहीं चल सकता. उनके भाई रेवाशंकर जगजीवन तो मेरे आजन्म मित्र बन गए. पर मैं जिनकी चर्चा करना चाहता हूँ, वे हैं कवि रायचन्द अथवा राजचन्द्र. वे डॉक्टर के बड़े भाई के जामाता थे और रेवाशंकर जगजीवन की पीढ़ी के साक्षी तथा कर्ता-धर्ता थे. उस समय उनकी उमर पचीस साल से अधिक नहीं थी. फिर भी अपनी पहली मुलाकात में ही मैंने यह अनुभव किया था कि वे विचारवान और ज्ञानी पुरुष थे. डॉ. मेहता ने मुझे ‘शतावधान’ (100 क्रियाओं पर एक साथ ध्यान देने या 100 शब्दों को सिर्फ एक बार सुनकर याद करने की क्षमता) का नमूना देखने को कहा. मैंने भाषा ज्ञान का अपना भंडार खाली कर दिया और कवि ने मेरे कहे हुए शब्दों को उसी क्रम से सुना दिया, जिस क्रम में वे कहे गए थे! उनकी इस शक्ति पर मुझे ईर्ष्या हुई, लेकिन मैं उस पर मुग्ध न हुआ. मुझे मुग्ध करनेवाली वस्तु का परिचय तो बाद में हुआ. वह था उनका व्यापक शास्त्रज्ञान, उनका शुद्ध चारित्र्य और आत्मदर्शन करने का उनका उत्कट उत्साह. बाद में मुझे पता चला कि वे आत्मदर्शन के लिए ही अपना जीवन बिता रहे थे.

वे स्वयं हजारों का व्यापार करते, हीरे-मोती की परख करते, व्यापार की समस्याएं सुलझाते, पर यह सब उनका विषय न था. उनका विषय, उनका पुरुषार्थ तो था आत्मपरिचय हरिदर्शन. उनकी गद्दी पर दूसरी कोई चीज हो चाहे न हो, पर कोई न कोई धर्मपुस्तक और डायरी तो अवश्य रहती थी. व्यापार की बात समाप्त होते ही धर्मपुस्तक खुलती थी. उनके लेख का जो संग्रह प्रकाशित हुआ है, उसका अधिकांश इस डायरी से ही लिया गया है. जो मनुष्य लाखों के लेन-देन की बात करके तुरंत ही आत्म-ज्ञान की गूढ़ बातें लिखने बैठ जाए, उसकी जाति व्यापारी की नहीं, बल्कि शुद्ध ज्ञानी की है. उनका ऐसा अनुभव मुझे एक बार नहीं, कई बार हुआ था. मैंने कभी उन्हें मूर्च्छा की स्थित में नहीं पाया. मेरे साथ उनका कोई स्वार्थ नहीं था. मैं उनके बहुत निकट संपर्क में रहा हूं. उस समय मैं एक भिखारी बैरिस्टर था. पर जब भी मैं उनकी दुकान पर पहुंचता, वे मेरे साथ धर्म-चर्चा के सिवा दूसरी कोई बात ही नहीं करते थे. यद्यपि उस समय मैं अपनी दिशा स्पष्ट नहीं कर पाया था; यह भी नहीं कह सकता कि साधारणतः मुझे धर्म चर्चा में ही रस था; फिर भी रायचन्द्र भाई की धर्म चर्चा रुचिपूर्वक सुनता था. उसके बाद मैं अनेक धर्माचार्यों के संपर्क में आया हूं. मैंने हरेक धर्म के आचार्यों से मिलने का प्रयत्न किया है. पर मुझपर जो छाप रायचन्द्र भाई ने डाली, वैसी दूसरा कोई न डाल सका. उनके बहुतेरे वचन मेरे हृदय में सीधे उतर जाते थे. मैं उनकी बुद्धि का सम्मान करता था. उसकी प्रामाणिकता के लिए मेरे मन में उतना ही आदर था. इसलिए मैं जानता था कि वे मुझे जान-बूझकर गलत रास्ते नहीं ले जाएंगे और उनके मन में जो होगा वही कहेंगे. इस कारण अपने आध्यात्मिक संकट के समय मैं उनका आश्रय लिया करता था.’

इसी अध्याय में आगे गांधीजी लिखते हैं - ‘यहां तो इतना ही कहना काफी होगा कि मेरे जीवन पर प्रभाव डालने वाले आधुनिक पुरुष तीन हैं: रायचन्द्र भाई ने अपने सजीव संपर्क से, टॉल्सटॉय ने ‘बैकुण्ठ तेरे हृदय में है’ नामक अपनी पुस्तक से और रस्किन (जॉन रस्किन) ने ‘अनटू दिस लास्ट’ नामक पुस्तक से मुझे चकित कर दिया.’

इस तरह गांधीजी के जीवन में जिस महापुरुष ने अपने सजीव संपर्क से सबसे अधिक प्रभाव डाला, वे निस्संदेह श्रीमद् राजचंद्र ही थे. श्रीमद् द्वारा शरीर-त्याग के पच्चीस साल बाद 1926 में श्री रेवाशंकर जगजीवन झवेरी ने जब ‘श्रीमद् राजचन्द्र के पत्र व लेख’ का दूसरा संस्करण प्रकाशित करवाया तो उसकी प्रस्तावना लिखने के लिए उन्होंने गांधीजी से कहा. 5 नंवबर, 1926 को गांधीजी ने पुस्तक की एक लंबी प्रस्तावना लिखी जिसमें उन्होंने पांच प्रकरणों में श्रीमद् के बारे में अपने विचार और संस्मरण लिखे. गांधीजी ने इसमें लिखा:

‘श्रीमद् राजचन्द्र असाधारण व्यक्ति थे. उनके लेखों में उनके अनुभव का सार है. जो उन्हें पढ़ेगा, उनपर विचार करेगा और उनके अनुरूप चलेगा, उसके लिए मोक्ष सुलभ हो जाएगा. उसके कषाय (राग-द्वेष), उसकी भोगलालसा क्षीण होगी, वह संसार के प्रति उदासीन हो जाएगा और देह का मोह छोड़कर आत्मार्थी बनेगा… मुझे हमेशा ऐसा लगा है कि उनके लेखों से सत्य का निर्झर बह रहा है. उन्होंने अपना ज्ञान बघारने के लिए एक भी शब्द नहीं लिखा. लेखक का हेतु पाठकों को अपने आनंद में भागीदार बनाने का था. जो आत्म-क्लेश को दूर करना चाहता है, जो अपना कर्तव्य जानने को उत्सुक है उसे श्रीमद् के लेखों में से बहुत-कुछ मिल जाएगा, ऐसा मेरा विश्वास है, फिर चाहे वो हिंदू हों अथवा अन्यधर्मी.’

गांधीजी ने लगातार दो वर्षों तक श्रीमद् की दिनचर्या को इतने निकट से देखा और परखा था कि उसका अद्भुत वर्णन उन्होंने अपने एक संस्मरण में किया है. वे लिखते हैं - ‘उनके पास हमेशा कोई–न-कोई धर्मपुस्तक या कोरी बही पड़ी ही रहती थी. उनके मन में जो विचार आते वे उन्हें उस बही में लिख देते थे. कभी गद्य और कभी पद्य. ‘अपूर्व अवसर’ नामक कविता भी इसी तरह लिखी गई होगी. खाते, बैठते, सोते, प्रत्येक क्रिया करते हुए उनमें वैराग्य तो होता ही था. उन्हें कभी भी जगत के किसी भी वैभव के लिए मोह हुआ हो, ऐसा मैंने नहीं देखा. मैं उनके नित्यक्रम को आदरपूर्वक परन्तु अत्यंत बारीकी से देखता था. भोजन में जो मिलता उसी में संतुष्ट रहते. वेशभूषा बिल्कुल सादी थी, धोती और कुरता, अंगरखा और सूत तथा रेशम मिले कपड़े की पगड़ी. यह कोई बहुत साफ या इस्त्री किए हुए होते थे, सो याद नहीं. जमीन पर बैठना अथवा कुर्सी पर बैठना, दोनों उनके लिए समान थे. अपनी दुकान में होते तब सामान्यतः वे गद्दी पर बैठते थे.

उनकी चाल धीमी थी, और देखनेवाला समझ सकता था कि चलते हुए भी वे विचारमग्न हैं. उनकी आंखों में अद्भुत शक्ति थी - अत्यंत तेजस्वी; उनमें विह्वलता तनिक भी न थी. दृष्टि में एकाग्रता थी. चेहरा गोल, होंठ पतले, नाक न तो नुकीली, न चपटी; न छरहरा बदन, मध्यम कद, वर्ण श्याम. वे शान्ति की मूर्ति दिखाई देते थे. उनके कंठ में इतना माधुर्य था कि उनको सुनते हुए मनुष्य कभी नहीं थकता. चेहरा हंसमुख और प्रफुल्लित था, उसपर अन्तरानन्द की चमक थी. भाषा उनकी इतनी परिपूर्ण थी कि उन्हें अपने विचार व्यक्त करते हुए किसी दिन कोई शब्द ढूंढ़ना पड़ा हो, सो मुझे याद नहीं… बाह्याडंबर से मनुष्य वीतरागी (राग-द्वेष से मुक्त, शांतचित्त) नहीं हो सकता - वीतरागता तो आत्मा का प्रसाद है. यह केवल अनेक जन्मों के प्रयत्न से ही मिल सकता है, ऐसा हर कोई व्यक्ति अनुभव कर सकता है. रागों को दूर करने का प्रयत्न करने वाला व्यक्ति जानता है कि रागरहित होना कितना कठिन है. यह रागरहित दशा कवि (श्रीमद् राजचन्द्र) के लिए स्वाभाविक थी, ऐसी मुझपर छाप पड़ी.’

गांधीजी के जीवन में एक दौर ऐसा भी आया था जब युवा मोहनदास को हिन्दू धर्म के बारे में ही शंका उत्पन्न हो गई थी. यह दक्षिण अफ्रीका में उनका शुरुआती दौर था. एक जिज्ञासु के रूप में उनका आकर्षण ईसाई धर्म की ओर हुआ था. ऐसे समय में श्रीमद् राजचन्द्र ने ही उनकी शंकाओं का समाधान किया था. इस बारे में स्वयं महात्मा गांधी ने उक्त संस्मरण में लिखा है- ‘जिस समय मेरे मन में हिंदू धर्म के बारे में शंका उत्पन्न हो गई थी, उस समय उसके निवारण में मदद देने वाले रायचंदभाई ही थे. 1893 में दक्षिण अफ्रीका में मैं कुछ ईसाई सज्जनों के संपर्क में आया. उनका जीवन निर्मल था. वे धर्मपरायण थे. अन्य धर्मावलंबियों को ईसाई बनने के लिए समझाना उनका मुख्य कार्य था. हालांकि उनसे मेरा संपर्क व्यावहारिक कार्य को लेकर ही हुआ था, फिर भी वे मेरे आत्मिक कल्याण की चिंता में लग गए. इससे मैं अपना एक कर्तव्य समझ सका. मुझे यह प्रतीति हो गई कि जब तक मैं हिन्दू धर्म के रहस्य को पूरी तरह नहीं समझ लेता और मेरी आत्मा को उससे संतोष नहीं होता, तब तक मुझे अपने जन्म का धर्म नहीं छोड़ना चाहिए. इसलिए मैंने हिन्दू और अन्य धर्म-पुस्तकों को पढ़ना आरंभ किया. ईसाइयों और मुसलमानों के धर्मग्रन्थों को पढ़ा. लन्दन में बने अपने अंग्रेज मित्रों के साथ पत्र-व्यवहार किया. उनके सामने अपनी शंकाओं को रखा. उसी तरह हिन्दुस्तान में भी जिन लोगों पर मेरी थोड़ी बहुत आस्था थी उनके साथ भी मैंने पत्र-व्यवहार किया. इनमें रायचन्दभाई मुख्य थे. उनके साथ तो मेरे अच्छे संबंध स्थापित हो चुके थे. उनके प्रति मेरे मन में आदरभाव था. इसलिए उनसे जो मिल सके उसे प्राप्त करने का विचार किया. उसका परिणाम यह हुआ कि मुझे शांति मिली. मन को ऐसा विश्वास हुआ कि मुझे जो चाहिए वह हिन्दू धर्म में है. इस स्थिति का श्रेय रायचन्द भाई को था; इसलिए पाठक स्वयं इस बात का अनुमान लगा सकते हैं कि उनके प्रति मेरा आदरभाव कितना नहीं बढ़ा होगा.’

लेकिन श्रीमद् के बारे में गांधीजी के उपरोक्त उद्गार का यह अर्थ कदापि नहीं लगाना चाहिए कि श्रीमद् दुनिया के अन्य धर्मों के प्रति सम्मान नहीं रखते थे. इस संबंध में यह भी कहा जा सकता है कि गांधीजी को हिंदू धर्म के मर्म को समझाने वाले श्रीमद राजचंद्र मूल रूप से जैन धर्म से ताल्लुक रखते थे. इस संबंध में गांधीजी ने लिखा है- ‘पुस्तकें पढ़ने और सार ग्रहण करने की शक्ति उनमें अपार थी… उन्होंने अनुवाद के द्वारा ‘कुरान’ और ‘जेंद अवेस्ता’ आदि का पठन भी कर लिया था... रायचन्द भाई के मन में अन्य धर्मों के प्रति अनादर का भाव नहीं था. वेदान्त के प्रति तो उनमें विशेष अनुराग भी था. वेदान्ती को कवि (श्रीमद्) वेदान्ती ही जान पड़ते थे. मेरे साथ चर्चा करते हुए उन्होंने मुझे कभी यह नहीं कहा कि मुझे मोक्ष प्राप्त करने के लिए अमुक धर्म का अनुसरण करना चाहिए. उन्होंने मुझे मेरे आचार पर ही विचार करने के लिए कहा. मुझे कौन सी पुस्तकें पढ़नी चाहिए, इस प्रश्न के उत्तर में उन्होंने मेरी रुचि और मेरे बचपन के संस्कार को ध्यान में रखकर ‘गीता’ का अध्ययन करने के लिए कहा और प्रोत्साहित किया तथा दूसरी पुस्तकों में ‘पंचीकरण’, ‘मणिरत्नमाला’, ‘योगवशिष्ठ का वैराग्य प्रकरण’, ‘काव्य दोहन’ पहला भाग और अपनी ‘मोक्ष माला’ पढ़ने का सुझाव दिया.’

इसी प्रकरण में गांधीजी आगे लिखते हैं- ‘रायचन्द भाई अक्सर कहा करते थे कि धर्म तो बाड़ों की तरह है जिनमें मनुष्य कैद है. जिन्होंने मोक्ष की प्राप्ति को ही पुरुषार्थ माना है, उन्हें अपने भाल पर किसी धर्म का तिलक लगाने की आवश्यकता नहीं है.

तुम चाहे जैसे भी रहो,

जैसे तैसे हरि को लहो।

यह सूत्र जिस तरह अखाभगत (महान गुजराती भक्त कवि) का था उसी तरह रायचन्दभाई का भी था. धर्म के झगड़ों से उनका जी ऊब उठता था, वे शायद ही उनमें पड़ते थे. उन्होंने सब धर्मों के गुणों को अच्छी तरह देख लिया था और जो जिस धर्म का होता, वे उसके सामने उसी धर्म की खूबियां रखते थे. दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए मैंने उनके साथ जो पत्र-व्यवहार किया उसमें से भी मैंने उनसे यही बात सीखी थी.’

श्रीमद् के ‘आत्मसिद्धि’ और ‘भावनाबोध’ जैसे गागर में सागर रूपी ग्रंथों को पढ़कर लगता है कि उनकी आध्यात्मिक गहराई और ऊंचाई क्या थी. इन ग्रंथों को असल में वैराग्य-पथ के पथिक ही भली-भांति समझ सकते हैं. महात्मा गांधी यदि श्रीमद् के सान्निध्य का लाभ उठा सके तो इसका एक कारण यह भी था कि वे स्वयं भी इस पथ पर अग्रसर हो चुके थे.

गांधीजी और श्रीमद् के संबंधों पर अभी तक किसी विस्तृत और प्रामाणिक पुस्तक का अभाव ही रहा था. लेकिन कई वर्षों के अपने श्रमसाध्य शोध के आधार पर वयोवृद्ध गांधी-विचारक समाजकर्मी सुज्ञान मोदी ने ‘महात्मा के महात्मा’ नाम से लगभग 275 पृष्ठों की एक पुस्तक श्रीमद् राजचंद्र की 152वीं जयंती पर प्रकाशित की है. यह पुस्तक प्रामाणिक दस्तावेजों के आधार पर इन दोनों कालजयी युगपुरुषों के अद्भुत संबंधों को सिलसिलेवार और रोचक तरीके से प्रस्तुत करती है.

श्रीमद राजचंद्र का जन्म हिंदू या विक्रमी कैलैंडर के मुताबिक विक्रम संवत 1924 की कार्तिक पूर्णिमा (9 नवंबर 1867) को हुआ था.