बीते दिनों थाईलैंड से खबर आई कि भारत रीजनल कंप्रेहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप (आरसीईपी-आरसेप) में शामिल नहीं होगा. देश में इस समझौते को लेकर चर्चा थी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इससे संबंधित बैठक में हिस्सा लेने बैंकाक गए थे. विपक्ष और सरकार के समर्थक कुछ संगठन लगातार आरसीईपी (आरसेप) का विरोध तो कर रहे थे. लेकिन, यह भी माना जा रहा था कि शर्तों में कुछ फेरबदल के साथ भारत मुक्त व्यापार के इस बहुपक्षीय समझौते में शामिल हो जाएगा. यह इसलिए भी लग रहा था कि सरकार के कुछ मंत्रियों और सरकार द्वारा ही गठित कुछ रिपोर्टों में इस क्षेत्रीय आर्थिक साझेदारी के पक्ष में संकेत दिए गए थे. लेकिन, आखिर ऐसा क्या हुआ कि अंतिम क्षणों में भारत ने आरसीईपी से बाहर रहने का फैसला किया?

इस पर गौर करने से पहले यह आरसीईपी की पृष्ठभूमि पर चर्चा जरूरी है. आरसीईपी या आरसेप 16 देशों का एक समूह है. इनमें आसियान (सिंगापुर, इंडोनेशिया, वियतनाम, मलेशिया, थाईलैंड समेत दस देश) देशों के साथ-साथ छह अन्य देश - न्यूजीलैंड, चीन, भारत, जापान, आस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया - शामिल हैं. माना जा रहा था कि इस समझौते के अमल में आने के बाद ये 16 देश दुनिया का बेहद शक्तिशाली आर्थिक ब्लॉक बन जाएंगे. अगर भारत और चीन इस समझौते में एक साथ शामिल होते तो दुनिया की करीब आधी आबादी और 35 फीसद जीडीपी इसके हिस्से में आ जाती.

आरसीईपी (आरसेप) की चर्चा नई नहीं है और इससे संबंधित वार्ताओं का दौर 2012 से ही चल रहा है. लेकिन, पिछले कुछ समय से इसकी चर्चाओं ने काफी जोर पकड़ा है. अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक तनातनी के बाद इसकी अहमियत और बढ़ गई है. अमेरिका के साथ व्यापार युद्ध के बाद चीन इस समझौते को जल्द से जल्द अमल में लाने की कोशिश कर रहा था.

लेकिन, भारत में आरसेप एक बड़ा मुद्दा बन गया और इसकी चर्चा कुछ यूं होने लगी जैसे एक समय डंकल प्रस्ताव या डब्ल्यूटीओ को लेकर होती थी. इसे लेकर कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने आरोप लगाने शुरु किए कि यह समझौता भारतीय कृषि और छोटे व्यापारियों को तबाह कर देगा. हालांकि एक समय कांग्रेस खुद भी इस समझौते की दिशा में काफी आगे बढ़ चुकी है.

डेयरी उद्योग भी इस समझौते का पुरजोर विरोध कर रहा था. दुग्ध उत्पादन से जुड़ी सहकारी समितियां इनका नेतृत्व कर रहीं थीं. इनका तर्क था कि न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से सस्ते डेयरी प्रोड्क्टस की आमद का नुकसान भारत के दुग्ध उत्पादक किसानों को उठाना पड़ेगा. किसानों और दुग्ध उत्पादकों के नुकसान की बातें राजनीतिक बयानों में सबसे ज्यादा की जा रही थीं. विपक्ष के साथ-साथ सरकार समर्थक स्वदेशी जागरण मंच भी आरसेप का विरोध कर रहा था. देश के कई शहरों में इसे लेकर प्रदर्शन तक हो रहे थे.

आरसेप का विरोध करने वालों का कहना था कि द्विपक्षीय व्यापार समझौतों से भारत का निर्यात बहुत बढ़ा हो आंकड़े इसका समर्थन नहीं करते. अगर चीन का ही उदाहरण लें तो भारत के व्यापार घाटे में आधे से ज्यादा हिस्सा उसका है. चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 55 बिलियन डॉलर से ज्यादा का है. यानी भारत चीन को जितना सामान निर्यात करता है उसका कई गुना ज्यादा आयात करता है. यह हालात तब हैं जब चीन के साथ भारत का कोई मुक्त व्यापार समझौता नहीं है. यह भी तर्क है कि आरसेप में आने वाले कई आसियान देशों से भारत का फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पहले से ही है और इन देशों के साथ भी भारत भारी व्यापार घाटे से जूझ रहा है. ऐसे में अगर भारत आरसेप समझौते में शामिल होगा तो यह व्यापार घाटा और बढ़ जाएगा. तब भारतीय बाजार चीनी सामानों से पट जाएंगे क्योंकि समझौते के तहत भारत को बहुत सारी वस्तुओं से आयात शुल्क हटाना पड़ेगा और चीन से आयात बहुत तेजी से बढ़ेगा.

हालांकि, कई लोग इस समझौते का समर्थन भी कर रहे थे. इनके मुताबिक आईटी सेक्टर, हेल्थ और शिक्षा जैसे क्षेत्रों के लिए यह समझौता फायदेमंद होता. कुल मिलाकर आरसेप से होने वाले नफा-नुकसान का आकलन इतना व्यापक और जटिल है कि हर पक्ष इसके पक्ष विपक्ष में बीसियों तर्क जुटा सकता है.

आर्थिक जानकार कहते हैं कि मुक्त व्यापार समझौतों से नफा-नुकसान दोनों होते हैं और यही आर्थिक कूटनीति है कि ऐसे समझौतों के दौरान कैसे कोई देश ज्यादा से ज्यादा अपने पक्ष की बातें मनवा लेता है. इनका मानना है कि जब हम उदारीकृत आर्थिक नीतियों पर चल रहे हैं तो इन समझौतों से बाहर रहने का कोई मतलब नहीं है. क्योंकि ऐसे ही व्यापार समझौतों में कूदकर हम उदारीकरण का पूरा लाभ उठा सकते हैं. आरसेप के समर्थक अर्थशास्त्री कहते हैं कि व्यापार घाटे के सहारे व्यापारिक लाभ नापने का तरीका पुराना हो चुका है. अब जिस पैमाने पर पूंजी पूरी दुनिया में घूमती है, इसमें यह भी देखना चाहिए कि इस तरह के समझौते कितना निवेश और किस तरह की तकनीक लेकर आए और इनका कैसा फायदा देश को मिला.

ऐसे अर्थशास्त्रियों का मानना है कि चीन के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर से मुकाबला करने में भारत के कई सेक्टर अभी पीछे हैं. ऐसे में यह बात सही है कि चीन भारत में बड़े पैमाने पर अपना सामान डंप कर सकता है. लेकिन, इसके लिए सरकार को समझौते से बाहर निकलने के बजाय इसकी शर्तों को अपनी ओर मोड़ने की कोशिश करनी चाहिए थी. आरसेप से निकलकर भारत ने न केवल एक बड़ा बाजार खो दिया बल्कि इससे कई क्षेत्रों में निवेश बढ़ने की भी संभावना थी.

आरसेप समर्थकों और विरोधियों के अपने तर्क हैं. लेकिन, यह बात सही है कि भारत अगर मुक्त व्यापार और आर्थिक उदारीकरण की नीतियों का लाभ लेना चाहता है तो ऐसे समझौतों से बाहर रहना कोई विकल्प नहीं है. हां, समझौते के दौरान इस बात की कोशिश जरूर होनी चाहिए कि इसकी शर्तें ऐसी हों जिनसे हम अपने देश के किसानों, छोटे कारोबारियों के हित सुरक्षित रख सकें.

सामरिक दृष्टि से देखे तो नरेंद्र मोदी सरकार की विदेशी नीति पुलवामा से लेकर कश्मीर तक आक्रामक कही जा सकती है. लेकिन, विदेश नीति को आर्थिक मसलों की कसौटी पर भी कसा जाता है. बल्कि, उदारीकृत दुनिया में विदेशी नीति की सफलता आर्थिक मसलों पर ही परखी जाती है. अगर इस लिहाज से देखें तो भारत अपनी विदेश नीति की सफल कहानी आर्थिक मोर्चे पर दोहराता नहीं दिखता.

भारत की ताकत सर्विस सेक्टर है. लेकिन वर्किंग वीजा और अन्य कई चीजों में रियायत को लेकर भारत आरसेप में अपने हित वाली शर्तें नहीं जुड़वा पाया. वहीं, चीन से बढ़ते आयात के खतरे को लेकर भारत उससे यह शर्त भी नहीं मनवा पाया कि अगर एक सीमा से ज्यादा चीनी आयात बढ़ता है तो फिर उस पर आयात शुल्क आयद होगा. जबकि विश्व व्यापार समझौते ( डब्लूयटीओ) की वार्ताओं के दौरान भारत ऐसा करने में सफल हो गया था. उस वक्त अमेरिका और यूरोप के शक्तिशाली देशों के खिलाफ भारत विकासशील देशों का नेता बनकर उभरा था. इसके चलते भारत की कई शर्ते इन देशों को माननी पड़ी थीं.

लेकिन, आरसेप के मामले में ऐसा नहीं हो सका और समझौते की पूरी कमान चीन के हाथों में आ गई. इस समझौते में चीन और भारत ही सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थे. चीन बड़ी आर्थिक शक्ति है और उसके साथ समझौते से जुड़ी चिंता आसियान और अन्य देशों को भी रही होंगी. ऐसे में भारत इस आर्थिक ब्लॉक में चीन के बरक्स उन देशों का नेतृत्व कर सकता था. इन देशों के साथ बेहतर आर्थिक कूटनीतिक समझ बनाकर भारत चीन को कई शर्ते मनवाने पर मजबूर कर सकता था. लेकिन, ऐसा नहीं हुआ और भारत को समझौते से बाहर निकलना पड़ा.

विदेश नीति के मामले में सक्रिय भारत आर्थिक कूटनीति के मोर्चे पर वैसा आक्रामक और सतर्क क्यों नहीं रहा कि वह अपनी शर्ते मनवाकर आरसेप में शामिल होने का फायदमंद रास्ता बना पाता. इसके सूत्र आरसेप को लेकर सरकार की ऊहापोह से जुड़े हैं. जानकार मानते हैं कि केंद्र सरकार हमेशा इस संशय में रही कि उसे आरसेप में शामिल होना चाहिए या नहीं और अंत में इसी वजह से बात बिगड़ गई. इसकी वजह आर्थिक के साथ राजनीतिक भी थी. विपक्ष और सरकार समर्थक स्वदेशी लॉबी भी आरसेप का लगातार विरोध कर रहे थे. ऐसे में सरकार यह तय नहीं कर पा रही थी कि क्या किया जाए. इसी वजह से वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इतने बड़े मुद्दे पर अपनी सार्वजनिक राय रखने से परहेज करती रहीं. इस अधर वाली स्थिति में नौकरशाही भी अपनी रणनीति को लेकर कुछ तय नहीं कर पा रही थी.

बाद में इस मामले में थोड़ी सी स्पष्टता आई और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल अपने बयानों में आरसेप के फायदों के बारे में बताते हुए यह कहने लगे कि दुनिया भर की आर्थिक हलचल से भारत अलग-थलग नहीं रह सकता. अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला के नेतृत्व में एक कमेटी गठित की गई. उसने भी आरसीईपी में शामिल होने की वकालत की और यह सलाह दी कि भारत को अपना निर्यात बढ़ाने के लिए क्या करना चाहिए. इन संकेतों का यह अर्थ निकाला गया कि सरकार अब आरसेप में शामिल होने का मन बना चुकी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आरसेप की बैठक के लिए बैंकाक रवाना हुए तो भी लग रहा था कि भारत शर्तों में कुछ फेेरबदल के साथ इस समझौते का हिस्सा बन जाएगा. लेकिन, अंतिम समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समझौते में शामिल होने से मना कर दिया. उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि इस समझौते से हमारे छोटे कारोबारियों, किसानों को नुकसान होगा, इसलिए भारत समझौते में शामिल नहीं होगा.

जानकार कहते हैं कि दरअसल, यह तमाम स्तरों पर होने वाली वार्ताओं में हमारी आर्थिक कूटनीति की असफलता थी. लेकिन, प्रधानमंत्री ने बढ़िया शब्द चुनकर इसका राजनीतिक बचाव कर लिया. सियासी गलियारों पर नजर रखने वाले भी मानते हैं कि स्वदेशी जागरण मंच के कारण सरकार दबाव में जरूर थी, लेकिन समझौता रद्द होने की मुख्य वजह यह नहीं थी. इनके मुताबिक स्वदेशी जागरण मंच इस फैसले का शुरु से ही विरोध कर रहा है. अगर सरकार इस दबाव में फैसला करती तो पहले से ही आरसीईपी में शामिल न होने को लेकर भूमिका बनानी शुरु कर देती और सरकार के मंत्री इस तरह से आरसीईपी की वकालत न करते. वाणिज्य और वित्त मंत्रालय को तो शायद अंत तक इस बारे में कोई ज्यादा अंदाजा ही नहीं था और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल लगातार आरसेप का समर्थन कर रहे थे. जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंत समय में समझौते से बाहर आने की घोषणा की तब उनके बयान 180 डिग्री घूम गए और वे मुक्त व्यापार समझौते की कमियां निकालने लगे.

इसके बाद कांग्रेस से लेकर स्वेदशी जागरण मंच तक ने इसे अपने रूख की जीत बताया. लेकिन, दरअसल यह जीत किसी की भी नहीं थी. मुक्त व्यापार से अगर भारत को लाभ लेने हैं तो ऐसे आर्थिक समझौते की मेज पर कूटनीति को और मजबूत करना पड़ेगा. जुड़ती हुई दुनिया में किसी देश का ऐसे समझौतों से दूर भागना नहीं, बल्कि समझौतों को ज्यादा से ज्यादा अपने पक्ष में बनाना ही जीत होती है. और इसके लिए भारत को अपनी विदेश नीति की आक्रामकता को आर्थिक मंचों पर भी इस्तेमाल करना सीखना होगा.