अभी हाल में गुजरात के किसी बड़े शहर की एक छोटी-सी बच्ची का एक वीडियो बहुप्रसारित हुआ था. वीडियो में वह बच्ची एकदम उकताकर बिना किसी पूर्वतैयारी के सहज रूप से कह रही है कि उसका बस चले तो वह स्कूल के सभी शिक्षकों को क्लासरूम में हमेशा के लिए ताले में बंद कर उन पर चूहे छोड़ दे.

कारण पूछने पर यह बच्ची कहती है कि सुबह-सुबह उसे नींद से जबरन उठाकर बस में ठूंसकर स्कूल भेजा जाता है. फिर वहां उसे तरह-तरह के उबाऊ और नीरस विषय बेमन से पढ़ने पड़ते हैं. फिर घर आकर उसे स्कूल का होमवर्क करना पड़ता है. उसके बाद उसे ट्यूशन पढ़ने जाना पड़ता है. ट्यूशन से वापस आकर उसे फिर से ट्यूशन में मिला होमवर्क करना पड़ता है. फिर उसे स्केटिंग, डांस या ड्रॉइंग सीखने के लिए जाना पड़ता है. इस तरह उसका सारा दिन बोझिल हो जाता है. खेलने और ठीक से सोने तक समय नहीं मिलता है.

अंत में बच्ची कहती है कि वह देश के प्रधानमंत्री मोदी जी को चुनाव में हराकर यह व्यवस्था पूरी तरह बदल देगी और बच्चों को यह छूट देगी कि वे महीनों निश्चिंत होकर सो सकें.

हल्के-फुल्के अंदाज में हम वयस्क लोग इस पर हंसकर अपना मनोरंजन भी कर सकते हैं. लेकिन इससे यह सच्चाई छिप नहीं जाती कि हमारे बच्चे खेलने, सोने और चिंतामुक्त रहने के नैसर्गिक अधिकार से भी वंचित किए जा रहे हैं.

पांच वर्ष पहले प्रकाशित हुई इज़रायली इतिहासकार युवाल नोवा हरारी की किताब – ‘सेपियन्स : मानव जाति का संक्षिप्त इतिहास’ खासी लोकप्रिय हुई है. हरारी ने इसमें अन्य प्राणियों के बच्चों से मनुष्य जाति के बच्चों की दिलचस्प तुलना करते हुए लिखा है कि ‘एक बछड़ा जन्म लेने के कुछ ही समय बाद दौड़ने लग सकता है, बिल्ली का बच्चा जन्म लेने के कुछ ही हफ्तों बाद अपनी मां को छोड़कर खुद ही अपने भोजन की तलाश में निकल पड़ता है. जबकि इंसानी बच्चे इतने असहाय होते हैं कि वे भरण-पोषण, संरक्षण और शिक्षा के लिए कई वर्षों तक अपने बड़ों पर निर्भर रहते हैं. ...मनुष्य के बच्चे भट्टी से निकले लचीले कांच की तरह गर्भ से निकलते हैं. उन्हें आश्चर्यजनक आज़ादी के साथ घुमाया, ताना जा सकता है और आकार दिया जा सकता है. यही कारण है कि आज हम अपने बच्चों को ईसाई या बौद्ध, पूंजीवादी या समाजवादी, लड़ाकू या शान्तिप्रिय बनाने के लिए शिक्षित कर सकते हैं.’

इस लिहाज से इंसानी बच्चों का लचीलापन एक दोधारी तलवार जैसा है.

इंसानी बच्चों को ‘शिक्षित करने’ का लोकप्रिय अर्थ यही रहा है कि किसी तरह उसे समाज के प्रचलित मूल्यों के आधार पर एक सुरक्षित जीवन-जीने के लिए तैयार किया जा सके. उनका लालन-पालन करने वाले माता-पिता कुछ बुनियादी विचारों में विश्वास करते होते हैं. माता-पिता के आदर्श जीवन की परिभाषा के आधार पर ही बच्चों के व्यवहार को ढालना जरूरी माना-जाता है. समाजशास्त्री जिसे ‘समाजीकरण’ की प्रक्रिया कहते हैं उसमें ऊपरी तौर लाख वैविध्य होने के बावजूद यह एक समानता पाई जाती है कि हम संबंधित समाज या संस्कृति में स्वीकृत मूल्यों या प्रचलित जीवन-शैली के आधार पर ही अपने बच्चों को आकार देना देना चाहते हैं. और इसके लिए हम कोई भी कीमत चुकाने के लिए तैयार रहते हैं.

देर-सवेर इसमें शिक्षक भी एक प्रमुख भूमिका में आ जाते हैं. शिक्षक-छात्र संबंध इन बच्चों और शिक्षकों दोनों के लिए ही एक अजीब और अबूझ-सी स्थिति होती है. इसमें एक तरफ होता है शैक्षणिक प्रशासन का लिखित नियम-कायदा और दूसरी तरफ होता है एक वयस्क और बच्चे के बीच का मानवीय संबंध. शिक्षक-शिक्षिका अपने घर में अपने बच्चों के माता-पिता हो सकते हैं और इस भूमिका में उनके कुछ खास अलिखित स्वत्वाधिकार हो सकते हैं. लेकिन स्कूल में बतौर शिक्षक जहां उनके कुछ विशेषाधिकार हो सकते हैं, वहीं कुछ अधिकारहीनता भी होती है. ऐसा ही बच्चों के साथ भी है.

जैसे ही बच्चा स्कूल जाना शुरू करता है वह घर और बाहर के इस संबंध-भेद को समझने का प्रयास करने लगता है. यह मूल्यांकन करना दिलचस्प हो सकता है कि घर और विद्यालय में सीखने की इस प्रक्रिया में बच्चा कब, कहां, क्या और कितना सीखता है. और यह भी कि इन दोनों ही संस्थाओं के बीच क्या कोई अंतर्विरोध भी है? इन दोनों में ज्यादा प्रभावकारी कौन है जिसका असर बच्चे के भावी व्यक्तित्व पर दूरगामी रूप से पड़ता हो?

भारतीय परंपरा में जिस देव-त्रयी की कल्पना की गई उसमें कहा गया कि ‘मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव’. इसमें एक खास क्रम रखा गया. बच्चों के भावी व्यक्तित्व में इन तीनों की छाप थोड़ी-बहुत मात्रा में दिखती रही है. भले ही समय के साथ-साथ इन तीनों के प्रति देवभावना कम होती जाती हो. या समय के साथ-साथ इस पूज्यभाव का पूरी तरह लोप हो जाता हो. प्रख्यात लेखक जॉर्ज ऑर्वेल ने कहा था कि ‘हर पीढ़ी अपने आप को पिछली पीढ़ी से ज्यादा होशियार और अपने बाद की पीढ़ी से ज्यादा बुद्धिमान समझती है.’

नई पीढ़ियों के बारे में कई अहम फैसले उससे पहले की पीढ़ी कर चुकी होती है. लेकिन तकनीक या प्रौद्योगिकी जिस रफ्तार से आगे बढ़ रही है उसने हर पीढ़ी के लिए यह चुनौती खड़ी कर दी है कि वह निरंतर सीखती और बदलती रहे. नए वातावरण में स्वयं को अनुकूलित करती रहे. इस सीखते रहने के साथ-साथ पीछे सीखी गई चीजों को सप्रयास पूरी तरह बिसारने के भी उपक्रम शुरू हो चुके हैं. ‘अनलर्निंग’ पर इतना जोर दिया जा रहा है कि व्यक्ति ठगा हुआ महसूस करने लगता है. उसे लगता है कि 21-22 साल की उम्र तक स्कूल और कॉलेज में झूठ ही उसे रगड़-रगड़कर उसका इतना समय और संसाधन नष्ट किये गये. इसलिए अब अपने अनुभवों से ठोकर खाकर मोहभंगता की स्थिति में माता-पिता अपने बच्चों को ‘होम-स्कूलिंग’, ‘डी-स्कूलिंग’ और ‘अन-स्कूलिंग’ जैसे प्रयासों से जोड़ रहे हैं. केवल भारत में ही ऐसे परिवारों की संख्या हज़ारों में हो सकती है.

इस दबाव में कई स्कूल भी सीखने-सिखाने की लचीली और उन्मुक्त प्रक्रियाओं को अपनाने पर बाध्य हो रहे हैं. लेकिन यहां समस्या यह आती है कि वहां के जो शिक्षक और प्रबंधक हैं उनकी ‘अनलर्निंग’ और ‘लर्निंग’ किस हद तक हुई है. और यह भी कि स्वयं माता-पिता इसके लिए मानसिक और व्यावहारिक रूप में कितने उदार हो सके हैं.

हाल ही में आई यूनिसेफ की एक रिपोर्ट खासी चर्चा में रही. इसमें कहा गया कि भारत के आधे से अधिक बच्चे अगले दशक में रोजगार पाने लायक नहीं बन सकेंगे. हालांकि ऐसी रिपोर्टें केवल उस शिक्षा और कौशल को ही अपना पैमाना मानती हैं जिसमें प्रचलित आर्थिक ढ़ांचे को ही आदर्श मानकर चला जाता है. यही वह बुनियादी फैलसी या भ्रांति है जो लगभग अमानुषिक कसौटियों पर मनुष्य की संभावनाओं का एकपक्षीय मूल्यांकन कर बैठती है. यह एक झटके में दुनिया की उस आबादी को या उस पीढ़ी को नाकारा साबित कर देती है जो संभवतः इस धरती को सबसे कम नुकसान पहुंचा रहे हो सकते हैं.

हमारी मौजूदा जीवन-शैली और शिक्षा व्यवस्था ने न केवल बच्चों की सहजता और नैसर्गिकता छीन ली है, बल्कि स्वच्छ हवा, साफ पानी, और अहानिकर भोजन तक के न्यूनतम अधिकारों से उन्हें वंचित कर दिया है. साल-दर-साल नए-नए अध्ययन और नई-नई रिपोर्टें सामने आती रहती हैं कि किस प्रकार दुनिया भर के और विशेषकर भारत के ज्यादातर बच्चे जहरीली हवा में सांस ले रहे हैं और महानगरों के तो आधे से अधिक बच्चे जन्म के साथ ही सांस की बीमारियां लिए पैदा हो रहे हैं. इसी साल आई भारत सरकार की ही एक रिपोर्ट कहती है कि भारत में 68 फीसदी बच्चों की मौत कुपोषण की वजह से हो रही है.

इसके अलावा नई पीढ़ियों के बच्चे तरह-तरह की हिंसा और युद्ध की आशंकाओं के साये में जन्म ले रहे हैं. सामूहिक नरसंहार और समूल विनाश के भयानक हथियारों का जखीरा और इसके लिए होड़ बढ़ती ही जा रही है. दुनिया के युद्धग्रस्त क्षेत्रों में इसकी सबसे अधिक मार बच्चों पर ही पड़ रही है. कई क्षेत्रों में बच्चों का इस्तेमाल लड़ाकों तक के रूप में हो रहा है. प्राकृतिक संसाधनों का दोहन भी जिस रफ्तार से किया जा रहा है कि उसकी कीमत हमारे आज पैदा होने वाले बच्चों को ही चुकानी है.

बच्चों के ऊपर समय से पहले वयस्क हो जाने का मनोवैज्ञानिक दबाव भी बढ़ता जा रहा है. इसका एक कारण समाज में ‘मीडिया लिटरेसी’ का अभाव भी कहा जा रहा है. विज्ञापनों से लेकर विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों के दवाब और देखा-देखी के चलते हम उन्हें वयस्कों का प्रोटोटाइप या घटिया नमूना बनाने पर आमादा रहते हैं. यही कारण है कि बच्चों में तनाव, अवसाद, चिड़चिड़ापन और आक्रामकता बढ़ती जा रही है, और इसमें उनका कोई दोष नहीं है.

आजकल एक और प्रवृत्ति जोर-शोर से देखने में आ रही है. हम हर बात में बच्चों को अगली सदी की चुनौतियों के लिए तैयार करने को तत्पर रहते हैं: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की चुनौतियों से वे कैसे निपटेंगे. रिलेशनशिप को निभायेंगे. संवाद कैसे करेंगे. रचनात्मक और खोजी कैसे होंगे. उनमें सहानुभूति, समानुभूति, क्षमाशीलता, सहजीविता और सह-अस्तित्व की भावनाएं कैसे विकसित होंगी. वे ग्लोबल सिटिजन कैसे बनेंगे. उनकी तार्किक सोच या क्रिटिकल थिंकिंग कैसे बढ़ेगी.

ध्यान दें कि ये सारी बातें बच्चों को सिखाने के लिए की जाती हैं. लेकिन अगर ये इतनी ही महत्वपूर्ण हैं तो इनमें से कुछ को हम खुद भी क्यों नहीं सीख लेते. फिर बच्चों को इन्हें सीखने की जरूरत नहीं होगी बल्कि ये उनके सहज व्यवहार का हिस्सा हो जाएंगी.