निर्देशक: देबमित्रा बिस्वाल
लेखक: देबमित्रा बिस्वाल, भूपिंदर सिंह
कलाकार: नवाजुद्दीन सिद्दीकी, अथिया शेट्टी, विभा छिब्बर, नवनी परिहार, विवेक मिश्रा, करुणा पांडेय
रेटिंग: 2.5/5

बीते कुछ हफ्तों पर गौर करें तो लगता है कि शायद बॉलीवुड की ग्रहदशा कुछ ठीक नहीं चल रही है. ‘सांड की आंख’, ‘उजड़ा चमन’, ‘बाला’ और अब ‘मोतीचूर चकनाचूर’ लगातार रिलीज हुई कुछ ऐसी फिल्में हैं जिनसे किसी न किसी विवाद ने नाता जरूर जोड़ा है. क्रेडिट और कास्टिंग के छिटपुट मामलों से अलग ‘मोतीचूर चकनाचूर’ तो दो कानूनी विवादों से निपटते हुए सिनेमाघर में पहुंच रही है. इनमें से पहला वह है जिसमें फिल्म की निर्देशक देबमित्रा बिस्वाल ने निर्माताओं के साथ आर्थिक खींचतान होने की बात कही थी और मामले के निपटारे के लिए बॉम्बे हाई कोर्ट तक पहुंच गई थीं. उस समय अदालत ने इस पर सुनवाई करते हुए ‘मोतीचूर चकनाचूर’ का ट्रेलर रिलीज करने पर रोक लगा दी थी जो बाद में हटा ली गई.

इसके बाद रिलीज के ठीक दो दिन पहले खबर आई कि फिल्म के निर्माताओं ने देबमित्रा बिस्वाल पर गैरकानूनी तरीके से फिल्म के अधिकार बेचने का आरोप लगाया है. बताया जा रहा है कि ये अधिकार बिहार के एक वितरक को दिए गए थे और इसीलिए इस मामले में छपरा जिले की एक अदालत में केस भी फाइल किया गया है. खैर, ये मामले-मुकदमे तो अपनी रफ्तार से ही निपटेंगे लेकिन दर्शकों के लिहाज से अच्छा यह है कि इस बीच ‘मोतीचूर चकनाचूर’ रिलीज हो चुकी है.

‘मोतीचूर चकनाचूर’ 36 बरस पार कर चुके पुष्पेंदर और 24-25 के करीब पहुंच रही अनीता यानी ऐनी की विवाह कथा है. जी हां, प्रेमकथा नहीं विवाहकथा! विवाहकथा इसलिए कि फिल्म में ये दोनों ही किरदार शादी के लिए हद से ज्यादा उतावले दिखाई देते हैं. लेकिन पुष्पेंदर जहां कैसी भी लड़की से शादी करने के लिए तैयार है, वहीं ऐनी एनआरआई लड़के से शादी कर विदेश घूमना चाहती है और इसलिए अब तक दस से ज्यादा लड़कों को रिजेक्ट कर चुकी है. हालांकि इस विवरण से फिल्म जितनी प्रोग्रेसिव लग रही है, उतनी है नहीं. लेकिन भोपाल जैसे शहर को पृष्ठभूमि में रखने वाली यह फिल्म अपने पिछड़ेपन के चलते बहुत कुछ ऐसा दिखाती है जो हम अक्सर ही अपने आस-पास घटते देखते हैं.

उदाहरण के लिए, ‘मोतीचूर चकनाचूर’ के एक दृश्य में ऐनी चार लाख रुपए लेकर गहनों की शॉपिंग करने के लिए जाती है. इस दृश्य पर घोर रिग्रेसिव होने का आरोप लगाते हुए यह सवाल किया जा सकता है कि इतने पैसे हाथ में आने के बाद भी यह नायिका अकेले विदेश जाने का कोई गुप्त प्लान बनाकर क्रांति क्यों नहीं कर रही है? लेकिन यहां पर शादी के बाद ही अरमान पूरे करने को किस्मत मानकर और गहनों के लिए प्रेम दिखाकर, ऐनी उन तमाम लड़कियों के हाल बता देती है जिनकी सोच को कभी इतना बढ़ने ही नहीं दिया जाता कि वे शादी से अलग अपने बारे में कुछ सोच सकें.

ऐसा ही कुछ विभा छिब्बर का किरदार दहेज के मामले में करता है और सिर्फ इसलिए इसे लेने का हामी है कि वही दहेज आगे बढ़ाकर उसे बेटी के ब्याह की ‘समस्या’ भी निपटानी है. यह और बात है कि फिल्म इस तरह की खामियों को दिखाने के बावजूद उन पर अपनी तरफ से कुछ नहीं सुझाती है. उल्टे यह इन्हें जिंदगी के किसी ज़रूरी हिस्से की तरह ट्रीट करती है और दिलचस्प संवादों की मदद से मनोरंजन का मसाला बनाकर पेश करती है. अंत में एक हैप्पी एंडिंग फिल्म बनकर खुश हो लेती है. दूसरे शब्दों में कहें तो अगर आप सरोकारों वाला सिनेमा देखना पसंद करते हैं तो ‘मोतीचूर चकनाचूर’ आपके लिए बिल्कुल नहीं है. इसके अलावा, यह फिल्म एक बुरी खबर यह भी सुनाती है कि छोटे शहरों की कहानियां कहने वाला फॉर्मूला अब बॉलीवुड का नया क्लीशे बन चुका है.

अभिनय की बात करें तो नवाजुद्दीन सिद्दीकी एक बार फिर वही करते हैं जिसके लिए वे जाने जाते हैं यानी वे परदे पर एक कॉमन मैन की जानदार भूमिका निभाते हैं. हालांकि उन्होंने बहुत ईमानदारी से यहां पर काम किया है, लेकिन उनके किरदार के पास करने के लिए कुछ भी ऐसा नहीं था जो उन्होंने पहले नहीं किया हो. फिर भी फिल्म को देखने लायक बनाए रखने का क्रेडिट उन्हें ही जाता है. वहीं, अथिया शेट्टी यहां पर आश्चर्यचकित करती हैं और नवाज़ के सामने एक डिग्री भी कमतर नहीं लगतीं. हालांकि कुछेक सोलो दृश्यों में अथिया के एक्सप्रेशन्स ज़रूर खटकते हैं लेकिन इनका फिल्मांकन ऐसा है कि यह निर्देशन की कमी ज्यादा लगती है. इनके अलावा नवनी परिहार, विभा छिब्बर और विवेक मिश्रा भी अपनी भूमिकाओं में प्रभावित करने वाला काम करते हैं. लेकिन सबसे ज्यादा महफिल लूटती हैं अधेड़ उम्र की कुंवारी मौसी बनीं करुणा पांडेय . टीवी का जाना-पहचाना चेहरा रहीं करुणा यहां पर ढेर सारे ठहाकों की वजह बनती हैं.

कुछ और खामियों की बात करें तो भोपाल के बैकग्राउंड वाली इस कहानी में बड़े ताल के अलावा शहर का कहीं भी पहचान में न आना खटकता है. इसके अलावा संवादों की भाषा ऐसी है कि अगर कोई एक बार भी भोपाल गया हो तो वह बता देगा कि वहां इस तरह की भाषा नहीं बोली जाती. यहां पर अगर भोपाल के बजाय इसे सागर या ग्वालियर बताया जाता तो यह गले से उतारी भी जा सकती थी. ‘मोतीचूर चकनाचूर’ से बतौर निर्देशक डेब्यू कर रही देबमित्रा बिस्वाल अगर इन खासियतों का ख्याल रख लेतीं तो भविष्य में उनसे थोड़ी और उम्मीदें लगाई जा सकतीं थीं. फिलहाल, उनकी इस फिल्म के बारे में कहा जा सकता है कि ‘मोतीचूर चकनाचूर’ मोतीचूर का वह लड्डू है जिसे कोई खाए (देखे) तो भी न पछताए और न खाए तो भी न पछताए.