महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों को लेकर जब प्रचार अभियान चल रहा था तो पूरे राज्य में यही माहौल बना कि प्रदेश में इस बार वोट सिर्फ भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर ही नहीं पड़ेंगे बल्कि प्रदेश के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नाम पर भी लोग भाजपा को वोट देंगे. चुनावी नतीजों में भी जब भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी तो यही कहा गया कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की अगुवाई वाली भाजपा के पहले क्षत्रप के तौर पर देवेंद्र फडणवीस ने खुद को स्थापित किया है. यहां तक कहा गया कि महाराष्ट्र की राजनीति में फडणवीस ने नितिन गडकरी जैसे दिग्गज नेताओं को भी पीछे छोड़ दिया है और खुद को महाराष्ट्र भाजपा में नंबर एक के तौर पर स्थापित कर लिया है.

लेकिन जब भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ने वाली शिवसेना ने मुख्यमंत्री पद को लेकर लोकसभा चुनावों से पहले बनी सहमति की बात की तो देवेंद्र फडणवीस के दोबारा मुख्यमंत्री बनने की संभावनाएं हर दिन के साथ धूमिल होती चली गईं. अंत में महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लग गया.

महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के नतीजों के बाद जिस तरह से भाजपा और शिवसेना के संबंधों में दरार पैदा हुई और उसमें देवेंद्र फडणवीस की जो भूमिका रही, उसे लेकर तरह-तरह की बातें चल रही हैं. अधिकांश राजनीतिक जानकार मान रहे हैं कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने महाराष्ट्र में सरकार बनाने की कोशिशों में देवेंद्र फडणवीस को अकेला छोड़ दिया.

प्रदेश में दोबारा मुख्यमंत्री बनने की कोशिशों में फडणवीस के अलग-थलग पड़ने के संकेत कई बातों से मिलते हैं. जब से अमित शाह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हैं, तब से यह देखा गया है कि किसी भी प्रदेश में सरकार बनाने की बात को लेकर वे काफी हरकत में रहते हैं. अगर किसी राज्य में भाजपा के पास जरूरी संख्या बल नहीं हो तो अमित शाह स्थितियों को अपने हाथों में लेकर तुरंत इसे जुटाने के काम में लग जाते हैं. इसमें सहयोग के लिए वे तुरंत ही पार्टी के कुछ वरिष्ठ और विश्वस्त नेताओं को लगाते हैं. गोवा में कांग्रेस के मुकाबले कम संख्या होने के बावजूद अमित शाह ने पार्टी के वरिष्ठ नेता नितिन गडकरी को वहां भेजा और जरूरी संख्याबल का बंदोबस्त किया.

महाराष्ट्र के साथ ही हरियाणा के भी चुनाव परिणाम आए थे. इस राज्य में भी भाजपा को अपने दम पर स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था. लेकिन भाजपा के नेता ही बताते हैं कि पहले अमित शाह ने कुछ राष्ट्रीय और स्थानीय नेताओं के सहयोग से जरूरी संख्या में निर्दलीय विधायकों को भाजपा के पक्ष में लाने का काम किया और बाद में भाजपा की धुर विरोधी रही जननायक जनता पार्टी को भी अपने साथ लाने में कामयाबी हासिल की.

लेकिन अमित शाह के स्तर पर ऐसी कोई कोशिश महाराष्ट्र में नहीं दिखी. खुद देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद जो प्रेस वार्ता की उसमें उन्होंने बताया कि उद्धव ठाकरे से उन्होंने बात करने की कोशिश की थी लेकिन इसमें वे सफल नहीं रहे. न तो फडणवीस ने यह बताया कि अमित शाह या पार्टी के राष्ट्रीय नेताओं की ओर से शिवसेना से कोई बातचीत की कोशिश हुई और न ही शिवसेना की ओर से इस बात की जानकारी दी गई. इसका स्पष्ट मतलब यही है कि अमित शाह के स्तर पर शिव सेना से संवाद करके कोई रास्ता निकालने की कोशिश नहीं हुई. इसके बजाय शिवसेना से बात करने का काम उन्होंने महाराष्ट्र भाजपा के नेताओं या देवेंद्र फडणवीस पर छोड़ दिया.

अधिकांश लोगों को इस बात पर भी हैरानी हुई कि अमित शाह ने किसी राष्ट्रीय स्तर के भाजपा नेता को भी शिवसेना से बात करके सरकार बनाने की संभावनाओं को तलाशने का काम नहीं दिया. जिन नितिन गडकरी को अमित शाह ने गोवा में सरकार बनाने के काम में लगाया था, उनकी सेवाएं उन्होंने गडकरी के गृह राज्य में ही नहीं लीं, वह भी तब ​जब शिवसेना के नेता किशोर तिवारी ने सार्वजनिक तौर पर यह कहा कि अगर गडकरी मध्यस्थता करेंगे तो प्रदेश में भाजपा-शिव सेना की सरकार बनाने का रास्ता साफ हो जाएगा. ठाकरे परिवार से गडकरी के अच्छे संबंधों को देखते हुए राजनीतिक जानकार यह उम्मीद कर रहे थे कि बीच-बचाव के काम में अमित शाह नितिन गडकरी को लगाएंगे. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया.

अब सवाल यह उठता है कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने महाराष्ट्र जैसे राज्य में सरकार बनाने की कोशिशों में देवेंद्र फडणवीस को अलग-थलग क्यों छोड़ दिया? भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेताओं से बात करने के बाद अलग-अलग तरह की बातें सामने आ रही हैं. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘जहां तक मेरी जानकारी है, शिवसेना को लेकर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को आश्वस्त करने का काम अक्सर देवेंद्र फडणवीस करते रहते थे. उनको लगता था कि प्रदेश में शिवसेना कभी अलग राह ले ही नहीं सकती है. जबकि शीर्ष नेतृत्व शिवसेना से थोड़ा सतर्क होकर चलना चाहता था. शिव सेना से अधिकांश बातचीत फडणवीस के स्तर पर ही होती थी और अमित शाह की मौजूदगी में उन बातों पर मुहर लगाने का काम होता था. संभवत: ये भी एक वजह रही होगी कि चुनाव परिणाम ​के बाद भी शिवसेना से बातचीत का काम फडणवीस के भरोसे ही छोड़ा गया.’

भाजपा के एक अन्य नेता इस बारे में एक जानकारी देते हैं, ‘लोकसभा चुनावों में अमित शाह शिवसेना से अलग होकर महाराष्ट्र में चुनाव लड़ना चाहते थे. लेकिन देवेंद्र फडणवीस ने उन्हें इस बात के लिए मनाया कि भाजपा को शिवसेना के साथ मिलकर ही चुनाव लड़ना चाहिए. एक तरह से कहा जाए तो अमित शाह इच्छा नहीं होने के बावजूद गठबंधन में लोकसभा चुनाव लड़ने को तैयार हुए थे. हो सकता है कि विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद इस वजह से भी देवेंद्र फडणवीस को शिवसेना से बातचीत करने के लिए अकेले छोड़ दिया गया हो.’

वे एक और संभावना जाहिर करते हुए कहते हैं, ‘महाराष्ट्र के भी कुछ स्थानीय नेता देवेंद्र फडणवीस को पसंद नहीं करते हैं. लेकिन प्रदेश स्तर के निर्णयों में पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने इन नेताओं की कभी नहीं सुनी और फडणवीस के कहे अनुसार फैसले किए. इसके बावजूद 2014 के मुकाबले भाजपा की सीटें घट गईं और वो भी तब जब भाजपा गठबंधन में चुनाव लड़ी. फिर शिवसेना के साथ भी फडणवीस सामंजस्य नहीं बना पाए. इससे हो सकता है कि शीर्ष नेतृत्व को यह लगा ​हो कि फडणवीस के खिलाफ जो बात दिल्ली तक पहुंच रही थी, उनमें कुछ सच्चाई है और इसके आधार पर यह राय बनी हो कि महाराष्ट्र के इस संकट के लिए फडणवीस खुद जिम्मेदार हैं.’

महाराष्ट्र में सरकार बनाने की कोशिशों में देवेंद्र फडणवीस जिस तरह से अलग-थलग पड़ गए, उसे देखते हुए राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आगे जब भी भाजपा के लिए प्रदेश में सरकार बनाने की संभावना पैदा होगी, नेतृत्व के लिए फडणवीस को नए सिरे से संघर्ष करना होगा.