ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री बीजू पटनायक राजनीति में आने से पहले पायलट थे. 1940 के दशक की शुरुआत में रॉयल इंडियन एयर फोर्स का पायलट रहते हुए उन्होंने म्यांमार सहित कई युद्घग्रस्त क्षेत्रों में अपनी सेवाएं दी थीं. इसके चलते उन्हें वायु सेना के कुशलतम पायलटों में माना जाता था. हालांकि बाद में नौकरी छोड़कर वे आजादी के आंदोलन में शामिल हो गए और नेहरू जी के करीबी लोगों में शुमार किए जाने लगे.

भारत की आजादी के समय ही पटनायक ने बतौर पायलट एक ऐसा साहसिक काम भी किया था जिसके लिए इंडोनेशिया सरकार द्वारा उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान ‘भूमिपुत्र’ से सम्मानित किया गया.

इंडोनेशिया, सन 1816 से 1941 तक डच (नीदरलैंड का) उपनिवेश रहा था. 1941 में यह जापान के कब्जे में चला गया. लेकिन 1945 में द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान की हार के साथ ही इंडोनेशिया ने खुद को आजाद देश घोषित कर दिया. डॉ सुकर्णो के नेतृत्व में यहां नई सरकार का गठन हुआ और उनके विश्वासपात्र डॉ सुल्तान जहरीर प्रधानमंत्री नियुक्त किए गए. नेहरू इस दक्षिणपूर्वी एशियाई देश की आजादी के कट्टर हिमायती थे. 1946 में जब भारत में अंतरिम सरकार गठित हुई तो सुकर्णो व जहरीर ने तुरंत नेहरू से संपर्क साधा और वे उनके अच्छे मित्र बन गए. इस दौरान इंडोनेशिया में लगातार नीदरलैंड का दखल जारी था. जापान की हार के बाद वह इस देश पर दोबारा कब्जा करना चाहता था और इस लक्ष्य को पाने के लिए जुलाई 1947 में उसकी सेना ने यहां हमला कर दिया. हमले के दौरान डच सेना ने मुख्य भूमि को घेर लिया, साथ ही वायु और जल मार्ग को सील कर दिया गया. सुकर्णो जकार्ता में नजरबंद कर दिए गए. अच्छा यह था कि इसके पहले ही वे नेहरू को मदद के लिए संदेशा भेज चुके थे.

नेहरू चाहते थे कि इस स्थिति में अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इंडोनेशिया की हालत बताने के लिए वहां का कोई नेता सामने आए. लेकिन इंडोनेशिया से किसी भी नेता को बाहर निकालना इतना आसान नहीं था. ऐसे में उन्होंने इस काम की जिम्मेदारी अपने विश्वासपात्र सहयोगी बीजू पटनायक को सौंपी. पटनायक पहले भी ऐसे खतरनाक मोर्चों पर काम कर चुके थे इसलिए उन्हें इसमें कोई झिझक नहीं हुई. पटनायक को पहले ही सूचना मिल चुकी थी कि इंडोनेशिया के प्रधानमंत्री जहरीर जावा द्वीप पर हैं. यहां डच सेना की इतनी कड़ी सुरक्षा नहीं थी. इसलिए पटनायक अपना प्लेन लेकर जावा की तरफ गए. यहां पर उनके प्लेन को निशाना बनाने की कोशिश की गई लेकिन वे सुरक्षित हवाई पट्टी तक पहुंच गए. जहरीर यहां पहले से उपस्थित थे. पटनायक उन्हें अपने साथ लेकर सिंगापुर होते हुए दिल्ली आ गए.

इंडोनेशिया का एक बड़ा नेता अब पूरी दुनिया के सामने डच सेना की ज्यादतियां बताने के लिए उपस्थित था. जहरीर ने नेहरू के साथ मिलकर कई विदेशी नेताओं से मंत्रणाएं कीं और मामले को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में उठाया. इसका नतीजा यह रहा है कि आखिरकार डच सेना को इंडोनेशिया में अपनी कार्रवाई रोकनी पड़ी और एशिया में एक और उपनिवेश पूरी तरह आजाद हो गया.

अपने आजादी के संघर्ष में पटनायक के योगदान को देखते हुए बाद में इंडोनेशिया सरकार ने उन्हें मानद नागरिकता देते हुए ‘भूमिपुत्र’ सम्मान दिया. कहा जाता है कि सुकर्णो की बेटी मेघावती का नाम पटनायक ने ही उन्हें सुझाया था.