‘मारूंगा तो मर जाएगा, दोबारा जनम लेने से डर जाएगा’, कुछ इस तरह के संवादों वाली मरजावां का ट्रेलर सोशल मीडिया पर खासा चर्चित रहा था. इसकी वजह यह थी कि इसने सोशल मीडिया को ढेर सारा मीम कंटेंट दे दिया था जो अक्सर ही हमें अपनी स्क्रीन पर नज़र आता रहता है. इस शुक्रवार सिद्दार्थ मल्होत्रा, तारा सूतारिया और रितेश देशमुख की मुख्य भूमिकाओं वाली यह फिल्म रिलीज हो चुकी है. इसका लेखन और निर्देशन मिलाप झवेरी ने किया है. हालांकि फिल्म के ट्रेलर की तरह ही इसके संगीत ने भी काफी लोकप्रियता बटोरी थी लेकिन फिल्म को मिलने वाली तारीफों की मात्रा कम ही कही जा सकती है.

फिल्मफेयर - 1.5/5

फिल्मफेयर पर प्रकाशित समीक्षा के अनुसार मरजावां को देखना ठीक वैसा ही है जैसा उन घिसी-पिटी चीजों की लिस्ट पढ़ना जो 80 के दशक में बॉलीवुड फिल्मों का हिस्सा हुआ करती थीं. यहां पर भी उस दौर की तरह एक पॉवरफुल माफिया, उसका बिगड़ैल बेटा, बीस लोगों को एक साथ पीटने वाला हीरो और एक सुंदर-सहृदय हीरोइन का किस्सा दिखाया गया है. समीक्षक देवेश शर्मा ने मरजावां को डेढ़ स्टार देते हुए कहा है कि अगर यह फिल्म सिद्धार्थ मल्होत्रा को बतौर एक्शन हीरो स्थापित करने की कोशिश थी तो इसे पूरी तरह से नाकाम माना जाना चाहिए.

स्क्रोल - 1.5/5

स्क्रोल डॉट इन के लिए उदिता झुनझुनवाला लिखती हैं कि मिलाप झवेरी की इस फिल्म के एक्शन दृश्य़ ठीक-ठाक कहे जा सकते हैं. इसके अलावा वे फिल्म के माहौल के मुताबिक तुकबंदी वाले संवादों का भी ठीक इस्तेमाल करते हैं. यह कारगर साबित हो सकता था अगर कहानी में थोड़ा दम होता और किरदार कार्डबोर्ड के कटआउट की तरह खड़े होने की बजाय कुछ आपसी केमिस्ट्री दिखाते.

टाइम्स ऑफ इंडिया - 2.5/5

टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक मरजावां में ऐसा कुछ भी नहीं है जिस पर मरा-मिटा यानी फिदा हुआ जा सके. अखबार ने सिद्धार्थ मल्होत्रा की स्क्रीन प्रजेंस को बेहतरीन बताते हुए लिखा है कि वे फिल्म में एक ईमानदार परफॉर्मेंस देने की कोशिश करते हैं. लेकिन किरदार और पटकथा की कमजोर लिखाई के चलते वे इसे प्रभावशाली नहीं बना सके हैं. ऐसा ही कुछ फिल्म की नायिका तारा सुतारिया के साथ भी है जो फिल्म में सुंदर लगने के अलावा और कुछ नहीं कर पाती हैं.

द क्विंट - 1/5

द क्विंट के लिए स्तुति घोष लिखती हैं कि मरजावां में अस्सी के दशक का रिवेंज ड्रामा देखना ठीक वैसा ही है जैसे किसी चीज का एक्सपायरी डेट के पहले ही खराब हो जाना. इसके ऊपर से ‘मारूंगा कनपटी पे, दर्द होगा गणपति पे’ सरीखे इंजरी पर इनसल्ट का नमक छिड़कने वाले इसके संवाद इसे जरूरत से ज्यादा ड्रामैटिक बना देते हैं. घोष ने फिल्म को एक स्टार दिया है और कहा है कि फिल्म में ढाई किलो के दिमाग का जिक्र है, लेकिन पटकथा और संवाद लिखने वालों में से कोई भी इसका इस्तेमाल करता हुआ नहीं दिखता.

द हिंदू - 1/5

द हिंदू के लिए नम्रता जोशी लिखती हैं कि मरजावां एक अजीब तरह से स्ट्रक्चर की गई फिल्म है. शुरूआत से इंटरवल तक का हिस्सा अपने आप में एक कम्प्लीट फिल्म है. मिलाप झवेरी को यहीं पर फिल्म खत्म कर देनी चाहिए थी लेकिन इसकी बजाय वे एक अझेल और पॉइंटलेस सेकंडहॉफ देखने पर आपको मजबूर कर देते हैं.