बाबरी मस्जिद को लेकर चल रहे लंबे विवाद का सर्वोच्च न्यायालय ने एक अनोखा फैसला देकर समापन करने का प्रयत्न किया है. यह फ़ैसला अनोखा इसलिए है कि उसमें न्यायालय ने न्याय के बजाय आस्था के पक्ष में अपने को रखा है. स्वयं कहा है कि जहां बाबरी मस्जिद बनी थी वह किसी मंदिर को ध्वस्त कर बनी थी ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है. यह भी कहा कि वहां चोरी से रामलला की मूर्तियां रखना ग़ैरक़ानूनी था और मसजिद का ध्वंस भी ग़ैरक़ानूनी था. बावजूद ज़मीन उन्हीं को दे दी क्योंकि उनकी ऐसी आस्था है. इस आस्था का कोई साक्ष्य न्यायालय के सामने नहीं आया सिवाय कुछ विदेशी यात्रियों के विवरणों के. ज़ाहिर है कि आस्था को साक्ष्य की दरकार नहीं. आस्था के आधार पर फ़ैसला करने का आशय यह भी है कि आस्था के आगे क़ानून नहीं टिकता. न्यायालय ने न्याय को छोड़कर आस्था के साथ जाने का फैसला लिया. इस आस्था द्वारा न्याय के अतिक्रमण के आशय और परिणाम दूरगामी होनेवाले हैं. इस अनोखे फ़ैसले को लेकर सभी 5 जजों की पूर्ण सहमति भी आश्चर्यकारी है. उनमें से किसी ने भी उसके केंद्र में हुए न्याय और आस्था के द्वन्द्व या अन्तर्विरोध को न पहचाना, न दर्ज़ किया.

यह थोड़ा विचित्र है कि मर्यादा पुरुषोत्तम का मंदिर वहां बनेगा जहां इनके नाम पर कई ग़ैर क़ानूनी अतिक्रमण हुए हैं. मुसलिम समुदाय के अधिकांश वर्गों ने इसे दशकों से क्या सदियों से चले आ रहे झगड़े की समाप्ति के रूप में, अपनी असहमतियों बरक़रार रखते हुए, स्वीकार कर लिया है. जिस तरह का डरावना माहौल बनाया गया है उसमें इसके अलावा कोई चारा भी नहीं है. तथाकथित अन्याय की भावना अब हिंदुओं से हटकर मुसलमानों में चली जायेगी. जो पांच एकड़ ज़मीन उन्हें मस्जिद बनाने के लिए दिये जाने का फ़ैसले में जिक्र है, उसे स्वीकार न करने के कई वक्तव्य आये हैं. इससे एक आशंका यह भी होती है कि इस मामले का समापन शायद न हो पाये.

फ़ैसले के बाद जो प्रतिक्रियाएं हुई हैं, उनमें मुसलमानों की व्यापक प्रतिक्रिया के एक पहलू को नज़रअन्दाज़ नहीं किया जा सकता है. असहमति, अस्वीकार, न्याय न मिल पाने की स्थिति के बावजूद इस अल्पसंख्यक वर्ग ने पूरे देश में शांति बनाये रखी है और किसी उग्रता या हिंसा से अपने को अलग रखा है. उन्होंने ऐसा कर अपनी भारतीय नागरिकता, देशभक्ति और संविधान में अब भी क़ायम आस्था का बहुत सशक्त इज़हार किया है. उनके साथ न्याय नहीं हुआ है पर उन्होंने शांति, अमन-चैन और भाईचारा बनाये रखे हैं और यह बहुत सशक्त और मुखर सन्देश भेजा है कि वे भारत का अटूट हिस्सा हैं और रहेंगे. क्या यह सन्देश व्यापक भारतीय समाज और राष्ट्र द्वारा अनुसुना-अनसमझा जा सकता है?

जो भी हो, अगर एक भव्य राम मंदिर बनना ही है तो उसमें हर दिन सुबह और शाम सेवाग्राम आश्रम में महात्मा गांधी द्वारा शुरू की गयी और अब तक अबाध चली आयी प्रार्थना-सभा हो जो सर्वधर्मसमभाव पर आधारित है और जिसमें सभी धर्मों में पाठ होते हैं. तब वह मंदिर राम भर का नहीं भारतीय समाज का भी किसी हद तक मंदिर बन जायेगा.

आलोचना की भव्यता

आलोचना की केंद्रीयता का समय बीत चुका है. अभी हाल तक उसकी भव्य उपस्थिति और सघन सक्रियता थी. इसका तीख़ा अहसास इस समय अमरीकी-अंग्रेज़ी साहित्य में हो रहा है जहां हाल ही में एक मूर्धन्य हैरोल्ड ब्लूम का निधन हुआ. जिस कोटि का विश्वकोषीय दिमाग़ इस पचास सालों से अधिक सक्रिय आलोचक का था उस तरह के ज्ञान और संवेदना से, कुशाग्रता और नयी शास्त्रीयता से उत्प्रेरित अब एक ही आलोचक बचा जार्ज स्टााइनर. उनकी आयु भी नब्बे से ऊपर है.

ब्लूम ने शुरू किया था प्रभाव की बेचैनी को एक रचनात्मक शक्ति के रूप में पहचान कर और फिर यह स्थापना की कि पश्चिम में मानवीयका रूपाकार शेक्सपीयर ने तय और निर्धारित किया. ब्लूम की यह मान्यता भी थी कि सारा पश्चिमी मनोविज्ञान बाइबिल और शेक्सपीयर ने रचा है. मैंने कुछ समय पहले उनकी अन्तिम पुस्तक ‘दि डेमान नोज़’ खरीदी-पढ़ी थी. उसका उपशीर्ष है: ‘साहित्यिक महानता और अमरीकी उदात्त’. ब्लूम ने बारह अमरीकी लेखक वाल्ट विटमैन से लेकर हार्टक्रेन तक चुने हैं और उनके माध्यम से अमरीकी उदात्त की रचना-यात्रा को समझने और समझाने की कोशिश की है. इन सभी लेखकों की प्रतिभा में उन्हें एक तरह का अतिमानवीय तत्व नज़र आता है. ब्लूम सिर्फ़ स्वयं इन मूर्धन्यों से संवाद नहीं करते बल्कि उनके बीच भी संवाद खोजते-रचते हैं.

यह दिलचस्प है कि जब उत्तर आधुनिकता ने बहुत जोशोख़रोश से अनेक प्राचीन आख्यानों को, जिनमें उदात्त का आख्यान भी था, अपनी समझ से ध्वस्त कर दिया, ब्लूम उसका पुनर्वास करते हैं। उनका मत है कि मनुष्य, अपनी भावना और वाणी में, मानवीय का अतिक्रमण कर सकता है. वे इस मत के भी हैं कि मानवीय से आगे क्या है- ईश्वर या देवता, डेमान या प्रकृति, इस पर बड़ी असहमति है. पर मानवीय के रेंज को परिभाषित करना भी उतना ही कठिन और दुर्बोध है.

लगभग 500 पृष्ठों की इस अनोखी पुस्तक में ब्लूम बहुत सारी कविताओं, उपन्यासों, कथाओं आदि को बहुत जतन, सूक्ष्मता और धीरज से पढ़ते हैं. उनकी सभी स्थापनाएं इस सूक्ष्म धीर पाठ से निकलती है. एक जगह पर क्रेन की कविता की व्याख्या करते हुए वे शैली के हवाले से यह स्थापना करते हैं कि हमें आसान सुखों के बजाय कठिन सुखों की तलाश करना चाहिये. अन्यत्र ब्लूम ईलियट को अन्ततः खारिज करते हुए कहते हैं कि ईलियट की कट्टरता, स्त्रियों की उनकी नापसन्दगी और सामान्य मानवीय अस्तित्व की अवमानना उन्हें क्षुब्ध करती है. हम साहित्य सिर्फ़ सौन्दर्यशील होकर ही नहीं पढ़ते बल्कि ज़िम्मेदार पुरुषों और स्त्रियों की भी तरह पढ़ते-गुनते हैं. भीषण प्रतिभा के बाद भी मानवीयता के इस पैमाने पर ईलियट खरें नहीं उतरते.

ब्लूम एमिली डिकेनसन में, बिना सीधे नीत्शे या उनके विचार को जाने, नीत्शे का व्यथा का काव्यशास्त्र चरितार्थ होते देखते हैं. ब्लूम को पढ़ना बहुत सारे महानों को ताज़गी में पढ़ना है.

सौ के निकट

सैयद हैदर रज़ा के हिंदी में अलग क़िस्म की पुस्तकें लाने के इरादे से शुरू की गयी रज़ा पुस्तकमाला के तीन बरस होने आये. लक्ष्य तो था कि सौ पुस्तकें प्रकाशित कर हम इस माला का समापन कर देंगे. पर बाद में लगा कि जिस तरह की पुस्तकें मिल रही है उनकी संख्या डेढ़ सौ तक होगी. तो लक्ष्य सौ से बढ़ाबर एक सौ पचास कर दिया गया है. सोचा तो यह भी था कि पुस्तकों का लक्ष्य रज़ा शती के आते-न आते पूरा कर लिया जायेगा. अब आकलन यह है कि डेढ़ सौ का लक्ष्य अगले वर्ष ही पूरा हो जायेगा जबकि शती के लिए एक से अधिक वर्ष बचा होगा.

सौ का लक्ष्य तो इस वर्ष के अंत तक पूरा हो जायेगा. इन पंक्तियों के लिखते समय लगभग 75 पुस्तकें तो आ ही गयी हैं. जो नयी खेप परसों आयी है राजकमल से उनमें तीन जीवनियां हैं- तारानन्द वियोगी लिखित नागार्जुन की जीवनी ‘युगों का यात्री’, विष्णु नागर लिखित रघुवीर सहाय की जीवनी ‘असहमति में उठा एक हाथ’ और मूर्तिकार मदन लाल लिखित कलाकार-कलागुरु शंखो चौधुरी की जीवनी ‘शंखो चौधुरी’. यह उल्लेखनीय है कि तीनों ही जीवनियां रज़ा फैलोशिप के अंतर्गत लिखी गयी है.

दार्शनिक रामचन्द्र गांधी द्वारा तैयब मेहता के एक त्रिपट चित्र पर लिखी गयी पुस्तक ‘स्वराज’ इसी नाम से मदन सोनी द्वारा अनूदित प्रकाशित हो गयी है. कवि प्रभात त्रिपाठी के अनुवाद में उड़िया कवि देवदास छोटराय की प्रेमकविताओं का संग्रह ‘मल्लिका’ भी आ गया है और अज्ञेय की जेल में लिखी गयी अंग्रेज़ी कविताओं का संग्रह नन्दकिशोर आचार्य के हिन्दी अनुवाद में ‘बन्दी जीवन और अन्य कविताएं’ नाम से आया है जिसकी भूमिका 1938 में जवाहरलाल नेहरू ने लिखी थी. विद्वान आलोचक वागीश शुक्ल की नयी पुस्तक ‘चन्द्रकान्ता (सन्तति) का तिलिस्म’ भी इसी कम में प्रकाशित हो गयी है. मानवीय जीवन के लिए दो बातें अनिवार्य माननेवाले अस्तित्ववादी चिन्तक मार्टिन बूवर का आग्रह सहभागिता और पारस्परिकता पर था. उनकी एक पुस्तक का हिन्दी में अनुवाद नन्दकिशोर आचार्य ने ‘मैं और तुम’ शीर्षक से किया है. मालवा अंचल में रहनेवाले पाँच शास्त्रीय संगीतकारों पर इंजीनियर अश्विनी कुमार दुबे ने हिन्दी में जो पुस्तक लिखी है वह ‘पंचामृत’ नाम से प्रकाशित है. शायद इसी सप्ताह युवा कवि प्रकाश साव की स्मृति में स्थापित ‘प्रकाश-वृत्ति’ के अन्तर्गत वाणी प्रकाशन से युवा लेखकों की पहली पुस्तकों के रूप में पूनम अरोड़ा (कामनाहीन पत्ता) और लवली गोस्वामी के कवितासंग्रह (उदासी मेरी मातृभाषा है) और राजेश्वर त्रिवेदी की कलापुस्तक (उत्सुक)भी प्रकाशित हो जायेंगी.