स्तन कैंसर से पीड़ित अनन्या मुखर्जी की मौत साल 2018 में हो गई. एक आम कामकाजी महिला से जीवट लेखिका तक का सफर तय करने वाली अनन्या ने यह डायरी तब लिखी थी जब वे कैंसर का इलाज करवा रहीं थीं. मूलरूप से अंग्रेजी में, ‘टेल्स फ्रॉम द टेल एंड - माय कैंसर डायरी’ शीर्षक से प्रकाशित इस किताब का हिंदी अनुवाद प्रभात रंजन ने किया है.


स्तन मां काली जैसे हो गए हैं

जो मेरे करीबी हैं वह इस बात को जानते हैं कि गरिमा की महीन सी चादर के पीछे मैं हमेशा से ही बकवास करने वाली और अभद्र रही हूं. (मेरे पति इसे ठीक करते हुए एकदम बाजारू कहते हैं) क्या किया जा सकता है? मैं ऐसी ही हूं.

अपने मन में, मैंने स्तनों को हमेशा ही ‘बूब्स’ कहा जो शरीर का एक हिस्सा है, जिसको शारीरिक आकर्षण, सुख और मस्ती के लिए बनाया गया है. मेरे लिए स्तनों का महत्व इससे ज्यादा कभी नहीं था. जब मेरी कुछ दोस्त मां बन गई और फिर तस्वीरें खिंचवाते वक्त जब उनके बच्चे अक्सर उनके स्तन पकड़कर उनकी तस्वीरें खराब करने लग गए तब मैंने स्तनों को मातृत्व सुख, सौम्यता और पोषण के प्रतीक के रूप में समझा.

अब मैं स्तनों को काली मां के रूप में देखती हूं, और मेरे स्तनों ने अब रौद्र रूप ले लिया है. यह मेरे शरीर का उपयोग करके घातक और भयानक होते जा रहे हैं. मेरा जीवन समाप्त करने की कोशिश कर रहे हैं और इन्हें किसी भी तरह रोका नहीं जा सकता है. शायद स्तनों को मजाक की वस्तु समझने, उनका उपहास करने, सुख के लिए उनका उपयोग करने के हमारे सदियों पुराने रिवाज़ ने उन्हें गुस्सैल लुटेरे में बदल दिया है. काली के रूप वाले मेरे स्तन अपने हिस्से का सम्मान मांग रहे हैं. कौन जानता है, उसके बाद यह अपना उपद्रवी रूप बदल लें.

प्यार कर ले

मेरी नसों में अठारवीं कीमो की दवाइयां दौड़ रही हैं लेकिन आज मेरा दिमाग किसी दूसरे ज़रूरी काम में अटका हुआ है, मसलन वैलेंटाइन डे. मुझे याद है कि अपने किशोरावस्था में मैं इसे लेकर कितनी उत्तेजित महसूस करती थी, और फिर बाद में भी यह पागलपन वैसे ही बना रहा. लेकिन आज मेरा दिल जोर से गुनगुना रहा है! पुराने फिल्मी गाने की कुछ पंक्तियां (मैंने गाने की कोशिश भी की लेकिन दिन में मेरा ध्यान रखने वाली नर्स ने मुझे ऐसे घूरा कि मैं चुप हो गई). मेरे प्रियजनों के लिए!

आज से अपना वादा रहा
हम मिलेंगे हर इक मोड़ पर
दिल की दुनिया बसाएंगे हम
ग़म की दुनिया का डर छोड़कर
जीने मरने की किसको पड़ी
प्यार कर ले घड़ी दो घड़ी...

(अगर आपने यह गाना नहीं सुना है तो सुनिएगा, लेकिन मेरी सख्त सलाह है कि बिनी वीडियो के सुनिएगा!)

अपनी तारीफ का मौसम

एक बार की बात है, मेरे एक प्रेमी ने कहा था, तुमसे पहले मैंने इतने गुलाबी होंठ किसी के नहीं देखे मैं अपनी तारीफ सुनकर इतरा उठी थी और गेहुंए रंग पर मुझे गर्व होने लगा था. अब आईने ने मेरी तरफ रूखे होंठ, बेरंग रंगत और बुझी हुई आंखें दिखाए.

तो, अब मेरे पास क्या रह गया है? मैंने पूछा.

पतिदेव मुझे सहारा देते हुए कहते हैं कि यह बीमार इंसान का पीलापन है. जब मैंने हमेशा की तरह उसको ठंडी निगाहों से घूरा तो वह फिर अपने मोबाइल गेम में लग गया. मुझे अनायास ही याद आती है अपनी मुस्कान और मैं मुस्कुराने लगती हूं. इससे तो एक पूरा कमरा ही रोशन हो जाए. हां, इसकी चमक झाड़फानूस सी तो नहीं होगी और कमरा भी ज्यादा बड़ा नहीं होना चाहिए. और जब ऐसी मुस्कुराहट आपके साथ हो तो इतना पक्का है कि अंधेरे में टटोलना तो नहीं पड़ेगा.

चरित्रहीन

जब शुरू-शुरू में मेरे बाल झड़ने शुरू हुए, तो मैंने उसको स्वीकार कर लिया. गंजे सिर ही घूमती रहती थी. मुझे ध्यान रखना चाहिए था कि मैं कोई लीजा रे नहीं थी कि यह सब चल जाए. मैं उबले अंडे जैसी दिखती हूं. मुझे आस-पड़ोस की आंटियां दया की नजर से देखती हैं. रास्ते चलते लोग रुक कर देखने लगते हैं. बच्चों को मैं भूत सी नजर आती हूं. और वह पुरुष जो बातें करते समय मेरे वक्षस्थल को घूरते रहते थे, अब वक्ष के साथ मेरे गंजे सिर को देखने लगते हैं. मैं भी परेशान हो जाती हूं. फिर मैं जाकर पांच अंकों की कीमत वाला विग खरीदती हूं जो इंसान के बालों से बना है. मुझे याद है पति को बताते समय मैंने उन्हें एक अंक हटाकर कीमत बताई. वह खुश नजर आए. उनकी दुनिया पुरानी पुरानी सी, परिचित और सस्ती चीजों वाली है. वैसे ही जैसे उनकी नाईट ड्रेस, जैसी हुई पीली पड़ चुकी सौ साल पुरानी है.

अब क्योंकि यह इंसान के बालों वाला विग है, इसके नखरे भी हैं. कभी तो यह मेरे सिर पर फिट रहता है, जैसे या प्राकृतिक ही हो. कभी प्लास्टिक विग की तरह मेरे कानों के पास से लटक जाता है. गर्मी में जब मैं अपने आपको कूल दिखा रही होती हूं तो गले के पास यह खासा गर्म हो जाता है. उमस भरे मौसम में यह नए केक की तरह फुल कर ऊपर उठ जाता है

जब मेरा मन खराब होता है तो मैं इसे खिड़की के पास एक हुक पर टांग देती हूं. वहां यह विग टंगा रहता है, जैसे कि बड़े शांत स्वभाव का हो. मेरे प्रति दया दिखाता, हवा में झूलता हुआ या बाहरी दुनिया को हसरत भरी निगाहों से देखता रहता है. शायद किसी और गंजे सिर की कामना में. कोई और ज्यादा रोमांच दे सके, कोई गंजा फिल्म स्टार या ऐसा ही कोई और.

अच्छा होने पर मैं फिर से विग को सिर पर धारण कर लेती हूं ताकि दुनिया को ठीक दिखूं. विग तो पहले से ही मुड़ा रहता है पर साथ में फिसलने लग जाता है. जब मैं बादलों को देखने के लिए सिर ऊपर करती हूं तो मेरी विग का व्यवहार बड़ा जोखिम भरा होता है. मुझे यही डर लगता रहता है कि किसी दुश्मन की तरह यह सबके सामने मेरी पोल ही खोल कर रख देगा. खैर, ऐसा होता नहीं जैसे ही मेरा इस पर विश्वास कुछ पक्का होता है, बालों की दृष्टि से. तो किन्ही खास दिनों में यह अस्थिर हो जाता है. चाहे मैं कितना भी पुचकारूं, यह और विद्रोही बनता जाता है. मैं इसके सनकी स्वाभाव से समझौता कर लेती हूं.