इस बार विश्व प्रसिद्ध पुष्कर मेले ने अपनी रही-सही आभा भी खो दी. चार से 12 नवंबर तक चले इस मेले को ऊंटपालक बीच में ही छोड़कर वापस लौट गए, घुमंतू समाजों के लोग इसमें कहीं दिखलाई नही पड़े और जो दिखे भी वे फटेहाल थे. जिनके ऊपर इस आभा को बचाये रखने की जिम्मेदारी थी, वे अपना नाम गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में चमकाने में व्यस्त थे.

विश्व में पुष्कर की पहचान अंतरराष्ट्रीय पशु मेले के तौर पर है. लेकिन यह केवल पशु-मेला नहीं है बल्कि इसके साथ-साथ घुमन्तू समाजों के मिलने-मिलाने का और एक-दूसरे के साथ अपने दुःख, सुख और ज्ञान साझा करने का अवसर भी है. वर्ष भर घूमने वाले घुमन्तू लोगों के लिए यही एक मौका है जहां वे अपने ज्ञान, कला और परंपरा से नई पीढ़ी का परिचय करवाते हैं, उनके साथ अपने ज्ञान को साझा करते हैं, उसे सहेजते हैं.

कुछ समय पहले तक इस मेले में तरह-तरह के घुमंतू समुदाय के लोग बड़ी संख्या में हिस्सा लिया करते थे. कुछ यहां अपनी कलाएं दिखाते थे और कुछ अपने जानवरों को लेकर यहां आते थे. उदाहरण के तौर पर ओड़ घुमन्तू जाति के लोग ख़ास नस्ल के ख़च्चर लेकर इस मेले में आते थे, कुचबन्दा और बंजारों के गधे प्रसिद्व थे. बागरी की भेड़-बकरियां. साठिया एवं गाड़िया लुहारों के गाय-बैल. और रायका- रैबारी समुदायों के ऊंट तो पूरी दुनिया में मशहूर हैं.

भारत मे ऊंटों का पालन तो सभी समाज करते हैं किंतु उनकी ब्रीडिंग करवाने का काम केवल रायका- रैबारी घुमन्तू समाज ही करता है. ये लोग अपने ऊंटों के काफिले के साथ पुष्कर मेले के शुरू होने से 15-20 दिन पहले ही वहां के लिए निकल लेते हैं. पिछले साल तक जंगल, नदी-नालों, पहाड़, खेत-खलिहानों से गुजरते हुए ये लोग मेला-मैदान से दूर, मिट्टी के धोरों पर अपना डेरा जमाते थे. नजदीक जंगल है जहां सुबह-शाम ये अपने ऊंटों को चराने जाते थे. वहीं मिट्टी पर सो जाते थे, ऊंट की मिंगण की आंच पर खाना बना लेते थे.

लेकिन प्रशासन की असंवेदनशीलता और कारगुज़ारियों ने इस बार उन्हें उल्टे पांव लौटने पर मजबूर कर दिया. इस बार प्रशासन ने उस इलाके की घेराबंदी कर दी, जहां पर ये ऊंटों के साथ रहा करते थे. हैलीपेड़ बनाने के नाम पर उस जमीन को भी कंक्रीट कर दिया गया जिस पर मेले में आये ऊंट बैठा करते थे. पक्की जमीन पर बैठने से ऊंटों की खाल छिल गई. और वन विभाग ने जंगल में इनके घुसने पर रोक लगा दी. बिना ये सोचे कि अब उनके ऊंट खायेंगे क्या?

एक ऊंट को दिन भर में करीब 20 किलो चारा चाहिए. मेले में पशु चारे की कीमत 10 से 15 रु किलो है. इस चारे के दामों को दोगुने से भी ज्यादा कर दिया. और कोढ़ में खाज यह कि इनके रहने के लिए तम्बू का किराया भी बहुत ऊंचा - पूरे मेले के दौरान 2000 रुपये - कर दिया गया.

पुष्कर मेले के आयोजन के दौरान मेलास्थल पर कई बार बारिश भी हो गई. निरंतर नमी की वजह से ऊंटों में एक बीमारी ‘पांव- खुजली’ फैलती है. इसमे ऊंट के पहले बाल उड़ते हैं, फिर वहां पर घाव बन जाता है और कुछ दिन में कीड़े पड़कर उसकी मृत्यु भी हो सकती है.

यहां पर आये कई ऊंटों के साथ यही हुआ. इस बीमारी के इलाज पर 700 से 1000 रु लगते हैं. ये लोग जो दवाई अपने साथ लाये वह बारिश में भीग गई. मेले में कहने को इतने डॉक्टर थे लेकिन फिर भी चिकित्सीय सहायता मिलना उतना आसान नहीं था. क्योंकि ज्यादातक पशु चिकित्सक पैसे लेकर बिक्री के घोड़ों की गाड़ियां पास करने में व्यस्त थे.

वर्षों से पशुपालन के क्षेत्र में कार्यरत ‘लोक हित पशुपालन संस्थान, पाली के निदेशक हनवंत सिंह राठौड़ का कहना है कि रेगिस्तान के जहाज को डुबोने में हमारी सरकारों ने बड़ी भूमिका निभाई है. ऊंट को राजकीय पशु का दर्जा देने के कारण उसे सीमा पार नही ले जा सकते. इसके कारण अन्य राज्यों से व्यापारियों ने ऊंट खरीदने के लिए आना बंद कर दिया है.

एक रायका-रैबारी का पिछले एक महीने का औसत खर्चा कई हज़ार रुपये हो गया. जबकि मेले में इसे कोई 1500 रूपये में भी खरीदने को तैयार नही था. राजकीय पशु का दर्जा दिये जाने के बाद से न तो ऊंट को राज्य से बाहर बेचा जा सकता है न ही इसका वध किया जा सकता है. और इसे एक से दूसरी जगह ले जाने में भी कई दिक्कतें पेश आती हैं. इस स्थिति में रायका-रैबारी समुदाय के लोगों के पास मेले से वापस लौटने के अलावा कोई चारा नही था.

हनवंत सिंह राठौड़ आगे कहते हैं कि ऊंटनी का गर्भावस्था का समय 13 महीने का होता है, जिसके अंतिम 3 महीने में उससे कोई काम नही ले सकते, सरकार ने ऊंटनी के बच्चे के पालन के लिए 10 हज़ार रुपये देने का वादा किया था, लेकिन उसको भी रोक दिया. ऊंटों के बीमा पर भी रोक लगा दी गई. इस तरह की नीतियों का ही नतीजा है कि राज्य में अब मात्र ढाई लाख ऊंट ही बचे हैं. जबकि 1991 में इनकी संख्या 10 लाख से ज्यादा थी.

लेकिन यह सिर्फ ऊंट बेचने वालों के साथ ही नहीं हुआ. इस मेले में भाग लेने वाले कई दूसरे समुदायों की व्यथा उनसे अलग नहीं है. और यह तब है कि यह खास तौर पर उनका ही मेला हुआ करता था.

मेला मैदान से दूर, गौतम आश्रम धर्मशाला के नजदीक मोरेसिंह भील अपनी औषधियों का पिटारा लेकर बैठे हैं. उनके खास प्रकार के नुस्खे ओर दावे हैं. मोरेसिंग मध्य प्रदेश से आये हैं. वे बताते हैं कि वे पिछले 30 वर्षों से लगातार इस मेले में आते रहे हैं किंतु इस बार के मेले को देखकर वे हताश हैं. वहां जमीन पर कोई उन्हें बैठने ही नही दे रहा. जहां बैठते हैं वहीं से पुलिस वाले भगा देते हैं.

‘हम तो वर्षों से यहीं बैठते थे, यहां के भीलों से मिलते, सिंगीवाल समाज के लोगों से अपनी जड़ी-बूटियां साझा करते, कालबेलिया की जड़ी- बूटी सबसे ताकतवर है. सब लोग अपने नए नुस्खे बताते’ मोरेसिंह कहते हैं कि ‘हमारे बाप-दादा वर्षों से यहां आते रहे हैं, हम तो कोई गलत काम भी नही करते फिर भी हमें इस मेले से दूर क्यों कर रहे हैं? हमारे इस ज्ञान को क्यों खत्म कर रहे हैं. हमें जंगल में भी नही जाने देते अब यहां पर भी वही हालत.’

पुष्कर के गनेड़ा गांव के पास पुलिस और प्रशासन की आंखों से बचकर, जैसलमेर से आये मूकनाथ कालबेलिया अपने साथियों के साथ बीन की धुन पर लहरिया बजा रहे हैं, उनके पास कोबरा सांप है. कुछ विदेशी सैलानी उनकी तस्वीरें ले रहे हैं.

मूकनाथ कहते हैं कि ‘पहले मेले में हमारी प्रतियोगिता होती थी, हम लहरिया बजाते थे. लहरिया की खास बात ये है कि उसमें 50-60 कालबेलिया बीन और ढपली पर एक सुर में धुन बजाते हैं और कहीं भी सांस टूटने नही दी जाती. हम मेले में लोगों के सूरमा निकालते थे. हमारी महिलाएं घूमर नृत्य करती थी. हमारे लाये सूरमा, जो-हरड़ की फांकी और जन्म-घुट्टी को लेने के लिए लोग दूर-दूर से यहां आते थे.

मूकनाथ अपने पुराने दिनों को याद करते हुए बताते हैं उनके लिए यह मेला इसलिए भी खास है कि उनकी शादी इसी मेले में तय हुई थी. उस वर्ष उसने सबसे अच्छा लहरिया बजाया था. लेकिन मोरेसिंह भील की तरह उनकी भी शिकायत वही है - इस बार उन्हें भी मेला-मैदान के नजदीक जाने नहीं दिया जा रहा है. ‘सुना है अंग्रेज लोग इस बार घूमर नृत्य कर रहे हैं’ मूकनाथ कहते हैं.

मिट्टी के धोरों के पास, जमीन पर दो बांस लगाकर, जमीन की सतह से करीब साढ़े छह फीट की ऊंचाई पर बंधी रस्सी, उस रस्सी पर एक सात साल की बच्ची अंतरा, सर पर लौटे रखकर, हाथ में डंडा किये, बेखौफ करतब दिखला रही है. अंतरा कभी पैरों में चक्का फंसाकर चलती है तो कभी थाली पर घुटनों के बल चलती है. चेहरे पर न तो कोई डर है और न कोई थकान है.

नीचे एक व्यक्ति ढपली बजा रहे हैं और एक महिला निरंतर उस बच्ची के करतब के बारे में बता रही है. अशोक नट समाज से सम्बंधित है और छत्तीसगढ़ से यहां आये हैं. उनके यहां नटों को दंडचग्गा बोला जाता है. एक साइकिल, गुदड़ी, चार बांस, रस्सी, ढपली, खाना बनाने के 5-7 बर्तन और कुछ कपड़े, बस यही है उनकी कुल जमा पूंजी.

अशोक कहते हैं कि उनके समुदाय के बच्चे जन्म से ही कलाकार होते हैं, और उन्हें दो साल से ही करतब सिखाना शुरू कर दिया जाता है. वे बताते हैं कि ‘हम यहां हर वर्ष आते हैं और दो महीने पहले ही छत्तीसगढ़ से निकल लेते हैं. रास्ते में जहां रुकते हैं वहां करतब दिखाते हैं तो हमारा रास्ते का गुजारा चल जाता है.

लेकिन अब अशोक को बहुत ध्यान से अपने करतब दिखाने पड़ते हैं नहीं तो पुलिस द्वारा पकड़े जाने का खतरा होता है. और कुछ नहीं तो पुलिस इस वजह से ही इन्हें पकड़ लेती हो क्योंकि इनके बच्चे करतब दिखाते हैं.

‘हमारे बच्चों को थोड़ी सी सरकारी सहायता मिल जाये तो वे खेलों में बहुत अच्छा करेंगे. लेकिन अब तो ये मेला भी हमसे दूर हो गया, एक समय था जब भारत भर से नट लोग यहां इकट्ठा हुआ करते थे.

मेले की परंपरा क्या थी

गुजरात राजघराने से सम्बंधित महाराणा पुष्पेंद्र सिंह, लुनावड़ा बताते हैं कि पुष्कर का मेला स्वतःस्फूर्त था जहां एक समय हिंदुस्तान के कोने-कोने से घुमन्तू समाज के लोग आया करते थे.

मेले की शुरूआत में, आरती होने के बाद ऊंट पर नगाड़ा चलता था, ऊंटों की दौड़ से लेकर उनके श्रंगार की प्रतियोगिता हुआ करती थीं, ऊंटों की शोभा यात्रा निकलती थी जिसमे रायका- रैबारी उनके साथ चलते थे. रात को भोपे रावनहत्थे पर पाबूजी की फड़ सुनाते थे. सैंकड़ों की संख्या में कालबेलिया बीन की धुन पर लहरिया सुनाते थे, कालबेलिया महिलाएं नृत्य करती थी. कठपुतली के खेल होते थे. और कितने ही बहरूपिए भी हुआ करते थे.

ओढ़ लोग अपने ख़च्चर और कुचबन्दा गधों को सजाकर लाते थे, उनकी प्रतियोगिताएं होती थीं. बंजारन गोदना और कसीदाकारी किया करती थीं. सिंगीवाल और पेरना अपने जड़ी- बूटियों के ज्ञान और नुस्खों को सबसे साझा करते. नट लोग रस्सी पर करतब दिखलाते.

इन सब गतिविधियों की खास बात यह थी कि इनका प्रबंधन और नियंत्रण घुमन्तू समाज के पास ही था. यह मेला घुमन्तू समाज के सहज और उपयोगी ज्ञान का प्रतीक था जिसे कई राजे-रजवाड़ों का आश्रय भी मिलता था.

लेकिन न सिर्फ घुमंतू समाज के ज्यादातर लोगों को इस बार मेले से दूर रखा गया बल्कि पशुधन के नाम पर भी इस साल सिर्फ 80 गाय, 61 भैंसें ही इसमें शामिल की गईं. गधा, भेड़-बकरी और ख़च्चर जैसे जानवर पूरी तरह से इससे नदारद थे. 2001 में 15460 ऊंट पुष्कर मेले में आए थे, वहीं 2019 में यह आंकड़ा महज 3298 पर ही सिमट कर रहा गया. और जो लोग आए भी वे भी अपने ऊंटों को लेकर वापस लौट गये. पुष्कर मेले में इस बार शामिल घोड़ों की संख्या भी सिर्फ 3556 ही थी. इनमें भी देशी घोड़े नाम मात्र के लिए ही थे.

पुष्कर के मायने

यदि पुष्कर को दिल माने तो उसकी धड़कन घुमन्तू समाज हैं. जैसे धड़कन के बिना दिल का कोई वजूद नहीं वैसे ही दिल के बिना धड़कन का भी कोई अस्तित्व नही है.

पुष्कर के बिना घुमन्तू समाज का जीवन रुक जाएगा तो घुमन्तू के बिना पुष्कर भी बेरंग हो जाएगा. इस मेले के ऊपर उनकी सामाजिक व्यवस्था ही नहीं बल्कि अर्थव्यवस्था भी टिकी है. उन्हें और उनके पशुधन को देखने के लिए ही देश-दुनिया के लोग पुष्कर मेले में आते हैं. उन्हें विदेशी लोगों के फुटबॉल या घूमर से कोई वास्ता नहीं है. यदि हमें पर्यटन के लिहाज से भी देखना है तो भी यह सब बदलना ही होगा.

पुष्कर का मेला हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य का पैमाना भी है. इस मेले से उस जुगलबन्दी का पता चलता है जो हमारी इन घुमन्तू समाजों के साथ हुआ करती थी. और इन समाजों के क्रियाकलापों से हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की स्थिति का भी पता चलता है. इस लिहाज से भी पुष्कर का मेला वैसा नहीं होना चाहिए जैसा वह इस साल था.