इराक की राजधानी बग़दाद में बीते एक अक्टूबर को शुरू हुए प्रदर्शन न केवल पूरे देश में फैल चुके हैं, बल्कि ये अब काफी उग्र भी हो चुके हैं. इन प्रदर्शनों के दौरान हुई पुलिस और सैन्य कार्रवाई में अब तक 300 से ज्यादा प्रदर्शनकारी मारे जा चुके हैं और करीब 15 हजार से ज्यादा घायल हुए हैं. इराक के ये प्रदर्शन हिंसात्मक होने के चलते पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बने हुए हैं. लेकिन इसकी एक वजह और भी है. यह वजह है शिया बाहुल्य इराकी जनता का शिया सरकार के खिलाफ ही प्रदर्शन करना.

70 फीसदी शिया आबादी वाले इराक में सबसे बड़े प्रदर्शन करबला, बगदाद और दक्षिणी इराक के दूसरे शहरों में हुए हैं. ये सभी शिया बहुल इलाके हैं. इन इलाकों में प्रदर्शनकारियों के निशाने पर शिया सरकार, शिया राजनीतिक दल और मिलीशिया हैं. कई जगहों पर पड़ोसी शिया मुल्क ईरान का भी बड़ा विरोध हो रहा है. ईरान समर्थित मिलीशिया और राजनीतिक दलों के मुख्यालयों में आग लगाने की घटनाएं भी सामने आयी हैं.

इन सबसे साफ़ है कि प्रदर्शनों में शिया समुदाय की सबसे ज्यादा हिस्सेदारी है और ये विशेष रूप से अपने ही समुदाय से जुड़े संस्थानों को निशाना बना रहे हैं. विदेश मामलों के जानकार इसकी कई वजह बताते हैं. बग़दाद स्थित एक स्वतंत्र रिसर्च संस्था के सीईओ मुनकित दागेर इस सवाल का जवाब देते हुए अपनी एक टिप्पणी में लिखते हैं कि 16 साल पहले जब सुन्नी तानाशाह सद्दाम हुसैन को अमेरिका ने उखाड़ फेंका था तो देश की शिया आबादी सबसे ज्यादा खुश थी. इसकी वजह यह थी कि सद्दाम हुसैन ने अपने प्रशासन में ज्यादातर नियुक्तियां सुन्नी मुसलमानों को दी हुई थीं. उसकी सभी नीतियां भी सुन्नी समुदाय को ध्यान में रखकर ही बनाई जाती थीं. तब बहुसंख्यक शिया समुदाय को लगता था कि उनके साथ अन्याय हो रहा है.

जानकार कहते हैं कि सद्दाम हुसैन के पतन के बाद जब शिया समुदाय के नेताओं ने सरकार का गठन किया तो इस समुदाय को उम्मीद थी कि उनका जीवन स्तर पहले से बेहतर होगा. लेकिन बीते कुछ सालों में ऐसा हो नहीं सका. यानी शिया नेताओं के हाथ में सरकार आने के बाद भी चीजें नहीं बदली. स्थानीय मीडिया की मानें तो बीते 16 सालों में बनी सरकारें लोगों को पानी, बिजली, सुरक्षा और नौकरी जैसी बुनियादी चीजें भी देने में विफल रही हैं. लोग इस बात को लेकर काफी नाराज हैं कि तेल का भारी भंडार होने के बाद भी देश की अर्थव्यवस्था, बेरोजगारी दर और बुनियादी ढांचे का बुरा हाल है.

इराक में रोजगार दर 2003 से 2017 तक औसतन 44.06 प्रतिशत थी. लेकिन, 2017 के बाद से इसमें रिकॉर्ड गिरावट दर्ज की गई और यह 28.20 पर पहुंच गयी. इराक की एक और बड़ी समस्या भ्रष्टाचार है. ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के मुताबिक वह इस मामले में 180 देशों की सूची में 168वें स्थान पर खड़ा है. एक इराकी स्वतंत्र संस्था द्वारा किए गए एक हालिया सर्वेक्षण के मुताबिक इस समय 80 फीसदी से ज्यादा इराकी भ्रष्टाचार को देश की सबसे बड़ी समस्या मानते हैं. इस सर्वेक्षण में देश के 75 फीसदी लोगों ने माना कि इस्लामिक स्टेट जैसे आतंकी संगठनों को ख़त्म करने के बाद भी उनका देश भ्रष्ट नेताओं और नौकरशाही की वजह से गलत दिशा में जा रहा है.

फोटो : आईआईएसीएसएस

जानकार कहते हैं कि युवा किसी भी देश की सबसे बड़ी उम्मीद होते हैं, लेकिन इराक में जो कुछ हो रहा है उसने सबसे ज्यादा युवाओं को निराश और हतोत्साहित किया है. युवाओं को अपनी सरकार से अब कोई उम्मीद नहीं रह गयी है. इराक की चर्चित रिसर्च संस्था आईआईएसीएसएस के एक सर्वेक्षण के मुताबिक देश के नौजवान इतने ज्यादा निराश हैं कि 80 फीसदी का कहना है कि देश में भ्रष्टाचार और बेरोजगारी को देखकर उन्हें अपनी जिंदगी का कोई मतलब नजर नहीं आता.

फोटो : आईआईएसीएसएस

इसी संस्था के सर्वेक्षण से यह भी पता चलता है कि इराक के शिया मुसलमान किस कदर अपनी सरकार से परेशान हैं. सर्वे के मुताबिक इराक के केवल 15 फीसदी शिया मुसलमानों को ही अपनी सरकार पर भरोसा रह गया है, जबकि सुन्नी मुसलमानों के मामले में यह आंकड़ा 25 फीसदी है. अपने देश की न्याय व्यवस्था पर भी केवल 19 फीसदी शिया मुसलमान ही भरोसा करते हैं, जबकि सुन्नी समुदाय के 56 फीसदी लोगों को अपने देश की अदालतों पर भरोसा है. सर्वेक्षण के मुताबिक इराकियों में अपने धार्मिक नेताओं और धार्मिक संस्थाओं को लेकर भी भरोसा तेजी से घटा है. 2004 में देश के 80 फीसदी लोग धार्मिक नेताओं और संस्थानों पर विश्वास करते थे, लेकिन 2019 में केवल 40 फीसदी लोगों को ही अपने धार्मिक नेताओं और संस्थानों पर भरोसा रह गया है.

फोटो : आईआईएसीएसएस

प्रदर्शनों की शुरुआत कैसे हुई?

अपनी सरकार से पूरी तरह निराश इराकी युवा सोशल मीडिया पर कई महीनों से सरकार विरोधी कैंपेन चला रहे थे. प्रदर्शनों की भूमिका भी यहीं से बनी. सोशल मीडिया पर प्रदर्शनकारियों ने एक अक्टूबर को राजधानी बग़दाद स्थित तहरीर चौक पर इकट्ठा होना तय किया. एक अक्टूबर को जब तहरीर चौक पर लोग जुटे तो सुरक्षाबलों ने उन पर वॉटर कैनन, आंसू गैस और हथियारों का इस्तेमाल किया. प्रदर्शनकारियों ने भी जवाब में सुरक्षाबलों पर पत्थरबाजी शुरू कर दी. इस दौरान हुए टकराव में दो प्रदर्शनकारी मारे गए और सैकड़ों घायल हुए.

इसके अगले दिन कुछ प्रदर्शनकारी फिर इकट्ठा हुए. इन्हें तितर-बितर करने के लिए सुरक्षाबलों ने फिर से बल प्रयोग किया. सरकारी आकड़ों के मुताबिक उस दिन बगदाद में पांच, नसीरिया में चार प्रदर्शनकारी मारे गए. मारे गए लोगों में एक 10 साल की बच्ची भी शामिल थी. इस घटनाओं के बाद पूरे देश में लोग सरकार के विरोध में सड़कों पर उतर आए.

प्रदर्शन रुक क्यों नहीं रहे हैं?

इराक के प्रधानमंत्री अदेल अब्दुल माहदी प्रदर्शन रोकने के लिए जनता से कई तरह के वादे कर रहे हैं. उन्होंने रोजगार के नए अवसरों की बात कही है. प्रधानमंत्री ने तेल मंत्रालय को आदेश दिया है जल्द से जल्द स्नातक कर चुके युवाओं के लिए रोजगार मुहैया कराया जाए. सरकार का कहना है कि वह ऐसी नीति पर भी काम कर रही है जिससे इराक में काम कर रही विदेशी कंपनियों को स्थानीय लोगों को 50 फीसदी नौकरियां देनी पड़ेगी. सरकार ने स्वास्थ्य, बिजली, पानी, सुरक्षा और परिवहन सेवाओं में सुधार करने के लिए बड़े पैकजों की घोषणा भी की है.

लेकिन, सरकार के इन प्रयासों के बाद भी प्रदर्शनकारियों ने आंदोलन रोकने से इंकार कर दिया है. इनका कहना है कि उन्हें प्रधानमंत्री और सभी भ्रष्ट नेताओं का इस्तीफा चाहिए. साथ ही देश के राजनीतिक सिस्टम में ऐसा बदलाव किया जाए जिससे नौकरशाही में पारदर्शिता बढ़े.

हालांकि, कई जानकार एक और बात भी बताते हैं. इनके मुताबिक अगर सरकार ने शुरूआत में ही प्रदर्शनकारियों से शांति से बातचीत की होती तो ये प्रदर्शन देशव्यापी आंदोलन में तब्दील नहीं होते. सुरक्षाबलों ने जिस तरह से प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग किया, उसने इन प्रदर्शनों को और भड़का दिया. कुछ जानकार कहते हैं कि बीते 29 अक्टूबर को धार्मिक शहर करबला में जिस तरह से कुछ नकाबपोश लोगों ने शांति से प्रदर्शन कर रहे लोगों पर अंधाधुंध गोलीबारी की, उसने आग में घी डालने का काम किया है. आधी रात में की गई इस गोलीबारी में 18 लोगों की मौत हुई थी.