‘यह बेहद गंभीर आपराधिक मामला है और इसके लिए जिम्मेदार लोगों को सख्त सजा दी जानी चाहिए ताकि यह मामला सरकारी कर्मचारियों की गाढ़ी कमाई की खुली लूट करने वाले तंत्र पर नकेल कसने का उदाहरण बन सके.’ उत्तर प्रदेश में बिजलीकर्मियों की बेहतरी के लिए 30 वर्ष से भी अधिक समय से काम कर रहे सेवानिवृत्त इंजीनियर और विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति के संयोजक शैलेन्द्र दुबे यह कहते हुए बेहद आक्रोशित दिखते हैं. उनका यह आक्रोश उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन के 45 हजार कर्मचारियों की भविष्य निधि से जुड़े 4000 करोड़ रुपये से अधिक के घोटाले को लेकर है.

आम तौर पर सरकारी विभागों और अर्धसरकारी निगमों व परिषदों के कर्मचारियों की भविष्य निधि के पैसे सरकारी बैंकों और इसी तरह के वित्तीय संस्थानों में निवेश किए जा सकते हैं. लेकिन उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत परिषद के भविष्य निधि ट्रस्ट से एक बहुत बड़ी रकम तमाम नियमों को ताक पर रखकर दीवान हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड (डीएचएफएल) नाम की एक निजी वित्तीय संस्था में निवेश कर दी गयी. यह मामला 2017 का है. इस बीच राज्य में सत्ता परिवर्तन भी हो गया. भाजपा की सरकार आने के बाद विद्युत परिषद के बड़े अधिकारी भी बदल गए लेकिन कर्मचारियों की भविष्य निधि की लूट बदस्तूर जारी रही.

मामला पूरी तरह खुलने के बाद जब विद्युत कर्मचारी आंदोलित हुए तो दो नवम्बर को राज्य सरकार ने ताबड़तोड़ कार्रवाई करते हुए विद्युत परिषद भविष्य निधि ट्रस्ट के घोटाले की एफआईआर दर्ज करवा दी. उसी रात ट्रस्ट के ट्रस्टी व परिषद के तत्कालीन निदेशक (वित्त) सुधांशु द्विवेदी को लखनऊ से और ट्रस्ट के सचिव प्रवीण गुप्ता को आगरा से गिरफ्तार कर लिया गया. दो नवम्बर को ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भविष्य निधि के 2,268 करोड़ रूपये गलत तरीके से डीएचएफएल में जमा करवाने के मामले की जांच सीबीआई को सौंपने का भी निर्णय कर लिया. 6 नवम्बर को विद्युत परिषद के पूर्व प्रबन्ध निदेशक एपी मिश्र को भी इस घोटाले में भागीदारी होने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया और आठ नवम्बर को प्रमुख सचिव ऊर्जा आलोक कुमार को भी उनके पद से हटा दिया गया.

गिरफ्तार अभियुक्तों के घरों से घोटाले से जुड़े तमाम दस्तावेज भी पुलिस के हाथ लग गए हैं. 12 नवम्बर को ट्रस्ट के पूर्व सचिव पीके गुप्ता के बेटे अभिनव गुप्ता की गिरफ्तारी के बाद हुई पूछताछ में खुलासा हुआ है कि भविष्य निधि की इस रकम को दस फर्जी ब्रोकर कंपनियों के जरिये दीवान फाइनेंस में लगवाया गया और इनमें से कुछ कंपनियां अभिनव ने भी बनायीं थीं. इस घोटाले की कुछ रकम सफेदपोशों को भी मिली थी जबकि फर्जी ब्रोकर कंपनियों को अब तक 65 करोड़ ब्रोकरेज के रूप में दिए जाने के प्रमाण मिल चुके हैं.

अब कर्मचारी संगठन चाहते हैं कि उनकी डूब चुकी रकम की जिम्मेदारी और उसे बचाने की गारंटी राज्य सरकार अपने हाथों में ले. कर्मचारियों की यह भी मांग है कि इस मामले के असली दोषियों के खिलाफ भी कार्रवाई हो फिर चाहे वे कोई भी क्यों न हों.

ताज्जुब की बात यह है कि इतने बड़े घोटाले की पोल किसी सतर्कता के कारण नहीं बल्कि एक धमकी भरे पत्र के कारण खुली थी. घोटाले में गिरफ्तार ट्रस्ट के सचिव प्रवीण गुप्ता से 25 मई 2019 को एक अंतरदेशीय पत्र के जरिए छह करोड़ रुपये की रंगदारी मांगी गई थी. पत्र में धमकी दी गई थी कि गुप्ता ने बड़ा घोटाला किया है और रकम न देने पर घोटाला खोल दिया जाएगा. इसी तरह के दो और पत्र जुलाई में भी गुप्ता के घर डाक से पहुंचे. तीसरे पत्र के बाद गुप्ता की पत्नी मंजू गुप्ता ने हजरतगंज थाने में तहरीर दी कि उनके पति पर अनियमितता का आरोप लगाकर उनसे रंगदारी की मांग की जा रही है और ऐसा न करने पर बड़ा नुकसान करने की धमकी दी जा रही है.

हजरतगंज पुलिस ने प्रारंभिक छानबीन के बाद पांच सितम्बर को मुकदमा दर्ज कर मामले की जांच शुरू कर दी. प्रारंभिक पूछताछ में ही 12 जुलाई को विद्युत परिषद के बड़े अधिकारियों के संज्ञान में यह बात आ गई कि परिषद के भविष्य निधि ट्रस्ट में बड़ा घोटाला हुआ है. 12 जुलाई को ही राज्य विद्युत परिषद ने मामले की जांच के लिए एक कमेटी बना दी. इस कमेटी ने 18 अगस्त 2019 को अपनी जांच रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि की कि भविष्य निधि ट्रस्ट की 99 फीसदी धनराशि का नियम विरूद्ध निवेश किया गया था जिसमें से 65 फीसदी से अधिक राशि दीवान हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड में लगाई गई थी.

लेकिन इसके बाद भी मामला ठंडे बस्ते में ही पड़ा रहा. मामले ने तूल तब पकड़ा जब बाम्बे हाईकोर्ट ने वित्तीय अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के एक मामले में 30 सितम्बर 2019 को डीएचएफएल के खातों पर रोक लगा दी. विद्युत परिषद के भविष्य निधि ट्रस्ट से डीएचएफएल में अलग-अलग एफडी के रूप में अरबों रूपए का निवेश किया गया था. 1,854 करोड़ की एफडी तो दिसम्बर 2018 को मैच्योर होने के बाद ट्रस्ट को वापस मिल गईं. लेकिन 2,268 करोड़ की एफडी मार्च 2010 मार्च में पूरी होनी है और डीएचएफएल के लेन-देन पर रोक होने तथा उसके डूबने की स्थिति में आ जाने से कर्मचारियों के सामने संकट आ खड़ा हुआ.

बिजली कर्मचारी अब यह मांग कर तो रहे हैं कि राज्य सरकार उनकी भविष्य निधि की देनदारी की गारंटी ले, लेकिन वे यह भी जानते हैं कि लगभग 85,000 करोड़ से अधिक के घाटे में चल रही राज्य विद्युत परिषद के लिए एक और बड़ी वित्तीय जिम्मेदारी की गारंटी देना राज्य सरकार के लिए भी आसान नहीं है. इसीलिए विद्युत परिषद अब इस मामले में मदद के लिए रिजर्व बैंक के दरवाजे भी खटखटा रही है.

एक ओर विद्य़ुत कर्मचारियों का असंतोष बढ़ता जा रहा है और वे सांकेतिक विरोध प्रदर्शन से आगे हड़ताल पर जाने की धमकी देने लगे हैं, दूसरी ओर प्रदेश के राजनैतिक दलों में इस घोटाले को लेकर आरोप-प्रत्यारोपों की नूराकुश्ती शुरू हो गई है. सत्तारूढ़ भाजपा घोटाले के लिए अखिलेश यादव की समाजवादी सरकार को जिम्मेदार ठहरा रही है. अखिलेश यादव की सरकार ने ही अप्रैल 2014 में ही भविष्य निधि ट्रस्ट की रकम को अन्य जगहों पर भी निवेश करने का प्रस्ताव पारित किया था. ऐसा बैंकों की घटती व्याज दरों के चलते किया गया था. अखिलेश सरकार में ही पहली बार मार्च 2017 में डीएचएफएल में ट्रस्ट के 21 करोड़ रुपयों का पहला निवेश किया गया था.

इसके जवाब में अखिलेश यादव योगी सरकार पर हमलावर होते हुए दावा करते हैं कि सरकार डरी हुई है और मामले को दबाने के लिए सीबीआई जांच कराना चाह रही है. अखिलेश चाहते हैं कि इस पूरे मामले की जांच हाईकोर्ट के सिटिंग जज से करवाई जाए. अखिलेश तो इस मामले के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के इस्तीफे की भी मांग कर रहे हैं.

मौके का राजनीतिक लाभ उठाने के लिए कांग्रेस भी मैदान में कूद पड़ी है. कांग्रेस के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू इस घोटाले को लेकर प्रदेश के ऊर्जा मंत्री श्रीकांन्त शर्मा पर आरोप लगा रहे हैं. उनका आरोप है कि श्रीकांत शर्मा सितम्बर-अक्टूबर 2017 में इसी घोटाले के सिलसिले में दुबई गए थे. यह दौरा तब हुआ था जब डीएचएफएल से पैसा इकबाल मिर्ची की सनब्लिंक कम्पनी को भेजा जा रहा था. इसके जवाब में श्रीकान्त शर्मा ने अजय कुमार लल्लू के विरूद्ध मानहानि का मुकदमा दायर कर दिया है.

टोपी उछालने के इस खेल में कोई भी पीछे नहीं रहना चाहता लेकिन हकीकत यह है कि कोई भी राजनीतिक दल नहीं चाहता कि भ्रष्टाचार और घोटालों के मामलों में कोई बड़ी और गंभीर कार्रवाई हो. मायावती के बाद स्मारक घोटाले और एनआरएचएम घोटालों को लेकर अखिलेश सरकार ने शुरूआती दिनों में खूब सक्रियता दिखाई लेकिन अन्ततः हजारों करोड़ के इन घोटालों में कोई भी राजनेता कानून के शिकंजे में नहीं आया.

इसी तरह अखिलेश सरकार के बाद गोमती रिवर फ्रन्ट घोटाला, साइकिल ट्रैक और आगरा एक्सप्रेस-वे जैसे मामलों को लेकर योगी सरकार ने जो शुरूआती सक्रियता दिखाई थी वह भी अब परवान चढ़ती नहीं दिखाई देती. इसलिए कई लोगों को लगता है कि भविष्य निधि घोटाले का भी हश्र कहीं ऐसा ही न हो. इसकी एक वजह यह भी है कि इस घोटाले की शुरूआत तो अखिलेश सरकार के कार्यकाल में हुई थी, लेकिन योगी सरकार के आने के बाद भी डीएचएफएल में कुल 4101 करोड़ रूपये निवेश किए गए.

यानी योगी सरकार इस घोटाले को शुरू करने की दोषी भले न हो लेकिन इसे जारी रखने की दोषी तो है ही. फिर यह बात भी ध्यान में रखी जानी चाहिए कि विद्युत परिषद ने दो साल से अधिक समय तक ट्रस्ट की कोई बैठक तक नहीं बुलाई. 18 अगस्त 2019 को जब घोटाले की जांच रिपोर्ट में आरोपों की पुष्टि हो गई तो उसके बाद भी डीएचएफएल से रकम वापस लेने का कोई प्रयास नहीं किया गया. जबकि तब तक उसकी हालत बिगड़ने लग गई थी. 18 अगस्त से 30 सितम्बर को बाम्बे हाईकोर्ट की रोक लगने के बीच भी यदि प्रयास किए जाते तो कर्मचारियों की भविष्य निधि बचाई जा सकती थी.

विद्युत परिषद के गलियारों में अब चर्चा सिर्फ इसी बात की है कि डीएचएफएल में निवेश के एवज में किस अधिकारी को कितना फायदा मिला, किसने कितनी कमाई की और कितने लाभ उठाए. चर्चा तो डीएचएफएल से भाजपा को 10 करोड़ का चुनावी चंदा दिए जाने की भी है.

इस बीच राज्य के अन्य निगमों व अर्धसरकारी व स्वायत्त संस्थाओं के कर्मचारियों ने संयुक्त परिषद का गठन कर ऐसी सभी संस्थाओं के भविष्य निधि ट्रस्टों के निवेश पर एक श्वेत पत्र लाने की मांग तेज कर दी है. क्योंकि इस बात की आशंका है कि अन्य संस्थाओं में भी भविष्य निधि की रकम को लेकर इसी तरह के घोटाले हो सकते हैं.