श्रीलंका के राष्ट्रपति चुनाव में नंदासेना गोटबाया राजपक्षे की बड़ी जीत हुई है. वे श्रीलंका के ताकतवर राजपक्षे परिवार से आते हैं. श्रीलंकाई सेना के पूर्व प्रमुख गोटबाया अपने बड़े भाई महिंदा राजपक्षे के राष्ट्रपति रहते हुए रक्षा सचिव की जिम्मेदारी भी निभा चुके हैं. श्रीलंका में उनकी पहचान एक आक्रामक राष्ट्रवादी नेता की है. अलगाववादी संगठन द लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (लिट्टे) के खिलाफ सैन्य अभियान की कमान उन्होंने ही संभाली थी. उन पर श्रीलंका, यूरोप और अमेरिका में मानवाधिकार उन्लंघन के आरोप भी लगते हैं. कहा जाता है कि उन्होंने लिट्टे पर सैन्य कार्रवाई के दौरान हजारों तमिल नागिरकों की हत्या करवाई थी.

गोटबाया राजपक्षे ने राष्ट्रपति चुनाव प्रचार के दौरान राष्ट्रवादी नेता की अपनी छवि का पूरा फायदा उठाने की कोशिश की. ईस्टर बम धमाकों के सात महीने बाद हुए इन चुनावों में उन्हें राजनीतिक ध्रुवीकरण का भी बड़ा फायदा मिला. 70 फीसदी सिंहली-बौद्ध आबादी वाले श्रीलंका में इस बार 80 फीसदी मतदान हुआ, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है. इसका कारण सिंहली-तमिल-मुस्लिम राजनीतिक ध्रुवीकरण को माना जा रहा है. मतदान के बाद जारी आंकड़ों को देखें तो गोटबाया राजपक्षे जहां सिंहली बहुल क्षेत्रों में आगे रहे, वहीँ उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी साजित प्रेमदासा पर तमिल और मुस्लिमों ने अपना भरोसा जताया. देश के 85 फीसदी से ज्यादा तमिल और मुस्लिमों ने प्रेमदासा को वोट दिया. श्रीलंकाई मामलों के अधिकांश जानकार कहते हैं कि गोटबाया राजपक्षे की जीत सीधे तौर पर सिंहली-बौद्ध राष्ट्रवाद की जीत है.

भारत के लिए चिंता की बात क्यों है?

विदेश मामलों के ज्यादातर विशेषज्ञ गोटबाया राजपक्षे का सत्ता में आना, भारत के लिए बड़े झटके जैसा बताते हैं. इसकी वजह राजपक्षे परिवार का चीन के करीब होना है. उनके भाई महिंदा राजपक्षे ने ही पहली बार चीनी निवेश को श्रीलंका में हरी झंडी दिखाई थी. चीन से भारी भरकम कर्ज के बदले उन्होंने श्रीलंका में उसे अपने मन मुताबिक प्रोजेक्ट चुनने और निवेश करने की खुली छूट दे दी थी. इसी कर्ज के दबाव में कुछ साल बाद श्रीलंकाई सरकार को अपना बेहद महत्वपूर्ण हंबनटोटा बंदरगाह चीनी सरकार को 100 साल की लीज पर देना पड़ा था. गोटबाया राजपक्षे ने बतौर रक्षा सचिव 2005-15 तक श्रीलंकाई रक्षा मंत्रालय की कमान संभाली थी. उन्होंने ही चीनी युद्धपोत और पनडुब्बियां श्रीलंका के समुद्री तटों के पास लम्बे समय तक रुकने की इजाजत दी थी.

यहां पर ध्यान देने वाली बात यह है कि फिलहाल राष्ट्रपति के साथ-साथ प्रधानमंत्री का पद भी राजपक्षे परिवार के पास ही आ गया है. बीते बुधवार को गोटबाया राजपक्षे ने महिंदा राजपक्षे को देश का कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाया है. वे अगला चुनाव होने तक यह जिम्मेदारी संभालेंगे.

हालांकि, इन्हीं सब बातों को देखते हुए ही भारत ने गोटबाया राजपक्षे के राष्ट्रपति बनते ही उनसे बेहतर संबंध बनाने के प्रयास तेज कर दिए हैं. चुनाव परिणामों की आधिकारिक घोषणा भी नहीं हुई थी कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गोटबाया को बधाई दे दी. यही नहीं, चुनाव नतीजे आने के कुछ घंटे बाद ही भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर कोलंबो पहुंच गए. उन्होंने गोटबाया राजपक्षे को भारत आने का निमंत्रण दिया. श्रीलंका के नव निर्वाचित राष्ट्रपति ने आगामी 29 नवंबर को भारत आने पर हामी भरी है.

श्रीलंकाई राष्ट्रपति के पहले आधिकारिक दौरे पर दिल्ली आने को भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत माना जा रहा है. जानकारों की मानें तो राष्ट्रपति के तौर पर गोटबाया राजपक्षे को सबसे पहले दिल्ली बुलाना, भारत द्वारा श्रीलंका पर चीन के प्रभाव को कम करने की कोशिश जैसा है. लेकिन विदेश मामलों के कुछ जानकारों के मुताबिक श्रीलंका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति के चीन के करीब रहने की संभावना काफी ज्यादा है. ये लोग कहते हैं कि ईस्टर बम धमाकों के बाद से श्रीलंका की अर्थव्यवस्था काफी खराब हालत में है. आलम यह कि एक डॉलर की कीमत करीब 180 श्रीलंकाई रुपयों के बराबर पहुंच गई है.

हमलों के बाद से श्रीलंका में पर्यटन का भी बुरा हाल है. ऐसे में श्रीलंका को मदद के लिए एक ऐसे हाथ की जरूरत है जो अर्थव्यवस्था को सुधारने में उसकी मदद कर सके. जानकार कहते हैं कि इन परिस्थितियों में बीजिंग श्रीलंकाई सरकार के लिए ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकता है क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था इस वक्त खुद मंदी की स्थिति में है. गोटबाया राजपक्षे के चीन से पुराने संबंधों को देखते हुए भी उनके लिए चीन से डील करना ज्यादा बेहतर होगा.

कुछ विशेषज्ञ श्रीलंका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति के चीन के करीब जाने की एक और वजह भी बताते हैं. ये लोग कहते हैं कि लिट्टे पर सैन्य कार्रवाई के दौरान हजारों तमिल नागिरकों की हत्या को लेकर यूरोप और अमेरिका गोटबाया राजपक्षे पर मानवाधिकार उल्लंघन का आरोप लगा रहे हैं. इनके दबाव में ही संयुक्त राष्ट्र लगातार श्रीलंकाई सरकार से इस मामले की स्वतंत्र जांच कराने की मांग कर रहा है. श्रीलंका की पिछली सरकार सरकार ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में इस जांच को लेकर प्रतिबद्धता भी जताई है. लेकिन, चुनाव प्रचार के दौरान गोटबाया राजपक्षे ने कई बार कहा कि वे ऐसी कोई जांच नहीं करवाएंगे.

अब गोटबाया के राष्ट्रपति बनने के बाद जांच की मांग और तेज होगी, लेकिन वे इसके लिए राजी नहीं होंगे. इस स्थिति में अमेरिका, यूरोप और संयुक्त राष्ट्र श्रीलंका को दी जा रही कई तरह मदद बंद करके उस पर प्रतिबंध लगा सकते हैं. जानकारों की मानें तो ऐसी परस्थितियों में चीन ही गोटबाया की मदद कर सकता है. चीन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् का सदस्य तो है ही, साथ ही उसके यूरोपीय देशों से भी अच्छे कूटनीतिक संबंध हैं.