लौरां सिमोंस जब मात्र छह साल का था, तभी से बेल्जियम के मीडिया में एक “चमत्कारिक बालक” बन गया था. उसे और उसके उसके माता-पिता को इंटरव्यू के लिए रेडियो एवं टेलीविज़न स्टूडियो में बुलाया जाने लगा था. बेल्जियम में सामान्य बच्चे इस आयु में स्कूल जाना शुरू करते हैं. वह चार साल की आयु से ही स्कूल जाने लगा था.

प्राइमरी स्कूल की छह साल की पढ़ाई लौरां ने दो ही साल में पूरी कर ली. हाई स्कूल की छह वर्षों की पढ़ाई भी केवल दो ही वर्षों में निपटा दी. बिना कभी फ़ेल हुए 12वीं तक की सरपट पढ़ाई पूरी करने वाले छात्रों की आयु तब तक 18 वर्ष या अधिक की हो जाती है, जबकि लौरां ने यह काम सिर्फ 8 साल की उम्र में कर लिया. उसके शिक्षक और पत्रकार उसमें खगोलभौतिकी के महारथी स्टीफ़न हॉकिंग या भौतिकी में सापेक्षतावाद सिद्धांत के प्रणेता अल्बर्ट आइंस्टीन का एक नया अवतार देखने लगे हैं. 145 अंकों का उसका मेधा-सूचकांक (आईक्यू /इन्टेलिजेन्स कोशन्ट) इन दोनों महारथियों के बराबर बताया जाता है.

माता-पिता ने दंतचिकित्सा की प्रैक्टिस स्थगित की

लौरां के माता-पिता दंतचिकित्सक हैं. मां नीदरलैंड की हैं और पिता बेल्जियम के. दोनों का बेल्जियम के ब्रुइगे शहर में दंतचिकित्सा का अपना दवाख़ाना था. दोनों इतने व्यस्त रहते थे कि लौरां को अपनी स्कूली पढ़ाई के छह वर्षों के दौरान बेल्जियम के ओस्टएन्डे शहर में अपने दादा-दादी के यहां रहना पड़ा. जनवरी 2017 से अब पूरा परिवार नीदरलैंड के सबसे बड़े शहर एम्सटर्डम में रहता है. लौरां की पढ़ाई पर पूरा ध्यान देने के लिए माता-पिता ने दंतचिकित्सा की अपनी प्रैक्टिस फ़िलहाल स्थगित कर दी है.

आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने आठ वर्ष की आयु में ही लौरां को नीदरलैंड के आइन्डहोवन विश्विद्यालय में भर्ती करा दिया. उसके पिछले कीर्तिमानों को देखते हुए विश्विद्यालय ने उसे बड़े शौक से भर्ती भी कर लिया. इस बीच वह नौ साल का हो गया है. डेढ़ वर्ष से भी कम समय में उसने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग का भी सारा कोर्स पूरा कर लिया है. बीते 15 नवंबर को उसने बी-टेक की स्नातकीय डिग्री की परीक्षा दी है. किसी को कोई संदेह नहीं है कि वह इसमें बहुत अच्छे अंकों के साथ पास होगा.

देश-विदेश में प्रसिद्ध

देश-विदेश में अपनी सारी प्रसिद्धि के बावजूद लौरां अब भी वैसा ही एक हंसमुख, खुशदिल पर संकोची बालक है, जैसा वह पहले भी हुआ करता था. वह कहता है, ‘मैं चीज़ों के बारे में अच्छी तरह जानना चाहता हूं.’ मां लीदिया के अनुसार, ‘वह हमेशा ऐसा ही था. हमेशा पूछा करता था क्यों, क्यों, क्यों?’ पिता अलेक्सांदर सिमोंस कहते हैं, ‘यदि वह किसी को पसंद करता है, तो बड़े धीरज के साथ अपनी बात भली भांति समझा भी सकता है.’

इस समय प्रचलित तथाकथित ‘आईक्यू टेस्ट’ वाले पैमाने के अनुसार, मेधावी उसी को माना जाता है, जिसका मेधा-सूचकांक 130 से अधिक हो. उदाहरण के लिए, अनुमान है कि विज्ञान और तकनीक के देश जर्मनी की जनसंख्या में इस प्रकार के लोगों का अनुपात दो प्रतिशत से भी कम है. जिस किसी का मेधा-सूचकांक 140 से अधिक हो, वह ‘’अत्यंत मेधावी’’ है. लौरां सिमोंस ऐसे ही असाधारण प्रतिभावान भाग्यशालियों में से एक है. विभिन्न अध्ययनों के आधार पर हिसाब लगाया गया है कि लौरां के 145 आईक्यू अंको जैसे लोगों का मिलना इतना दुर्लभ है कि समाज में उनका अनुपात सिर्फ 0.1 प्रतिशत हो तब भी बड़ी बात है.

भाषाएं और शतरंज पसंद नहीं

इंजीनियरिंग का छात्र होने के नाते लौरां का गणित से लगाव होना सहज-स्वाभाविक है. स्कूली दिनों के एक रेडियो-इंटरव्यू में उसने कहा, ‘गणित में सांख्यिकी (स्टैटिस्टिक्स), भूमिति (जिओमेट्री), बीजगणित (अल्जेब्रा) जैसे सारे विषय आ जाते हैं.’ पर उसे इतिहास और भूगोल से भी काफ़ी लगाव था, ‘इतिहास में शीतयुद्ध वाला समय मुझे सबसे दिलचस्प लगा.’ हालांकि भाषाएं सीखना उसे अच्छा नहीं लगता. कहा जाता है कि दिमाग़ तेज़ करने के लिए शतरंज का खेल सबसे उपयुक्त है. किंतु लौरां के पिता का कहना हे कि लौरां को शतरंज बिल्कुल पसंद नहीं. वह उसे बहुत उबाऊ पाता है. खिलौनों से खेलने के बदले वह उन्हें खोलकर उनके कल-पुर्ज़ों का अध्ययन करता है. तैराकी और कंप्यूटर-गेम उसे अधिक पसंद हैं.

स्कूल में शिक्षकों का तो वह चहेता था, पर अपने सहपाठियों का नहीं. शिक्षक अपना कोई प्रश्न पूरा भी नहीं कर पाते थे कि वह उत्तर देना शुरू कर देता था. इस वजह से उसके सहपाठी उससे चिढ़ते-जलते थे. अंततः उसके लिए एक अलग, विशेष पाठ्यक्रम तैयार किया गया और हर विषय उसे अकेले पढ़ाया जाने लगा. पिता अलेक्सांदर बड़े गर्व से कहते हैं, ‘लौरां तब खिल उठता है, जब उसे कोई चुनौती मिलती है. तब वह इतना तेज़ हो जाता है कि हम उसकी बराबरी नहीं कर पाते.’

12 वर्ष की पढ़ाई चार वर्षों में ही निपटा दी

अपनी तेज़ गति के कारण ही लौरां ने 12 वर्षों की स्कूली पढ़ाई सिर्फ चार ही वर्षों में निपटा दी. परिवार के 2017 में एम्सटर्डम में बस जाने के बाद वहां अपनी पढ़ाई के साथ-साथ वह एक हृदयरोग विशेषज्ञ के यहां प्रशिक्षिण भी लेने लगा. माता-पिता ने सोचा कि एक ऐसे प्रखर प्रतिभावान तेज़ बच्चे का नाम किसी ऐसे विश्वविद्यालय में नहीं लिखवाया जा सकता, जहां उसके लायक तेज़ गति वाली पढ़ाई की व्यवस्था नहीं हो सकती. कार द्वरा एम्सटर्डम से क़रीब दो घंटे की दूरी पर स्थित आइन्डहोवन शहर का तकनीकी विश्वविद्यालय लौरां के माता-पिता की इस शर्त को मानने के लिए तैयार हो गया कि उसे हर प्रोफ़ेसर अकेले ही पढ़ायेगा. यानी, उसे एक प्रकार से निजी ट्यूशन मिलता रहा है. माता-पिता उसे कार से विश्वविद्यालय पहुंचाते और घर लाया करते थे. साथ ही वह घर पर रहकर स्वयं भी खूब पढ़ाई करता रहा है.

‘’दूसरों से कम से कम तीन गुना तेज़’’

लौरां के एक प्रोफ़ेसर ने मीडिया से कहा, ‘यह सब है तो बड़ा रोमांचक, पर बहुत मज़ा भी आ रहा है... लौरां दूसरों से वाकई कम से कम तीन गुना तेज़ है.’ इस प्रोफ़ेसर का यह भी कहना था कि लौरां प्रयोगशाला में एक बार एक केबल ऐंठ नहीं पा रहा था. ‘उसके पास इतनी ताक़त नहीं थी. आख़िेर वह एक बच्चा ही तो है!’ अपने प्रोफ़ेसरों के साथ लौरां का व्यवहार भी ठीक वैसा नहीं रहा है, जैसा वयस्क हो चुके दूसरे छात्रों का होता है. उसके व्यवहार में प्रायः बच्चों वाली भोली-भाली सरलता हुआ करती थी.

स्वीडन की 16 वर्ष की ग्रेटा तुनबेर्ग की तरह ही लौरां सिमोंस भी जलवायुरक्षा का दीवाना है. उसकी ज़िद के कारण उसके माता-पिता को अपनी डीज़ल कार त्याग देनी पड़ी और बदले में एक बिजलीचालित नयी कार ख़रीदनी पड़ी. छुट्टिया मनाने के लिए उन्हें विमान से स्पेन जाना भी बहुत कम कर देना पड़ा.

मनुष्य का जीवनकाल बढ़ाने की चिंता

जलवायुरक्षा के संदर्भ में लौरां का कहना है, ‘जलवायु परिवर्तन की रोकथाम का कभी न कभी कोई तकनीकी समाधान भी मिल ही जायेगा. हमें तकनीकी शोध में और अधिक निवेश करना चाहिये.’ फ़िलहाल वह मस्तिष्क की कोशिकाओं में होने वाली हरक़तों को जानने के लिए स्वयं एक माइक्रो-चिप बनाने में लगा हुआ है. कहता है, ‘मैं कोई ऐसी चीज़ बनाना चाहता हूं, जो (हमारे) जीवनकाल को बढ़ा सके... उदाहरण के लिए कृत्रिम अंग.’

पर, लौरां सिमोंस इस सबसे पहले एम-टेक और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डॉक्टरेट करने की सोच रहा है. उसकी तेज़ गति के उपयुक्त इस समय सही क़िस्म का कोई शोध-कार्यक्रम तैयार करने का भी काम चल रहा है. ज़रूरी नहीं कि वह नीदरलैंड में रहकर ही डॉक्टर की उपाधि पाने का प्रयास करेगा. जर्मनी या अमेरिका जाने की भी सोच सकता है. जहां भी जायेगा, उसके भावी मार्गदर्शक प्रोफ़ेसर या प्रोफ़ेसरों को भी उसकी तेज़ गति से ज़रूर पसीना छूटने लगेगा. हो सकता है कि वह विज्ञान व तकनीक संबंधी किसी विषय में सबसे कम आयु में डॉक्टर की उपाधि प्राप्त करने का विश्व रिकॉर्ड स्थापित कर दे.