पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मौजूद आर्थिक हालात को लेकर पिछले दिनों ‘द हिंदू’ में एक विस्तृत लेख लिखा. लेख चर्चा में रहा. लेकिन विस्तार से लिखे गए इस लेख की वही बातें सुर्खियां बनीं जो सीधे मोदी सरकार पर राजनीतिक निशाना साध रही थीं. मसलन, ‘पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का मोदी सरकार पर तीखा हमला’ या ‘मनमोहन सिंह ने मोदी सरकार को चेताया कि पीआर और हेडलाइंस से नहीं चलती इकॉनमी’. हालांकि, मनमोहन सिंह ने लेख में यह भी कहा था उनकी बातों को महज विपक्ष के नेता के तौर पर न लिया जाए क्योंकि इन बातों की चर्चा वे एक नागरिक और अर्थशास्त्र के विद्यार्थी के तौर पर कर रहे हैं.

मनमोहन सिंह पूर्व प्रधानमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं. ऐसे में उनके लेख के राजनीतिक पक्ष पर चर्चा स्वाभाविक है. लेकिन, उनके लेख का विशुद्ध अर्थशास्त्रीय महत्व भी है. उनके इस विश्लेषण के निष्कर्ष बिंदुवार कुछ यूं कहे जा सकते हैं:

हर स्तर पर विश्वास की कमी

मनमोहन सिंह अपने आलेख में कहते हैं कि ‘देश में बेरोजगारी 45 सालों के उच्चतम स्तर पर है. जीडीपी वृद्धि पंद्रह सालों के न्यूनतम स्तर पर है. बैंकों के फंसे हुए कर्ज उच्चतम स्तर पर हैं. देश में बिजली उत्पादन भी 15 सालों में सबसे कम है और खपत पिछले चार दशकों मे सबसे नीची है.’ वे बताते हैं कि ये आंकड़े तो सिर्फ अर्थव्यवस्था का हाल बताते हैं, लेकिन आर्थिक समस्या के मूल में सरकार की कार्यप्रणाली है. इसके बारे में वे विस्तार से बताते हुए कहते हैं कि किसी देश की अर्थव्यवस्था की हालत उसके समाज की स्थिति को भी प्रतिबिंबित करती है. आर्थिक वृद्धि के लिए संस्थाओं और समाज के बीच किस तरह के संबंध हैं, यह बात काफी मायने रखती है. लेकिन इस सरकार में विश्वास का यह ताना-बाना टूटा है. वे आगे लिखते हैं कि ‘मुझसे कई उद्ममियों ने कहा कि उन्हें हमेशा सरकारी एजेंसियों का डर सताता है.’ मनमोहन सिंह का मानना है कि डर और संदेह का वातावरण नरेंद्र मोदी सरकार की कार्यप्रणाली का एक स्थायी तत्व है. इस कार्यप्रणाली के चलते वे सारी कड़ियां डर के बीच काम कर रही हैं जो आर्थिक वृद्धि में सहायक होती हैं. वे इसका उदाहरण देते हुए कहते हैं कि आज बैंकर लोन देने में डर रहे हैं कि कहीं उन पर सवाल न उठ जाएं और सरकारी एजेंसियों के डर से उद्यमी निवेश करने से डर रहे हैं.

लेख कहता है कि माहौल ऐसा है कि मीडिया, नियामक संस्थायें, जांच एजेंसियां लोगों के बीच अपनी साख लगातार गंवा रही हैं. और लोगों को इस बात की चिंता है कि अगर गलत तरीके से उन्हें टैक्स या अन्य मामलों में परेशान किया गया तो वे किसके पास जाएंगे. यह उद्यमिता को प्रभावित कर रहा है क्योंकि कारोबारी किसी तरह का खतरा नहीं मोल लेना चाहते. बड़े पैमाने पर पनपी यह प्रवृत्ति आर्थिक वृद्धि को नुकसान पहुंचा रही है. वे अपने लेख में यह भी लिखते हैं कि प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एडम स्मिथ के जमाने से लेकर आधुनिक अर्थशास्त्री तक इस बात से सहमत है कि परस्पर विश्वास और मजबूत सामाजिक ताना-बाना आर्थिक वृद्धि के लिए जरूरी है. लेकिन, मौजूदा सरकार इन दोनों मोर्चों पर असफल है. सामाजिक ताने-बाने में दरार और पारस्परिक विश्वास की कमी मौजूदा आर्थिक संकट की बड़ी वजहों मेंं से एक है.

पहले की सरकारों की हर योजना को संदेह की नजरों से देखना

मनमोहन सिंह का मानना है कि मौजूद सरकार पहले की सरकारों की हर नीति को शक की निगाह से देखती है. वे लिखते हैं कि नरेंद्र मोदी सरकार को ऐसा लगता है या वह यह दिखाने की कोशिश करती है कि पुरानी सरकारों की हर नीति के पीछे कोई गलत मकसद था. जैसे कि पुरानी सरकारों में दिया गया हर लोन संदिग्ध था और किसी न किसी को फायदा पहुंचाने के लिए दिया गया था. मनमोहन का मानना है कि सरकार हर मामले में संदेह का रवैया अपनाती है और फिर अपने आप को रक्षक के रूप में पेश करती है कि हम हर पुरानी चीज को ठीक कर रहे हैं.

मनमोहन सिंह मानते हैं कि इसका नतीजा यह होता है कि नीतिगत मसलों पर सरकार नैतिक पुलिस जैसा रवैया अख्तियार कर लेती है, जिसके कारण नोटबंदी जैसे आत्मघाती कदम सामने आते हैं. मनमोहन के मुताबिक हर किसी को संदेह की निगाह से देखना और बार-बार ‘अच्छा प्रशासन बनाम बुरा प्रशासन’ जैसे सिद्धांतों की रट लगाना आर्थिक सेहत के लिए अच्छे नहीं हैं. पहले की हर सरकार को नीतिगत मसलों पर कठघरे में खड़ा करने से नीतियों की निरंतरता भी टूटती है जो आखिर में आर्थिक सेहत पर ही फर्क डालती है.

सच बोलने से घबरा रहे नीति-निर्माता

मनमोहन सिंह मानते हैं कि मोदी सरकार में दूसरी सरकारों के मुकाबले अपने प्रशासन को बेहतर ठहराने का जो स्थायी भाव है, वह कार्यपालिका के पूरे तंत्र को प्रभावित कर रहा है. उनका लेख इशारा करता है कि सरकार नीति-निर्माताओं और सरकारी अफसरों की बात सुनकर वस्तुस्थिति जानने के बजाय अक्सर इस पूरे तंत्र से यह उम्मीद करती है कि वह इस सरकार की नीतियों को पहले की सरकार से ज्यादा बेहतर और साफ-सुथरी बताए. हेडलाइंस और पीआर जैसी चीजों से अर्थव्यवस्था को संचालित करने की कोशिश पर मनमोहन का तंज इस ओर इशारा करता है. मनमोहन के लेख का विश्लेषण यह बताता है कि आज सरकार में माहौल ऐसा है कि नीति निर्धारण से जुड़े लोग भी सही बात बोलने से परहेज करते हैं. या तो वे तमाम मसलों पर चुप्पी साध जाते हैं या घुमा-फिराकर सरकार की लाइन ले लेते हैं.

मनमोहन के लेख से इतर भी देखें तो यह बात काफी हद तक सही लगती है. मोदी सरकार के दोनों कार्यकालों में नामी अर्थशास्त्रियों की मोदी सरकार से कभी पटरी नहीं बैठी. पद छोड़ते ही अरविंद पनगढ़िया और अरविंद सुब्रमण्यम जैसे अर्थशास्त्रियों ने मोदी सरकार की कई मुद्दों पर आलोचना की. इनके अलावा रघुराम राजन, उर्जित पटेल, विरल आचार्य जैसे अर्थशास्त्रियों ने जब भी सरकार को चेताया तो उन्हें भाजपा नेताओं और मंत्रियों के बयानों का निशाना बनना पड़ा. ऐसे नेताओं को रोकने की कभी ठोस कोशिश भी नहीं की गई. ऐसे में फिलहाल सरकार के साथ काम कर रहे नीति-निर्माताओं की असहजता का अंदाजा लगाया जा सकता है.

‘स्टैगफ्लैशन’ यानी खपत में कमी, फिर भी महंगाई में वृद्धि

मनमोहन सिंह के पूरे लेख में अर्थव्यवस्था के सामाजिक पक्ष, सरकार की कार्यप्रणाली और नीतिगत दर्शन पर जोर दिया गया है. लेकिन, मनमोहन सिंह महंगाई के मसले पर शुद्ध आर्थिक बात करते हैं. उनका मानना है कि खपत के स्थिर रहने और भारी बेरोजगारी के बावजूद खुदरा महंगाई का बढ़ना चिंतित करने वाला है. खुदरा महंगाई में भी उन्होंने खाद्य पदार्थों की लगातार बढ़ती कीमतों को खतरनाक बताया है. इसके लिए वे अर्थशास्त्र के तकनीकी शब्द ‘स्टैगफ्लेशन’ का इस्तेमाल करते हैं. ‘स्टैगफ्लैशन’ उस स्थिति को कहते हैं जब मांग न बढ़ने के बावजूद महंगाई बढ़ रही हो. मनमोहन के लेख के मुताबिक ‘स्टैगफ्लेशन’ जैसी स्थिति में फंसने के बाद बड़ी अर्थव्यवस्थाएं आसानी से उससे उबर नहीं पाती हैं जो चिंता की बात है.

हालांकि, लेख में यह भी कहा गया है कि भारत में अभी तक ऐसी स्थिति नहीं आई है, लेकिन इससे बचने के लिए जरुरी है कि मौद्रिक नीतियों के जरिये खपत बढ़ाई जाए और ‘सामाजिक नीति’ के जरिये निजी निवेश को प्रोत्साहित किया जाए. सामाजिक नीति से पूर्व प्रधानमंत्री का मतलब है कि अर्थव्यवस्था के लिए जिम्मेदार सभी भागीदारों में विश्वास लौटाया जाए. डर और संशय जैसी चीजें दूर होंगी तभी अर्थव्यवस्था रफ्तार पकड़ेगी.

भारत ने आर्थिक वृद्धि का एक बड़ा मौका खो दिया

मनमोहन सिंह अपने लेख में मौजूदा आर्थिक सुस्ती को ‘खुद बुलाई गई मंदी’ कहते हैं. उनका मानना है कि चीन की अर्थव्यवस्था में सुस्ती के चलते भारत के पास बड़ा मौका था कि वह अपनी अर्थव्यवस्था को रफ्तार पकड़ा सके. वे कहते हैं कि अगर खौफ के वातावरण से निकलकर सरकार ने नीतिगत सतर्कता दर्शायी होती तो भारत के पास अपना निर्यात बढ़ाने का यह बेहतरीन मौका था. डॉक्टर सिंह का मानना है कि चीन की अर्थव्यवस्था में सुस्ती, कच्चे तेल की कम कीमतें और लोकसभा में प्रचंड बहुमत के चलते सरकार को आर्थिक मोर्चे पर ऐसा मौका मिला था जो कई पीढ़ियों में एक बार मिलता है. अगर इस मौके का फायदा उठाया जाता तो भारत में बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित होते और भारत आर्थिक सुधार के एक नए चरण में पहुंच जाता. आखिर में मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री मोदी को सलाह देते हुए यह भी कहते हैं कि उद्यमियों और कारोबारियों को खौफ और संदेह से निकालकर विश्वास में लेना चाहिए. इसके अलावा समाज में भी आपसी विश्वास बहाल होना चाहिए क्योंकि यही चीजें भारत को मौजूदा आर्थिक मंदी से निकालेंगी.