जब झारखंड विधानसभा चुनाव घोषित हुए, उस वक्त तक यह माना जा रहा था कि प्रदेश में विपक्ष पूरी तरह से बिखरा हुआ है और ऐसे में यहां एक बार फिर से भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार की वापसी की काफी संभावनाएं हैं. लेकिन चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के कुछ ही दिनों के अंदर झारखंड से यह जानकारी मिल रही है कि इस प्रदेश में भाजपा ने अपनी राह मुश्किल करने का काम खुद ही किया है.

भाजपा के लिए एक अच्छी खबर झारखंड में तब आई जब प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने यह घोषणा की कि उनकी पार्टी झारखंड विकास मोर्चा (जेवीएम) अपने दम पर चुनाव लड़ेगी. पहले इस बात की कोशिश हो रही थी कि झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम), कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) और जेवीएम महागठबंधन बनाएंगे. लेकिन बाबूलाल मरांडी की पार्टी ने सीटों के बंटवारे से असंतुष्ट होकर अलग से चुनाव लड़ने का निर्णय ले लिया. झारखंड की राजनीति को जो लोग जानते हैं, वे यह मानते हैं कि जेवीएम की राजनीतिक ताकत भले इतनी नहीं हो कि वह अकेले बहुमत पा सके लेकिन वह कम अंतर से जीत-हार वाली सीटों का परिणाम बदलने में पूरी तरह से सक्षम हैं. यही वजह थी कि भाजपा को लगा कि जेवीएम के अलग होने से महागठबंधन की संभावनाएं थोड़ी कमजोर और उसकी थोड़ी मजबूत होंगी.

लेकिन इसके बाद भाजपा के लिए एक के बाद एक मुश्किलें पैदा होती चली गईं. बिहार में भाजपा के साथ मिलकर सरकार चला रही जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) ने पहले ही यह घोषणा कर दी थी कि वह झारखंड में एनडीए से अलग होकर चुनाव लड़ेगी. केंद्र और बिहार में भाजपा की दूसरी सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी को भी जब मनमाफिक सीटें भाजपा से मिलती नहीं दिखीं तो उसने भी अलग से चुनावी मैदान में उतरने की घोषणा कर दी. एलजेपी झारखंड की 50 सीटों पर चुनाव लड़ रही है.

हालांकि, जेडीयू और एलजेपी की झारखंड में कोई खास राजनीतिक ताकत नहीं है. इसलिए भाजपा को इन दोनों पार्टियों के अलग से चुनाव लड़ने से कोई खास फर्क पड़ता नहीं दिख रहा था. लेकिन भाजपा को असली झटका तब लगा जब सुदेश महतो के नेतृत्व वाली ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन यानी आजसू से उसका गठबंधन टूट गया. लंबे समय से झारखंड की राजनीति में भाजपा और आजसू साथ रहे हैं. आखिरी वक्त तक दोनों पार्टियों की ओर से इस बात के लिए कोशिश हुई कि गठबंधन बना रहे. लेकिन सुदेश महतो अपनी पार्टी के लिए 17 सीटें मांग रहे थे और भाजपा 10 से अधिक सीटें देने को तैयार नहीं थी. इनमें से कुछ सीटें ऐसी थीं जिन्हें न तो भाजपा छोड़ना चाह रही थी और न ही आजसू. ऐसी सीटों में लोहरदगा और चंदनक्यारी सीटों का नाम लिया जा रहा था. इन दोनों सीटों पर दोनों पार्टियों ने अपने-अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी थी.

दोनों दलों में सीटों के लिए चल रही बातचीत के दौरान ही चुनाव के पहले चरण के नामांकन की आखिरी तारीख भी निकल गई. इस वजह से राज्य की एक सीट हुसैनाबाद पर भाजपा अपना उम्मीदवार तक घोषित नहीं कर पाई. गठबंधन टूटने के बाद उसे इस सीट पर एक निर्दलीय उम्मीदवार का समर्थन करना पड़ रहा है. जबकि आजसू ने पहले ही यहां पर अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया था.

आजसू से गठबंधन टूटने से भाजपा की संभावनाओं पर पड़ने वाले असर के बारे में प्रदेश भाजपा के एक पदाधिकारी बताते हैं, ‘झारखंड में प्रचंड बहुमत जैसी घटना कभी नहीं हुई. छोटा राज्य होने की वजह से यहां हमेशा से कम सीटों के अंतर से सरकार बनने की स्थिति बनती है. इसलिए यहां छोटी पार्टियों की भूमिका अहम हो जाती है. निश्चित तौर पर आजसू के अलग होने का नुकसान भाजपा को होगा. क्योंकि यह भी देखना होगा कि हम पांच साल की एंटी-इन्कंबेंसी के साथ चुनाव में उतर रहे हैं. दूसरी तरफ जेएमएम, कांग्रेस और आरजेडी एक साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं. ऐसे में आजसू का अलग जाना भाजपा पर भारी पड़ सकता है.’

भाजपा के लिए एक और बड़ी मुश्किल हो गई अपने कुछ मौजूदा विधायकों और मंत्रियों का टिकट काटना. इनमें से अधिकांश लोगों का टिकट कटना तो मुद्दा नहीं बना लेकिन मुख्यमंत्री रघुबर दास की सरकार के वरिष्ठ मंत्री सरयू राय का मामला थोड़ा अलग रहा. उनके बारे में यह बात सामने आई कि उनसे न तो मुख्यमंत्री खुश हैं और न ही पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह. कहा गया कि पिछले दिनों उन्होंने अपनी एक पुस्तक का विमोचन बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से करवा लिया, इस वजह से अमित शाह उनसे नाराज हैं और उनका टिकट काटने तक निर्णय ले लिया गया. जबकि 2014 में जब झारखंड में सरकार बनने की बात आई थी तो उस वक्त मुख्यमंत्री बनने की दौड़ में सरयू राय भी शामिल थे.

जमशेदपुर पश्चिम सीट से टिकट कटने के बाद सरयू राय ने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. उन्होंने घोषणा की कि वे निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरेंगे. लेकिन भाजपा को सबसे अधिक परेशान करने वाली उनकी यह घोषणा रही कि वे अपनी पुरानी सीट जमशेदपुर पश्चिम के साथ-साथ मुख्यमंत्री रघुबर दास की सीट जमशेदपुर पूर्व से भी चुनाव मैदान में उतरेंगे. इस सीट पर कांग्रेस ने अपने प्रवक्ता गौरव वल्लभ को उम्मीदवार बनाया है. मुख्यमंत्री के खिलाफ सरयू राय के मैदान में उतरने की घोषणा के बाद कुछ पार्टियों ने यह घोषणा कर दी कि वे इस सीट पर अपना उम्मीदवार नहीं देंगे. सरयू राय के रघुबर दास के खिलाफ मैदान में उतरने से न सिर्फ पूरे झारखंड में बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी इसकी चर्चा हुई.

सरयू राय की पहचान भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाने वाले नेता की रही है. बिहार के चारा घोटाले से लेकर झारखंड में पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा के भ्रष्टाचार को उजागर करने में उनकी प्रमुख भूमिका रही है. सरकार में रहते हुए भी वे भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बोलते रहे हैं. ऐसे में उनका टिकट कटने को विपक्ष की ओर से यह कहकर प्रचारित किया जा रहा है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वालों को भाजपा पसंद नहीं करती है.

तो क्या सरयू राय रघुबर दास को हरा भी सकते हैं? इस सवाल के जवाब में झारखंड भाजपा के एक नेता कहते हैं, ‘इसकी संभावना काफी कम है. लेकिन कुछ दूसरी सीटों पर भी इसका असर पड़ सकता है. सरयू राय के मैदान में उतरने से रघुबर दास को अब अपनी सीट पर अधिक वक्त देना पड़ेगा. इस वजह से जिन दूसरी सीटों पर प्रचार करके रघुबर दास पार्टी की स्थिति मजबूत करते, वे वहां अब उतना वक्त नहीं दे पाएंगे. इसके अलाव संगठन में निचले स्तर तक सरयू राय को लेकर सम्मान का एक भाव है. सरयू राय के साथ अन्याय होने से कार्यकर्ताओं के मनोबल पर भी असर पड़ेगा. इन सबका कुछ न कुछ नुकसान तो पार्टी को उठाना पड़ेगा.’

झारखंड के चुनावों को जो लोग करीब से देख रहे हैं, उन लोगों का कहना है कि भाजपा इन चुनावों में काफी मजबूत स्थिति में थी लेकिन चुनावों की घोषणा के बाद उसने एक के बाद एक लगातार कई गलतियां कीं जिससे उसकी स्थिति पहले जितनी मजबूत नहीं रही. झारखंड के ग्रामीण इलाकों में चुनाव प्रचार अभियानों को जो लोग देख रहे हैं, वे तो यहां तक कह रहे हैं कि प्रदेश की सत्ता में भाजपा की एक बार फिर वापसी की राह मुश्किल होती जा रही है.