बीते हफ्ते बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में एक संस्कृत अध्यापक की नियुक्ति पर विरोध प्रदर्शन की खबरें आयीं. कहा गया कि यह विरोध उन अध्यापक के मुसलमान होने को लेकर है. फिरोज़ खान नाम के इन विद्वान ने अपने दादा ग़फूर खान और अपने पिता रमजान खान की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए बचपन से संस्कृत का अध्ययन किया. फिरोज़ कहते हैं कि जब उनके दादा संस्कृत में भजन गाने लगते थे तो सैकड़ों की भीड़ भाव-विभोर होकर झूमने लगती थी. फिरोज़ के पिता जयपुर के बागरू गांव की गोशाला में अपना प्रवचन तक किया करते थे.

भारत में संस्कृत को लेकर चल रही बहसों और इसे किसी एक पंथविशेष से जोड़कर देखने की प्रवृत्ति पर इससे पूर्व भी इसी मंच पर अलग से एक आलेख लिखा जा चुका है. लेकिन इस आलेख में हम मुसलमानों के संस्कृत पढ़ने-पढ़ाने पर महात्मा गांधी के महत्वपूर्ण विचार जानने का प्रयास करेंगे. जब भारत आज के अर्थों में आज़ाद नहीं हुआ था और इसकी राष्ट्रीय पहचान की कोई एक आधुनिक भाषा स्पष्ट नहीं हो पाई थी, तब भी एक प्राचीन सांस्कृतिक पहचान के रूप में संस्कृत और तमिल का निर्विवाद रूप से भारत में प्रमुख स्थान था. महात्मा गांधी जब दक्षिण अफ्रीका गए और वहां पर उन्होंने भारतीयों को एक सांस्कृतिक पहचान के रूप में प्रतिष्ठा दिलाने का प्रयास किया तो उन्होंने डरबन में वहां की विधान परिषद् और विधान सभा के नाम के सभी सदस्यों के नाम एक चिट्ठी लिखी. 19 दिसंबर, 1894 के आस-पास लिखे गए इस लंबे पत्र में महात्मा गांधी ने इतिहासकार सर विलियम विल्सन हंटर को उद्धृत करते हुए लिखा था-

‘आधुनिक भाषा-विज्ञान का आरंभ तो तब हुआ जब यूरोपीय विद्वानों ने संस्कृत का अध्ययन किया. पाणिनी के व्याकरण का स्थान संसार के व्याकरणों में सर्वोच्च है. संपूर्ण संस्कृत व्याकरण को उसके द्वारा एक तर्कसंगत और व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत कर दिया गया है. और वह मानवीय आविष्कार और उद्योग की एक शानदार सिद्धि के रूप में दैदीप्यमान है.’

गांधीजी को स्वयं संस्कृत तो क्या हिंदी भी ठीक से नहीं आती थी. लेकिन समय के साथ-साथ उन्होंने इन दोनों ही भाषाओं को सीखने का प्रयत्न किया. भारत के बारे में उनका शुरुआती विचार यही था कि हर भारतीय को संस्कृत का ज्ञान अवश्य होना चाहिए. वे मानते थे कि इसकी शुरुआत कम-से-कम सभी हिंदुओं के संस्कृत सीखने से की जा सकती है और बाद में सभी धर्मों के भारतवासी इस भाषा को सीखना चाहेंगे. इसलिए दक्षिण अफ्रीका में जब उन्होंने अपना आश्रम बनाया तो वहां के वयस्कों को संस्कृत सिखाने को बहुत गंभीरता से लिया. 9 जुलाई, 1909 में जब वे लंदन की यात्रा पर होते हैं तब वे अपने भतीजे मगनलाल को पत्र में लिखते हैं - ‘वहां वयस्कों के लिए संस्कृत की कक्षाओं शुरू की जाएं तो अच्छा हो. मैं ज्यों-ज्यों पढ़ता हूं त्यों-त्यों मुझे लगता है कि इस भाषा के ज्ञान की प्रत्येक हिन्दू को आवश्यकता है.’ इस पत्र के आखिर में ‘पुनश्चः’ लिखते हुए वे फिर से कहते हैं कि ‘संस्कृत के वर्ग की बात सबसे करना.’

भारत आने पर भी विभिन्न अवसरों पर गांधीजी ने सभी भारतीयों को संस्कृत सीखने के लिए लगातार प्रेरित किया. 18 मार्च, 1925 को केरल के अलवाई में अद्वैत आश्रम में जब महात्मा गांधी गए तो वहां उन्हें संस्कृत में ही मानपत्र देकर स्वागत किया गया. लेकिन विशेष बात यह थी कि तब ‘अछूत’ माने जाने वाले एक दलित छात्र ने इस मानपत्र को मंच से पढ़कर सुनाया था. ध्यान रहे कि तब इन कथित ‘अछूतों’ के लिए संस्कृत पढ़ना आसान नहीं था, क्योंकि समाज में फैली ‘अस्पृश्यता’ और जातिवाद जैसी कुरीतियों की वजह से संस्कृत को केवल कथित उच्च वर्णों तक ही सीमित करने की प्रतिगामी व्यवस्था प्रचलित हो चुकी थी.

20 मार्च, 1927 को हरिद्वार स्थित गुरुकुल कांगड़ी में राष्ट्रीय शिक्षा परिषद् के अपने अध्यक्षीय भाषण में गांधीजी ने खासतौर पर इस बात पर जोर दिया कि संस्कृत पढ़ना केवल भारत के हिंदुओं का ही नहीं, बल्कि मुसलमानों का भी कर्तव्य है. उनके शब्द थे - ‘संस्कृत का अध्ययन करना प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य है. हिन्दुओं का तो है ही, मुसलमानों का भी है. क्योंकि आखिर उनके पूर्वज भी राम और कृष्ण ही थे. और अपने पूर्वजों को जानने के लिए उन्हें संस्कृत सीखनी चाहिए. किन्तु मुसलमानों के साथ संबंध बनाए रखने के लिए उनकी भाषा जानना हिन्दुओं का भी कर्तव्य है. आज हम एक-दूसरे की भाषा से दूर भागते हैं, क्योंकि हमारी बुद्धि नष्ट हो गई है. जो संस्था एक-दूसरे के प्रति मन में द्वेष और भय रखने की शिक्षा दे, निश्चित मानिए कि वह राष्ट्रीय संस्था कदापि नहीं है. राष्ट्रीय संस्थाओं को हिन्दू-मुस्लिम एकता के संदेशवाहक तैयार करने चाहिए. जो संस्थाएं धर्मान्ध, कट्टर हिन्दू या मुसलमान तैयार करती हैं, वे नष्ट कर देने योग्य हैं. शैक्षणिक संस्थानों का उद्देश्य व्यक्ति को धर्मान्ध बनाना नहीं है.’

उसी साल जुलाई में बंगलोर के चामराजेन्द्र संस्कृत पाठशाला में अपने संबोधन में गांधीजी ने कहा— ‘मुझे यह सुनकर बहुत दुःख हुआ कि मैसूर राज्य में कुछ ऐसे पंडित हैं जो शूद्रों या पंचमों को संस्कृत सिखाने में हिचकते हैं. ...मनुष्य के समान शब्दों के अर्थ का भी विकास होता रहता है. और यदि कोई वैदिक वचन भी विवेकबुद्धि या अनुभव के विपरीत पड़ता हो तो उसे त्याग ही देना चाहिए. ...भारत के विभिन्न भागों में मेरा जो अनुभव रहा है उससे तो मैंने यही जाना है कि यदि व्यक्तिशः तुलना की जाए तो बौद्धिक अथवा नैतिक, किसी भी दृष्टि से कथित ‘अस्पृश्य’ लोग अपने ‘स्पृश्य’ भाइयों से उन्नीस नहीं पड़ते. ...और मैंने आदि कर्नाटक लड़कों को भी देखा है जो संस्कृत श्लोकों को पढ़ने और उनका सस्वर पाठ करने में यहां के किसी ब्राह्मण ल़ड़के या लड़की से कम नहीं हैं. इसलिए मैं इस बात के लिए आपका आभारी हूं कि आपने मुझ-जैसे क्रांतिकारी विचार रखने वाले व्यक्ति को अपने यहां बुलाया और केवल बुलाया ही नहीं, बल्कि उसे मानपत्र भेंट किया और उसमें उसके विचारों का अनुमोदन भी किया.’

उसी साल सात सितंबर को जब गांधीजी मद्रास के पचैयप्पा कॉलेज में बोलने गए तो वहां एक दिलचस्प घटना घटी. अपने भाषण में जैसे ही गांधीजी ने कहा - ‘मैं चाहूंगा कि यहां मुसलमान विद्यार्थी भी [संस्कृत] पढ़ने आ सकें.’

तभी श्रोताओं में से एक आवाज़ आई— ‘पंचमों को इसमें दाखिला नहीं दिया जाता.’

इस पर गांधीजी ने कहा— ‘यह तो मुझे नई बात का पता लगा. पंचमों और मुसलमानों, दोनों के लिए इस संस्था के द्वार खोल देने चाहिए. यदि यहां पंचमों को दाखिला नहीं दिया जाएगा तो मैं इसे हिन्दू संस्था मानने से इन्कार करता हूं.’

श्रोताओं में से फिर आवाज़ आई - ‘सुंदर! बहुत खूब!’

गांधीजी ने आगे कहा - ‘हिन्दू संस्था होने का यह मतलब तो नहीं होता कि कोई पंचम या मुसलमान यहां पढ़ न सके. मैं समझता हूं कि अब समय आ गया है कि ट्रस्टी लोग इसकी नियमावली में रद्दोबदल करें.’

गांधीजी के जीवन में एक दौर ऐसा भी आया जब उन्हें लगा कि विवाह आदि के अवसर पर संस्कृत में जो वचन दिलाए जाते हैं, उनका अर्थ समझ में नहीं आने से पति-पत्नी में वह भावना पैदा नहीं हो पाती. इसलिए उन्होंने अगस्त 1945 में गणपत नारायण महादेव तेन्दुलकर और इन्दुमती नागेश वासुदेव गुणाजी का विवाह खुद हिन्दी में कराया. सारे वचन हिन्दी में दिलवाए. इस तरह उन्होंने एक नई ‘विवाह विधि’ का सूत्रपात कर दिया. इस पर अमृतसर स्थित डिवाइन लाइफ सोसाइटी के संचालक संतराम अग्रवाल ने गांधीजी को पत्र लिखकर संभवतः यह कहा कि ऐसे अपनी भाषा में वचन दिलाना तो मुसलमानों के विवाह में होता है. दूसरा इससे संस्कृत का अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा. इसके जवाब में 1 सितंबर, 1945 को गांधीजी ने उन्हें लिखा-

‘भाई संतराम, आपने दो चीजों को मिला दिया है. जो ‘विवाह विधि’ मैंने लोक-भाषा में की उसमें तो मैंने तुलसीदास, सूरदास वगैरह का ही अनुकरण किया है. संस्कृत बची रही क्योंकि प्राकृत बढ़ी. जो मैंने किया है उससे धर्म लाभ ही हुआ है. इसमें हिन्दू-मुस्लिम की बात आती ही नहीं है. यह प्रश्न अलग है. इसमें मैं नहीं पड़ना चाहता हूं. आप तो दैवी जीवन की संस्था चलाते हैं. जरा सोचें.’

आज गांधीजी होते तो बीएचयू में मुस्लिम संस्कृत प्राध्यापक का विरोध करने वाले लोगों को भी फिर से यही कहते कि ‘जरा सोचो’. वे कहते कि ‘भाई तुम जिस संस्कृत भाषा की बात करते हो उसमें तो आत्मवत् सर्वभूतेषु कहा गया. उसमें तो यह कहा गया कि त्वं विप्रादिको वर्णो नाश्रमी नाक्षगोचरः। असङ्गोऽसि निराकारो विश्वसाक्षी सुखी भव।।’. जरो सोचो. क्योंकि आजकल देश में जो कुछ भी हो रहा है, लगता है बिना सोचे-समझे ही हो रहा है. जो तुम्हें लगता कि तुम सोच-समझकर कर रहे हो और बहुत अच्छा कर रहे हो, वह भी दरअसल बिना सोचे-समझे कर रहे हो. इसलिए जरा सोचो, जरा ठीक से सोचो.’ ऐसा कहते गांधीजी.